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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

३८२ ] [ श्रीशारदा तिलक है । इसके उपरान्त घोरान्त में पीछे क्षमा होती है जिसको तृतीया कहा गया है । ।७३। 'घरतरों' से निद्रा होती है । सबसे सबमें तत्परा व्याधि पाँचवीं कही गयी है । इसके अनन्तर सब से मृत्यु छठवीं कही गई है । उसके आगे नमस्ते अस्तु क्षुधा सातवीं होती है । रुद्र रूपेभ्या कही गई तृषा आठवीं बतायी गयी है । इनके आदि में ध्रुव है और अन्त में ये नमः--इसमें समन्वित होती है । गुह्य, मुष्क, ऊरुयुग्म, दोनों जानु और जंघायें, स्फिच युगल, कटि, दोनों पार्श्व में त्रयोदश वाम कलाओं में न्यास करना चाहिए ।७४-७६। कठयां पार्श्वद्वये वावकला न्तस्तेत्तत्रयोदश ।७७ स्याज्ज्येष्ठाय नमो रक्षा द्वितीया परिकीर्त्तिता । स्याद्रुद्राय नमः पश्चात्ृतीया रति रीरिता ।७८ बालाय नमइत्यन्ते पालिनी परिकीर्त्तिता । कला कामा पञ्चमी स्यात्तनो विकरणाय च ।७६ मन संयमनी षष्ठी कथिता तदनन्तरम् । बलक्रिया समादिष्टा कला विकरणाय च ।८० नमोवृद्धिरष्टमी स्याद्वलान्ते च स्थिरा कला । पश्चात्प्रमथनायान्ते नमोरात्रिरुदीरिता ।८१ सर्वभूतद नाय नमौऽन्तेभ्रामणी कला । नमोऽन्ते मोहिनी प्रोक्ता मन्त्रैर्द्वादशी कला ।८२ ‘स्यात् ज्येष्ठाय नमो रक्षा’—यह द्वितीया कही है । ‘स्यात् रुद्राय नमः'—यह तीसरी रति कही गई हैं । ‘बलाय नमः’–इसके अन्त में मालिनी कीर्त्तिता की गई है । कला कामा पाँचवीं होती है । फिर ‘विकरणाय मनः संयमनी’ छठवी होती है । इसके अनन्तर बल क्रिया कला बतायी गई है । और विकरण के लिये नमो वृद्धि अष्टमी होती है। और बलान्त में स्थिरा कला होती है । पीछे 'प्रमथनाय' के अंत 'नमो रात्रि' कही गयी है ।७७-८१। ‘सर्वभूत दमनाथ नमः'—इसके

षोडश पटल ] [ ३८३ अन्त में भ्रामणी कला होती है । मन्त्रों के ज्ञान [रखने वालों के द्वारा नमः के अन्त में बारहवीं मोहिनी कला होती है ।८२। उन्मनाम नमः पश्चाज्जरा प्रोक्ता त्रयोदशी । प्रणवाद्याश्चतुर्थ्यन्ता नमोऽन्तास्ताः प्रकीर्तिताः ।८३ पाददोस्तननासासु मूर्ध्नि बाहुयुगे न्यसेत् । सद्योजातोद्भूवाः सभ्यगष्टौ मन्त्री कलाः क्रमात् ।८४ सद्योजातं प्रपद्यामि सिद्धिःस्यात्प्रथमा कला । सद्योजाताय वै भूयो नमः स्याद्वृद्धिरीरिता ।८५ भवेद्युतिस्तृतीया स्यादभवे तदन्तरम् । लक्ष्मीश्चातुर्थी कथिया ततो नातिभवे पदम् ।८६ मेधा स्यात्पञ्चमी प्रोक्ता कला भूयो भवस्वमाम् । प्रज्ञा समीरिता षष्ठो भवान्ते स्यात्प्रभा कला ।८७ उद्भवाय नमः पश्चात्स्वधा स्यादष्टमी कला । प्रणवाद्याश्चतुर्थ्यन्ताः कलाः सर्वा नमोन्विताः ।