भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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पृष्ठ 383

षोडश पटल ] [ ३८३ अन्त में भ्रामणी कला होती है । मन्त्रों के ज्ञान [रखने वालों के द्वारा नमः के अन्त में बारहवीं मोहिनी कला होती है ।८२। उन्मनाम नमः पश्चाज्जरा प्रोक्ता त्रयोदशी । प्रणवाद्याश्चतुर्थ्यन्ता नमोऽन्तास्ताः प्रकीर्तिताः ।८३ पाददोस्तननासासु मूर्ध्नि बाहुयुगे न्यसेत् । सद्योजातोद्भूवाः सभ्यगष्टौ मन्त्री कलाः क्रमात् ।८४ सद्योजातं प्रपद्यामि सिद्धिःस्यात्प्रथमा कला । सद्योजाताय वै भूयो नमः स्याद्वृद्धिरीरिता ।८५ भवेद्युतिस्तृतीया स्यादभवे तदन्तरम् । लक्ष्मीश्चातुर्थी कथिया ततो नातिभवे पदम् ।८६ मेधा स्यात्पञ्चमी प्रोक्ता कला भूयो भवस्वमाम् । प्रज्ञा समीरिता षष्ठो भवान्ते स्यात्प्रभा कला ।८७ उद्भवाय नमः पश्चात्स्वधा स्यादष्टमी कला । प्रणवाद्याश्चतुर्थ्यन्ताः कलाः सर्वा नमोन्विताः ।८८ उन्मनाम नमः-उसके पीछे जरा तेरहवीं कला कही गयी है । ये सब के आदि मे प्रणव वाली-चतुर्थी विभक्ति अन्त वाली है और इनके अन्त में नमः-यह पद कहा गया है ।८३। इनका पद-बाहु-स्तिमा नासिका-मूर्धा और दोनों बाहुओं में न्यास करना चाहिये । मन्त्रधारो पुरुष क्रमसे सद्योजातोद्भाव आठ कलाओं का न्यास करे ।८४।सद्योजात प्रपद्यामि-यह सिद्धि होती है-प्रथमा कला में । सद्योजायत वैभूयो नमः स्याहे--यह वृद्धि कही गई है ।८२। भवेद्युवि तीसरी होती है । इसके अनन्तर लक्ष्मी चौथी कही गयी है । इसके उपरान्त 'नातिमनेपदम् मेधा होती है--पांचवी कला कही है । फिर 'भवस्वमाम् प्रज्ञा' छठवीं बताई गई है । भवान्तमें प्रभा कला होती है ।८६-८७। 'उद्भववाय नमः पश्चात्'-यह स्वधा आठवीं कला है । सब कलायें नमः-इससे अन्वित ओर प्रणव के आदि वाली चतुर्थ्यन्त होती है ।८८। अष्टत्रिंशत्कलाः प्रोक्ताः पञ्चब्रह्मापदान्तिकाः । इति विन्यस्तदेहोऽसौ भवेन्द्रङ्गाधारः स्वयं ।८६