भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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पृष्ठ 386

३८६ ० ] [ श्री शारदा तिलक धारी-चार मुखों से युक्त सद्योजात का पश्चिम में यजन करना चाहिए । ।६६-१००। निवृत्त्याद्यास्ततः कोणे तेजोरूपाः कलाः क्रमात् । केसरेषु षडङ्गानि पूर्ववत्पूजयेत्सुधी ।१०१ विश्वेश्वराननन्ताद्यान्पत्त्रेषु परितो यजेत् । उमादिकास्ततोबाह्ये शक्राद्यानायुधैः सह ।१०२ इति संपूज्य देवेशं भक्त्या परमया युतः । प्रीणयेन्नृत्यगीताद्यै स्तोत्रै र्मन्त्रैर्मनोहरैः ।१०३ तारो माया वियद् बिन्दुमनुस्वरसमन्वितम् । पंचाक्षरसमायुक्तो वसुवर्णो मनुर्मतः ।१०४ पंचाक्षरोक्तवत्कुर्यादङ्गन्यासादिकं बुधः ।१०५ सुधी को चाहिए वह फिर तेज के स्वरूप वाली निवृत्ति आदि कलाओं का क्रम से कोण में पूजन करे और केसरोंमें षडङ्गों का अर्चन करना चाहिए ।१०१। पत्रों में सब ओर विश्वेश्वर-अनन्त आदि का यजन करे । फिर उमादिक का अर्चन बाहर आयुधों के सहित इन्द्र आदि का अभ्यर्चन करना चाहिए ।१०२। इस प्रकारसे परम भक्ति की भावना से संयुत होकर देवेश्वर का भली भाँति पूजन करे । और फिर नृत्य गीत आदि स्तोत्रों के द्वारा तथा मनोहर मन्त्रों के द्वारा देवेश्वर को प्रीणित करे ।१०३। अब आठ अक्षरों वाले प्रसाद मंत्र का उद्धार बतलाते हैं । तार-प्रणव, माया-शक्ति का बीज, वियत्—हः, जो हकार बिंदु और अनुस्वार से संयुत होवे । यह मंत्राक्षरों से समन्वित आठ अक्षरों वाला मंत्र माना गया है ।१०४। बुध को चाहिए कि वह पंचा- क्षर में कहे हुए की ही भाँति अङ्ग न्यास आदि सब करे ।१०५। बन्दे सिन्दूरवर्णं मणिमुकुटलसच्चारुचन्द्रावतसम् । भालोद्यन्नेत्रमीशं स्मितमुखकमलं दिव्यभूषाङ्गरागम् । वामोरुन्यस्तपाणेररुणकुवलयं सन्दधत्याः प्रियायाः । वृत्तोत्तुङ्गस्तनाग्रे निहितकरतलं वेदटङ्केऽष्टहस्तम् ।१०६