८८ उन्मनाम नमः-उसके पीछे जरा तेरहवीं कला कही गयी है । ये सब के आदि मे प्रणव वाली-चतुर्थी विभक्ति अन्त वाली है और इनके अन्त में नमः-यह पद कहा गया है ।८३। इनका पद-बाहु-स्तिमा नासिका-मूर्धा और दोनों बाहुओं में न्यास करना चाहिये । मन्त्रधारो पुरुष क्रमसे सद्योजातोद्भाव आठ कलाओं का न्यास करे ।८४।सद्योजात प्रपद्यामि-यह सिद्धि होती है-प्रथमा कला में । सद्योजायत वैभूयो नमः स्याहे--यह वृद्धि कही गई है ।८२। भवेद्युवि तीसरी होती है । इसके अनन्तर लक्ष्मी चौथी कही गयी है । इसके उपरान्त 'नातिमनेपदम् मेधा होती है--पांचवी कला कही है । फिर 'भवस्वमाम् प्रज्ञा' छठवीं बताई गई है । भवान्तमें प्रभा कला होती है ।८६-८७। 'उद्भववाय नमः पश्चात्'-यह स्वधा आठवीं कला है । सब कलायें नमः-इससे अन्वित ओर प्रणव के आदि वाली चतुर्थ्यन्त होती है ।८८। अष्टत्रिंशत्कलाः प्रोक्ताः पञ्चब्रह्मापदान्तिकाः । इति विन्यस्तदेहोऽसौ भवेन्द्रङ्गाधारः स्वयं ।८६

३८४ । । श्रीशारदा तिलक ततः समाहितो भूत्वा ध्यायेद्देवं सदाशिवम् ।६० मुक्तापीतपयोदमौक्तिकजपावर्णैर्मुखैः पञ्चभिः । त्र्यक्षैरञ्जितमीशमिन्दुमुकुटं पूर्णेन्दुकोटिप्रभम् । शूलं टङ्ककृपाणवज्रदहनन्नागेन्द्रघण्टाकुशान् । पाशं भीतिहरं दधानममिताकल्पोज्ज्वलं चिन्तयेत् ।६१ एवं ध्यात्वा जपेन्मन्त्रं पञ्चलक्षं मधुप्लुतैः । प्रसूनैः करवीरोत्थैर्जुहुयात्तद्दशांशकम् ६२ पूर्वोदिते यजेत्पीठे मूर्तिं मूलेन कल्पयेत् । आवाह्य पूजयेत्तस्या मूर्त्याद्यावरणैः सहः ।६३ ये अड़तीस कलायें कही गयी हैं इसमें पाँच ब्रह्म पदान्तिक हैं । इस रीति से देह में विन्यास किया हुआ पुरुष स्वयं गगा का आधार हो जाया करता है ।८६। अतएव परम सावधान होकर इस रीति से ही भगवान् सदाशिव का ध्यान करना चाहिए ।६०। अब ध्यान करने का प्रकार बतलाया जाता है--मुक्ता (मोती) पीत, पयोद, मौक्तिक और जपा के पुष्प के वर्णों वाले पांच मुखों से समन्वित है--तीन लोचनों से अञ्जित है-चन्द्र के मुकुट को धारण करने वाले हैं-- करोड़ों पूर्ण चन्द्रों की प्रभा से संयुत है--अपने कर कमलों के द्वारा शूल, टङ्क, कृपाण, वज्र, दहन, नागेन्द्र, धारा, कुश, पाश, भीति का हरण को धारण करते हुये-अमित कल्पोज्ज्वल ईश का चिन्तन करना चाहिए ।६१। इस रीति से ध्यान करके पाँच लाख मन्त्र का जप करे और मधुर से प्लुत करवीरों के पुष्पों से जप का दशांश होम करना चाहिए ।६२। सूर्य के उदित होने पर पीठ में यजन करे । और मन्त्र के मूल भाग के द्वारा मूर्त्ति की कल्पना करनी चाहिए । उसमें आवाहन करके मूर्त्यादि आवरणों के सहित पूजन करे ।६३। शक्तिं डमरुकाभीतिवरान्सन्दधतं करैः । ईशानं त्रीक्षणं शुभ्रमैशान्यां दिशि पूजयेत् ।६४

