शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 388, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें३८८ ] [ श्री शारदा तिलक भृगुणा दीर्घयुक्तेन षडङ्गानि समाचरेत् ।११३ चन्द्रार्काग्निविलोचनं स्मितमुखं पद्मद्वयान्तः स्थितम् । मुद्रापाशमृगाक्षसूत्रविलसत्पाणिं हिमांशुप्रभम् । किरीटेचन्द्रगलत्सुधाप्लुततनुं हारादिभूषोज्ज्वलम् । कान्त्या विश्वविमोहनं पशुपतिं मृत्युञ्जयं भावयेत् । ११४ अब मृत्युञ्जय मन्त्र बतलाया जाता है-तार-प्रणव, स्थिर-जः, वामकर्ण-ऊ, इन्दु-बिन्दु अर्थात्, अनुस्वार, भृगु-सकार, सर्ग-विसर्ग से युक्त ग्रह अक्षरात्मा मन्त्र कहा गया है। यह मन्त्र मृत्युञ्जयादिक है ।१११। इसका ऋषि कहोलो आदि है और छन्द गायत्री कहा गया है । मृत्युञ्जय महादेव इस मन्त्र का देवता है ।११२। दीर्घयुक्त भृगु के द्वारा इस मन्त्र के छै अङ्गों का समाचरण करना चाहिए ।११३। अब ध्यान का प्रकार बतलाया जाता है-चन्द्र, सूर्य और अग्नि के लोचनों वाले हैं, स्मित युक्त मुख से संयुत, दो पद्मों के अन्दर संस्थित, मुद्रा, पाश, मग और अक्ष माला से शोभित करों वाले-चन्द्र के समान प्रभा समन्वित-किरीट में स्थित चन्द्र गलकर बहती हुई सुधा से प्लुत शरीर वाले-हार आदि भूषा से उज्ज्वल-कान्ति से विश्व को मोहन करने वाले-पशुपति मृत्युञ्जय की भावना करनी चाहिए ।११४ गुणलक्षं जपेन्मन्त्रं तद्दशांशं विशालधीः । जुहुयादमृताखण्डैः शुद्धदुग्धाज्यलोलितैः । ११५ शैवे संपूजयेत्पीठे मूर्तिमूलेन कल्पयेत् । अङ्गावरणमाराध्य पश्चाल्लोकेश्वरान्यजेत् ।११६ तदस्त्राणि ततो बाह्ये पूजयेत्साधकोत्तमः । जपपूजादिभिः सिद्धे मन्त्रेऽस्मिन्मनुना क्रमात् ।११७ कुर्यात्प्रयोगान्कल्पोक्तानभीष्टफलसिद्धये । दुग्धयुक्तैः सुधाखण्डैर्मन्त्री मासं सहस्रकम् ।११८ आराधितेऽग्नौ जुहुयाद्विधिवद्विजितेन्द्रियः । सन्तुष्टः शंकरस्तेन सुधाप्लावितविग्रहः ।११९