शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 389, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंषोडश पटल ] [ ३८६ आयुरायोग्यसम्पत्तियशः पुत्रान्नित्रवर्द्धयेत् । सुधावटी तिलादूर्वा पयः सर्पिः पयोहविः ।१२० इत्युक्तैः लिप्तभिर्द्रव्यैर्जुहुयात्सप्तवासरम् । क्रमाद्दशांशतोनित्यमष्टोत्तरमतन्द्रितः ।१२१ इस मन्त्र का तीन लाख जप करे । विशाल बुद्धि वाले को चाहिए कि उसका दशांश भाग शुद्ध दूध और घृत में लोलित करके अमृता (गिलोय) के खण्डों से होम करना चाहिए ।११५। शेष पीठ पर भली भाँति पूजन करना चाहिए और मूल मन्त्र के द्वारा मूर्ति की कल्पना करे । अङ्गों के आवरण की समाराधना करके पीछे लोक नायको को यजन करे ।११६। इसके उपरान्त बाहर उनके अस्त्रों का साधकोत्तम अर्चन करे । इस मन्त्र के द्वारा क्रम से जप-पूजा आदि के द्वारा मन्त्र के सिद्ध होने पर मनुष्य अपनी अभीष्ट सिद्धि के लिये कल्पोक्त प्रयोगों को करे ।११७। दुग्ध से युक्त सुधा के खण्डों से मन्त्रधारी एक सहस्र आहु- तियाँ एक मास तक समराधित अग्नि में देवे और जितेन्द्रिय रहकर विधिके साथ ही करना चाहिए । इससे सुधा प्लावित विग्रह वाले शंकर सन्तुष्ट होकर कृपा किया करते हैं ।११८-११९। आयु, आरोग्य, सम्पत्ति यश और पुत्रादिक की वृद्धि किया करते हैं । सुधा, वट, तिल, दूर्वा, पय, घृत, पयोहवि, इन कथित सप्त द्रव्यों से सप्त वासर होम करे । क्रमसे उसकी दशांश नित्य एक सौ आठ बार तन्द्रा रहित होकर आहु- तियाँ देवे ।१२०-१२१। सप्ताधिकान् द्विजान्नित्यं भोजयेन्मधुरान्वितम् । विकारानुगुण मन्त्री वर्द्धयेद्धोमवासराम् ।१२२ होतृभ्योदक्षिणान्दद्यादरुणा गाः पयस्विनी : गुरुं संप्रोगयेत्पश्चाद्वस्त्राद्यैर्देवताधिया ।१२३ अनेन विधिना साध्यः कृत्याद्रोहज्वरादिभिः । विमुक्तः सुचिरं जीवेच्छरदां शतमञ्जसा ।१२४