षोडश पटल ] [ ३८५ अक्षस्रजं मृगपाशौ सृणि डमरुकं ततः । खट्वागं निशितं शूलं कपालं बिभ्रतं करैः ।६५ परश्वेणवराभीतीर्दधानं विद्युदुज्ज्वलम् । चतुर्मुखं तत्पुरुषं त्रिनेत्रं पूर्वतोऽर्चयेत् ।६६ अब्जनाभ चतुर्वक्त्रं भीमदष्ट्रं भयावहम् । अघोरं त्रीक्षणं याम्ये पूजयेन्मन्त्र वित्तमः ।६७ कुंकुमाभं चक्रवक्त्रं वामदेवं त्रिलोचनम् । वराभयाक्षवलयकुठारं दधतं करैः ।६८ विलासिन् स्मेरवक्त्रं सौम्ये सम्यक्समर्चयेत् । कर्पूरेन्द्रनिभं सौम्यं सद्योजात त्रिलोचनम् ।६६ हरिणाक्षगुणाभीतिवरहस्तं चतुर्मुखम् । बालेन्दुशेखरोल्लासि मुकुटं पश्चिमे यजेत् ।१०० करों के द्वारा डमरू—शक्ति अभयदान और वरदान को धारण करते हुए—तीन नेत्रों से युक्त और परम शुभ्र ईशान देव का ईशानी दिशा में अर्चन करना चाहिए ।६४। कर कमलों में अक्ष, स्रज, मृग, पाश, सृणि, डमरू, खट्वांग, निशित, शूल और कपाल को धारण करने वाले हैं। परशु—ऐश—वर और अभय को धारण किये हुए हैं और विद्युल्लता के समान उज्ज्वल स्वरूप से युक्त है । चार मुखों से युक्त- तीन नेत्रों वाले तत्पुरुष का पूर्व में अर्चन करना चाहिए ।६५-६६। नाभि में अब्ज को रखने वाले, चार मुखों से युक्त, भीषण दाढ़ों वाले, भयदाता, तीनों नेत्रों से युक्त अघोर मन्त्र के ज्ञाता पुरुष का याम्य दिशा में पूजन करना चाहिए ।६७। कुंकुम के तुल्य आभा से युक्त, चार मुखों वाले, तीन लोचनों से युक्त, कर कमलों द्वारा वर अभय, अक्षयमाला और कुठार को धारण करते हुए, विलासी, स्मेर युक्त मुख वाले वामदेव का सौम्य दिशा में भली भाँति अर्चन करे ।६८। कर्पूर और इन्दुके तुल्य-सौम्य-विलोचन-हरिण, अक्षमाला, अभय और वरदान को हाथों में रखने वाले-बाल चन्द्रके शेखरसे उल्लसित मुकुट

३८६ ० ] [ श्री शारदा तिलक धारी-चार मुखों से युक्त सद्योजात का पश्चिम में यजन करना चाहिए । ।६६-१००। निवृत्त्याद्यास्ततः कोणे तेजोरूपाः कलाः क्रमात् । केसरेषु षडङ्गानि पूर्ववत्पूजयेत्सुधी ।१०१ विश्वेश्वराननन्ताद्यान्पत्त्रेषु परितो यजेत् । उमादिकास्ततोबाह्ये शक्राद्यानायुधैः सह ।१०२ इति संपूज्य देवेशं भक्त्या परमया युतः । प्रीणयेन्नृत्यगीताद्यै स्तोत्रै र्मन्त्रैर्मनोहरैः ।१०३ तारो माया वियद् बिन्दुमनुस्वरसमन्वितम् । पंचाक्षरसमायुक्तो वसुवर्णो मनुर्मतः ।१०४ पंचाक्षरोक्तवत्कुर्यादङ्गन्यासादिकं बुधः ।१०५ सुधी को चाहिए वह फिर तेज के स्वरूप वाली निवृत्ति आदि कलाओं का क्रम से कोण में पूजन करे और केसरोंमें षडङ्गों का अर्चन करना चाहिए ।