भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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पृष्ठ 387

षोडश पटल ] [ ३८७ अष्टलक्षं जपेदेनं मनुं मनुविदाम्बरः । तत्सहस्रं प्रजुहुयात्पायसान्न्र्घृतप्लुतैः १९०७ प्राक् पीठे मूलमन्त्रेण मूर्तिं संकल्प्य पूजयेत् । अङ्गै रावरौ पूवमनन्ताद्यै रनन्तरम् १९०८ उमादिभिः समुद्दिष्टं तृतीयं लोकनायकैः । चतुर्थं पञ्चमं तेषामायुधैः परिकीर्तितम् १९०६ एवं प्रतिदिनं देवं पूजयेत्साधकोत्तमः । पुत्र मित्रादिसहितां श्रियं प्राप्य प्रमोदते ।११० अब ध्यान बतलाते हैं—सिंदूर के समान वर्ण वाले, मणियों के मुकुट के समान चारु चन्द्रमा के अवतंस से विभूषित, भाल में उदीय- मान नेत्र से युक्त, मुस्कराहट से युत मुख वाले, दिव्यभूषा और अङ्ग राग से समन्वित, बांये उरु पर हाथ रखने वाली, अरुण कुवलय को करने वाली प्रिया के वृत्त ओर उत्तुङ्ग स्तनों के अग्रभाग में करतल को रक्खे हुए, दश हस्त में अष्ट हस्त वाले ईश की मैं वन्दना करता हूँ ।१०६। मंत्रों के ज्ञाता पुरुष को इस मंत्र का आठ लाख जप करना चाहिए। उस जप का दशांश सहस्रों का घृत में प्लुत पायसान्नों के द्वारा होम करना चाहिए ।१०७। पूर्व पीठ पर मूल मंत्र के द्वारा मूर्ति की कल्पना करके अभ्यर्चन करना चाहिए। इसके अनन्तर अमन्तादि अङ्गों से अनन्तर में आवरण पूजन करे ।१०८। यह उमादि के द्वारा समुद्दिष्ट किया है। तृतीय लोक नायकों से—चौथा और पाँचवा उनके आयुधों के द्वारा कीर्त्तित किया गया है ।१०६। इस प्रकार से साधकों में श्रेष्ठ पुरुष को प्रतिदिन देव की पूजा करनी चाहिए। वह पुरुष पुत्र मित्रादि के सहित श्री की प्राप्ति करके प्रमुदित होता है ।११० तारः स्थिरा सकणंन्दुर्भुगुः सर्गविभूषितः । अक्षरात्मा निगदितो मनुर्मृत्युञ्जयादिकः ।१११ ऋषिः कहोलोदेव्यादिगायत्रीच्छन्द ईरितम् । मृत्युञ्जयो महादेवो देवतास्य सुमीरितः ।११२