भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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षोडश पटल ] [ ३८५ अक्षस्रजं मृगपाशौ सृणि डमरुकं ततः । खट्वागं निशितं शूलं कपालं बिभ्रतं करैः ।६५ परश्वेणवराभीतीर्दधानं विद्युदुज्ज्वलम् । चतुर्मुखं तत्पुरुषं त्रिनेत्रं पूर्वतोऽर्चयेत् ।६६ अब्जनाभ चतुर्वक्त्रं भीमदष्ट्रं भयावहम् । अघोरं त्रीक्षणं याम्ये पूजयेन्मन्त्र वित्तमः ।६७ कुंकुमाभं चक्रवक्त्रं वामदेवं त्रिलोचनम् । वराभयाक्षवलयकुठारं दधतं करैः ।६८ विलासिन् स्मेरवक्त्रं सौम्ये सम्यक्समर्चयेत् । कर्पूरेन्द्रनिभं सौम्यं सद्योजात त्रिलोचनम् ।६६ हरिणाक्षगुणाभीतिवरहस्तं चतुर्मुखम् । बालेन्दुशेखरोल्लासि मुकुटं पश्चिमे यजेत् ।१०० करों के द्वारा डमरू—शक्ति अभयदान और वरदान को धारण करते हुए—तीन नेत्रों से युक्त और परम शुभ्र ईशान देव का ईशानी दिशा में अर्चन करना चाहिए ।६४। कर कमलों में अक्ष, स्रज, मृग, पाश, सृणि, डमरू, खट्वांग, निशित, शूल और कपाल को धारण करने वाले हैं। परशु—ऐश—वर और अभय को धारण किये हुए हैं और विद्युल्लता के समान उज्ज्वल स्वरूप से युक्त है । चार मुखों से युक्त- तीन नेत्रों वाले तत्पुरुष का पूर्व में अर्चन करना चाहिए ।६५-६६। नाभि में अब्ज को रखने वाले, चार मुखों से युक्त, भीषण दाढ़ों वाले, भयदाता, तीनों नेत्रों से युक्त अघोर मन्त्र के ज्ञाता पुरुष का याम्य दिशा में पूजन करना चाहिए ।६७। कुंकुम के तुल्य आभा से युक्त, चार मुखों वाले, तीन लोचनों से युक्त, कर कमलों द्वारा वर अभय, अक्षयमाला और कुठार को धारण करते हुए, विलासी, स्मेर युक्त मुख वाले वामदेव का सौम्य दिशा में भली भाँति अर्चन करे ।६८। कर्पूर और इन्दुके तुल्य-सौम्य-विलोचन-हरिण, अक्षमाला, अभय और वरदान को हाथों में रखने वाले-बाल चन्द्रके शेखरसे उल्लसित मुकुट