१०१। पत्रों में सब ओर विश्वेश्वर-अनन्त आदि का यजन करे । फिर उमादिक का अर्चन बाहर आयुधों के सहित इन्द्र आदि का अभ्यर्चन करना चाहिए ।१०२। इस प्रकारसे परम भक्ति की भावना से संयुत होकर देवेश्वर का भली भाँति पूजन करे । और फिर नृत्य गीत आदि स्तोत्रों के द्वारा तथा मनोहर मन्त्रों के द्वारा देवेश्वर को प्रीणित करे ।१०३। अब आठ अक्षरों वाले प्रसाद मंत्र का उद्धार बतलाते हैं । तार-प्रणव, माया-शक्ति का बीज, वियत्—हः, जो हकार बिंदु और अनुस्वार से संयुत होवे । यह मंत्राक्षरों से समन्वित आठ अक्षरों वाला मंत्र माना गया है ।१०४। बुध को चाहिए कि वह पंचा- क्षर में कहे हुए की ही भाँति अङ्ग न्यास आदि सब करे ।१०५। बन्दे सिन्दूरवर्णं मणिमुकुटलसच्चारुचन्द्रावतसम् । भालोद्यन्नेत्रमीशं स्मितमुखकमलं दिव्यभूषाङ्गरागम् । वामोरुन्यस्तपाणेररुणकुवलयं सन्दधत्याः प्रियायाः । वृत्तोत्तुङ्गस्तनाग्रे निहितकरतलं वेदटङ्केऽष्टहस्तम् ।१०६

षोडश पटल ] [ ३८७ अष्टलक्षं जपेदेनं मनुं मनुविदाम्बरः । तत्सहस्रं प्रजुहुयात्पायसान्न्र्घृतप्लुतैः १९०७ प्राक् पीठे मूलमन्त्रेण मूर्तिं संकल्प्य पूजयेत् । अङ्गै रावरौ पूवमनन्ताद्यै रनन्तरम् १९०८ उमादिभिः समुद्दिष्टं तृतीयं लोकनायकैः । चतुर्थं पञ्चमं तेषामायुधैः परिकीर्तितम् १९०६ एवं प्रतिदिनं देवं पूजयेत्साधकोत्तमः । पुत्र मित्रादिसहितां श्रियं प्राप्य प्रमोदते ।११० अब ध्यान बतलाते हैं—सिंदूर के समान वर्ण वाले, मणियों के मुकुट के समान चारु चन्द्रमा के अवतंस से विभूषित, भाल में उदीय- मान नेत्र से युक्त, मुस्कराहट से युत मुख वाले, दिव्यभूषा और अङ्ग राग से समन्वित, बांये उरु पर हाथ रखने वाली, अरुण कुवलय को करने वाली प्रिया के वृत्त ओर उत्तुङ्ग स्तनों के अग्रभाग में करतल को रक्खे हुए, दश हस्त में अष्ट हस्त वाले ईश की मैं वन्दना करता हूँ ।१०६। मंत्रों के ज्ञाता पुरुष को इस मंत्र का आठ लाख जप करना चाहिए। उस जप का दशांश सहस्रों का घृत में प्लुत पायसान्नों के द्वारा होम करना चाहिए ।१०७। पूर्व पीठ पर मूल मंत्र के द्वारा मूर्ति की कल्पना करके अभ्यर्चन करना चाहिए। इसके अनन्तर अमन्तादि अङ्गों से अनन्तर में आवरण पूजन करे ।१०८। यह उमादि के द्वारा समुद्दिष्ट किया है। तृतीय लोक नायकों से—चौथा और पाँचवा उनके आयुधों के द्वारा कीर्त्तित किया गया है ।१०६। इस प्रकार से साधकों में श्रेष्ठ पुरुष को प्रतिदिन देव की पूजा करनी चाहिए। वह पुरुष पुत्र मित्रादि के सहित श्री की प्राप्ति करके प्रमुदित होता है ।११० तारः स्थिरा सकणंन्दुर्भुगुः सर्गविभूषितः । अक्षरात्मा निगदितो मनुर्मृत्युञ्जयादिकः ।१११ ऋषिः कहोलोदेव्यादिगायत्रीच्छन्द ईरितम् । मृत्युञ्जयो महादेवो देवतास्य सुमीरितः ।११२

