शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३८४ । । श्रीशारदा तिलक ततः समाहितो भूत्वा ध्यायेद्देवं सदाशिवम् ।६० मुक्तापीतपयोदमौक्तिकजपावर्णैर्मुखैः पञ्चभिः । त्र्यक्षैरञ्जितमीशमिन्दुमुकुटं पूर्णेन्दुकोटिप्रभम् । शूलं टङ्ककृपाणवज्रदहनन्नागेन्द्रघण्टाकुशान् । पाशं भीतिहरं दधानममिताकल्पोज्ज्वलं चिन्तयेत् ।६१ एवं ध्यात्वा जपेन्मन्त्रं पञ्चलक्षं मधुप्लुतैः । प्रसूनैः करवीरोत्थैर्जुहुयात्तद्दशांशकम् ६२ पूर्वोदिते यजेत्पीठे मूर्तिं मूलेन कल्पयेत् । आवाह्य पूजयेत्तस्या मूर्त्याद्यावरणैः सहः ।६३ ये अड़तीस कलायें कही गयी हैं इसमें पाँच ब्रह्म पदान्तिक हैं । इस रीति से देह में विन्यास किया हुआ पुरुष स्वयं गगा का आधार हो जाया करता है ।८६। अतएव परम सावधान होकर इस रीति से ही भगवान् सदाशिव का ध्यान करना चाहिए ।६०। अब ध्यान करने का प्रकार बतलाया जाता है--मुक्ता (मोती) पीत, पयोद, मौक्तिक और जपा के पुष्प के वर्णों वाले पांच मुखों से समन्वित है--तीन लोचनों से अञ्जित है-चन्द्र के मुकुट को धारण करने वाले हैं-- करोड़ों पूर्ण चन्द्रों की प्रभा से संयुत है--अपने कर कमलों के द्वारा शूल, टङ्क, कृपाण, वज्र, दहन, नागेन्द्र, धारा, कुश, पाश, भीति का हरण को धारण करते हुये-अमित कल्पोज्ज्वल ईश का चिन्तन करना चाहिए ।६१। इस रीति से ध्यान करके पाँच लाख मन्त्र का जप करे और मधुर से प्लुत करवीरों के पुष्पों से जप का दशांश होम करना चाहिए ।६२। सूर्य के उदित होने पर पीठ में यजन करे । और मन्त्र के मूल भाग के द्वारा मूर्त्ति की कल्पना करनी चाहिए । उसमें आवाहन करके मूर्त्यादि आवरणों के सहित पूजन करे ।६३। शक्तिं डमरुकाभीतिवरान्सन्दधतं करैः । ईशानं त्रीक्षणं शुभ्रमैशान्यां दिशि पूजयेत् ।६४