३८८ ] [ श्री शारदा तिलक भृगुणा दीर्घयुक्तेन षडङ्गानि समाचरेत् ।११३ चन्द्रार्काग्निविलोचनं स्मितमुखं पद्मद्वयान्तः स्थितम् । मुद्रापाशमृगाक्षसूत्रविलसत्पाणिं हिमांशुप्रभम् । किरीटेचन्द्रगलत्सुधाप्लुततनुं हारादिभूषोज्ज्वलम् । कान्त्या विश्वविमोहनं पशुपतिं मृत्युञ्जयं भावयेत् । ११४ अब मृत्युञ्जय मन्त्र बतलाया जाता है-तार-प्रणव, स्थिर-जः, वामकर्ण-ऊ, इन्दु-बिन्दु अर्थात्, अनुस्वार, भृगु-सकार, सर्ग-विसर्ग से युक्त ग्रह अक्षरात्मा मन्त्र कहा गया है। यह मन्त्र मृत्युञ्जयादिक है ।१११। इसका ऋषि कहोलो आदि है और छन्द गायत्री कहा गया है । मृत्युञ्जय महादेव इस मन्त्र का देवता है ।११२। दीर्घयुक्त भृगु के द्वारा इस मन्त्र के छै अङ्गों का समाचरण करना चाहिए ।११३। अब ध्यान का प्रकार बतलाया जाता है-चन्द्र, सूर्य और अग्नि के लोचनों वाले हैं, स्मित युक्त मुख से संयुत, दो पद्मों के अन्दर संस्थित, मुद्रा, पाश, मग और अक्ष माला से शोभित करों वाले-चन्द्र के समान प्रभा समन्वित-किरीट में स्थित चन्द्र गलकर बहती हुई सुधा से प्लुत शरीर वाले-हार आदि भूषा से उज्ज्वल-कान्ति से विश्व को मोहन करने वाले-पशुपति मृत्युञ्जय की भावना करनी चाहिए ।११४ गुणलक्षं जपेन्मन्त्रं तद्दशांशं विशालधीः । जुहुयादमृताखण्डैः शुद्धदुग्धाज्यलोलितैः । ११५ शैवे संपूजयेत्पीठे मूर्तिमूलेन कल्पयेत् । अङ्गावरणमाराध्य पश्चाल्लोकेश्वरान्यजेत् ।११६ तदस्त्राणि ततो बाह्ये पूजयेत्साधकोत्तमः । जपपूजादिभिः सिद्धे मन्त्रेऽस्मिन्मनुना क्रमात् ।११७ कुर्यात्प्रयोगान्कल्पोक्तानभीष्टफलसिद्धये । दुग्धयुक्तैः सुधाखण्डैर्मन्त्री मासं सहस्रकम् ।११८ आराधितेऽग्नौ जुहुयाद्विधिवद्विजितेन्द्रियः । सन्तुष्टः शंकरस्तेन सुधाप्लावितविग्रहः ।११९

षोडश पटल ] [ ३८६ आयुरायोग्यसम्पत्तियशः पुत्रान्नित्रवर्द्धयेत् । सुधावटी तिलादूर्वा पयः सर्पिः पयोहविः ।१२० इत्युक्तैः लिप्तभिर्द्रव्यैर्जुहुयात्सप्तवासरम् । क्रमाद्दशांशतोनित्यमष्टोत्तरमतन्द्रितः ।१२१ इस मन्त्र का तीन लाख जप करे । विशाल बुद्धि वाले को चाहिए कि उसका दशांश भाग शुद्ध दूध और घृत में लोलित करके अमृता (गिलोय) के खण्डों से होम करना चाहिए ।११५। शेष पीठ पर भली भाँति पूजन करना चाहिए और मूल मन्त्र के द्वारा मूर्ति की कल्पना करे । अङ्गों के आवरण की समाराधना करके पीछे लोक नायको को यजन करे ।११६। इसके उपरान्त बाहर उनके अस्त्रों का साधकोत्तम अर्चन करे । इस मन्त्र के द्वारा क्रम से जप-पूजा आदि के द्वारा मन्त्र के सिद्ध होने पर मनुष्य अपनी अभीष्ट सिद्धि के लिये कल्पोक्त प्रयोगों को करे ।११७। दुग्ध से युक्त सुधा के खण्डों से मन्त्रधारी एक सहस्र आहु- तियाँ एक मास तक समराधित अग्नि में देवे और जितेन्द्रिय रहकर विधिके साथ ही करना चाहिए । इससे सुधा प्लावित विग्रह वाले शंकर सन्तुष्ट होकर कृपा किया करते हैं ।११८-११९। आयु, आरोग्य, सम्पत्ति यश और पुत्रादिक की वृद्धि किया करते हैं । सुधा, वट, तिल, दूर्वा, पय, घृत, पयोहवि, इन कथित सप्त द्रव्यों से सप्त वासर होम करे । क्रमसे उसकी दशांश नित्य एक सौ आठ बार तन्द्रा रहित होकर आहु- तियाँ देवे ।१२०-१२१। सप्ताधिकान् द्विजान्नित्यं भोजयेन्मधुरान्वितम् । विकारानुगुण मन्त्री वर्द्धयेद्धोमवासराम् ।१२२ होतृभ्योदक्षिणान्दद्यादरुणा गाः पयस्विनी : गुरुं संप्रोगयेत्पश्चाद्वस्त्राद्यैर्देवताधिया ।१२३ अनेन विधिना साध्यः कृत्याद्रोहज्वरादिभिः । विमुक्तः सुचिरं जीवेच्छरदां शतमञ्जसा ।१२४

३६० ] [ श्री शारदा तिलक अभिचारे ज्वरे तीव्रे घोरोन्मादे शिरोगदे । असाध्यरोगश्वेडादौ महादाहे महाभये ॥ १२५ होमोऽयंशान्तिदः प्रोक्तः सर्वसम्पत्प्रदायकः। द्रव्यैरेतैः प्रजुहुयात्त्रिजन्मसु यथाविधि ॥१२६ भोजयेन्मधुरैस्साज्यैर्ब्राह्मणा-वेदपारगान् । दीर्घमायुरवाप्नोति वाञ्छितां विन्दति श्रियम् ॥१२७ एकादशाहुतीर्नित्यं दूर्वाभिर्जुहुयाद्बुधः । अपमृत्युजितेषु स्यादायुरारोग्यवर्द्धनः ॥२८ दस से अधिक द्विजों को नित्य मधुर से अन्वित पदार्थों का भोजन करावे । विकारों अर्थात् रोगों के अनुरूप ही मन्त्रधारी होम के दिनों की वृद्धि कर देवे ।१२२। जो इसमें होता होवें उनको पुष्कल दक्षिणा देनी चाहिए और अरुण वर्ण वाली दुधार गाय को देवे । इसके पीछे अपने गुरुदेव को देवता की बुद्धि से ही धनादि के द्वारा प्रीणित करना चाहिए ।१२३। इस विधि से साध्य कृत्या द्रोह और ज्वर आदि से मुक्त होकर बहुत समय तक सौ वर्ष पर्यन्त जीवित रहा करता है ।१२४। अभिचार में, तीव्र ज्वर में, घोर उन्माद में, शिरोरोग में, असाध्य रोग श्वेडादि में, महादाह में, महाभय में यह होम शान्ति देने वाला कहा है और यह सब प्रकार की सम्पदाओं के प्रदान करने वाला होता है। विधि के सहित त्रिजन्मा (अग्नि) में इन द्रव्यों से होम करे । १२५।१२६। इसके अनन्तर वेदों में पारगामी विद्वान् ब्राह्मणों को घृत के सहित मधुर पदार्थों के द्वारा भोजन करावे । वह मनुष्य दीर्घ आयु की प्राप्ति किया करता है और अपनी मनोवांछित श्री का लाभ भी किया करता है ।१२७। बुध पुरुष एकादश आहुतियां नित्य दूर्वाओं के द्वारा देवे । वह मनुष्य अपमृत्यु पर विजेता हो जाता है और आयु तथा आरोग्य वाला होता है ।१२८। त्रिजन्मसु सुधावल्लीकाश्मरीबकुलोद्भवैः । समिद्वरैःकृतोहोमः सर्वमृत्युग्रहापहः ॥१२६

षोडश पटल ] [ ३८१ सिद्धान्नैर्विहितो होमो महाज्वरविनाशनः । अपामार्गसमिद्धोमः सर्वामयनिषूदनः ।१३० प्रणवरचितनालं मन्त्रमष्टार्णपत्रं भृगुविलसितमध्यं पद्ममुग्मं तदन्तः । कृतवसतिमुमेशं वर्गनिर्यत्सुधार्द्रं कलयतु हृदि नित्यं सर्वदुःखप्रशान्त्यैः ।१३१ यन्त्राढ्ये कमले सौम्ये कलशं प्रोक्तवर्त्मना । नवरत्नसमायुक्तं दुकूलाभ्याममलङ्कृतम् ।१३२ आपूर्य सलिलैः शुद्धैस्तस्मिन्देवं प्रपूजयेत् । उपचारैः षोडशभिर्विधानेन विधानवित् ।१३३ सुधा वल्ली—कश्मरी और बकुल की समुद्भूत समिधाओंसे अग्नि में होम करने वाला मनुष्य सब प्रकार की मृत्यु और ग्रहों के अपहरण करने वाला होता है ।१२६। सिद्ध अन्नों के द्वारा किया हुआ होम महा- ज्वर के विनाश करने वाला होता है । अपामार्ग की समिधाओं से किया हुआ होम सभी रोगों का विनाश करने वाला हुआ करता है । ।१३०। प्रणव के द्वारा विरचित नाल वाला—पत्रों के मध्य में मन्त्र के वर्ण होवें — विसर्ग सहित सकार से युक्त मध्य होवे—उसके अन्दर पत्रों का युग्म होवे—वर्णों से निर्यत्सुधा के लिए निवास करने वाले उमेश को कलिन करे । यह मन्त्र हृदय में नित्य ही सब दुःखों की प्रशान्ति करने के लिए होता है ।१३१। यन्त्र से युक्त सौम्य कमल में कहे हुए मार्ग के द्वारा नौ प्रकार के रत्नों से समायुक्त और दो वस्त्रों से अलंकृत कलश स्थापित करे और उसको शुद्ध जल से पूरित कर देवे । इस कलश में देव का अभ्यर्चन करना चाहिए । विधान के ज्ञाता पुरुष को विधि के साथ सोलह पूजन के उपचारों के द्वारा अर्चन करना चाहिए । ।१३२-१३३। अभिषिञ्चेत्प्रियं साध्यं विनीतं दत्तदक्षिणम् । आधिव्याधिमहारोगकृत्याद्रोहनिवारणम् ।१३४

३६२ ] [ श्री शारदा तिलक अभिषेकोऽयमाख्यातः कीर्तिलक्ष्मीं जयप्रदः ।१३५ मध्ये साध्याक्षराढ्यं ध्रुवमभिविलिखेन्मध्यमं दिग्दलस्थम् । कोणेष्वन्त्यं मनोस्तत्क्षितिभुवनमथोदिक्षुच द्रं विदिक्षु । टान्तं यन्त्रं तदुक्तं सकलभयहरं क्ष्वेडभूतापमृत्यु- व्याधिव्यामोहदुःखप्रशमनमुदितं श्रीप्रदं कीर्तिदायि ।१३६ परम विनम्र और दी हुई दक्षिणा वाले साध्य का इसके जल से अभिषेक नित्य ही करे तो अभिषिंचत समस्त आधियाँ-व्याधियाँ- महान् रोग और कृत्या के द्रोह का विनाश करने वाला हुआ करता है ।१३४। यह इस प्रकार से किया हुआ अभिषेक कीर्ति-लक्ष्मी और विजयके प्रदान करने वाला कहा गया है ।१३५। अब एक यंत्र बतलाया जाता है-मध्य में साध्य के अक्षरों से युक्त ध्रुवको लिखे । मध्य का अभिप्राय कर्णिका होता है । मध्यम दिग्दलों में स्थित करे और कर्णोंमें मन्त्र का अन्त्य लिखे । दिशाओं में क्षितिभुवन और विदिशाओंमें चंद्र लिखे । वह मंत्र टांत कहा गया है । यह सब प्रकार के भयों के हरण करने वाला है । इस यंत्र को क्ष्वेड-भूत-अपमृत्यु-व्याधि व्यामोह दुःखों का शमन करने वाला तथा श्री का प्रदाता और कीर्ति का देने वाला बताया गया है ।१३५-१३६। —x— सप्तदश पटल पुरुषार्थ मन्त्र अथ वक्ष्ये मन्त्ररत्नं समस्तपुरुषार्थदम् । अवापुर्येन जप्तेन दिव्यं ज्ञान मुनीश्वराः ।१ दक्षिणामूर्तये पूर्वं तुभ्य पदमनन्तरम् । वटमूलपदस्यान्ते पदं पश्चान्निवासिने ।२

सप्तदश पटल ] [ ३६३ ध्यानेकनिरयाङ्गाय पश्चाद्ब्रूयान्नमः पदम्। रुद्राय शम्भवे तारशक्तिरुद्धोऽयमीरितः। ३ षट्त्रिंशदक्षरोमन्त्रः सर्वकामफलप्रदः। मुनिः शुकः समुद्दिष्टश्छन्दोऽनुष्टुप्समीरितम्। ४ दक्षिणामूर्त्तिनामास्य देवता शम्भुरीरितः। षड्भिर्वर्णैर्हृदाख्यातं द्वाभ्यां शिर उदीरितम्। ५ शिखाष्टभिः समुद्दिष्टा वस्वर्णैः कवचं मतम्। पञ्चभिर्नेत्रमाख्यातं त्रिभिरस्त्रमुदाहृतम्। ६ षडेते मारशब्दाद्या ह्लाड्यन्ताः सजातयः। अङ्गमन्त्राः समुद्दिष्टा यथावद्देशिकोत्तमैः। ७ इसके अनन्तर समस्त पुरुषार्थों के प्रदान करने वाले मन्त्र रत्न को बतलाया जाता है जिसके जप करने से मुनीश्वरों ने दिव्य ज्ञान को प्राप्त कर लिया था। १। मन्त्र का जोकि श्लोक के स्वरूप वाला है अब उसका उद्धार बतलाया जाता है—पूर्व में दक्षिणामूर्त्ति में यह पद होता है। इसके अनन्तर 'तुभ्यंम्प्रह' पद होता है। वट मूल-इस पद के अन्त में पीछे निवासिने—यह पद होता है। २। इसके पश्चात् 'ध्यांनैक निरताय'—यह पद है और अन्त में 'ममः' पद होता है। 'रुद्राय शम्भ- वे'—ये पद हैं। यह तार शक्ति से अवरुद्ध कहा गया है। ३। यह मन्त्र चौबीस अक्षरों वाला होता है। यह मन्त्र समस्त कामनाओं के फलका प्रदान करने वाला होता है। इस मन्त्र के ऋषि शुक बतलाये गये हैं और इसका छन्द अनुष्टुप् बताया गया है। इसका देवता दक्षिणा मूर्त्ति शम्भु कहे गये हैं। छै वर्णों से इसका हृदय कहा गया है और दो से शिर कहा है । ४।५। आठ से शिखा कही गयी है और आठ वर्णों से कवच माना गया है। पांच वर्णों से नेत्र बताया है और तीन वर्णों से इसका अस्त्र उदाहृत किया गया है। ६। ये छे मार शब्द आद्य है और ह्लाङादि अन्त वाले से सजाति हैं। आचार्यों ने यथावत् अङ्ग मन्त्र बनाये हैं। ७।

३६४ ] [ श्री शारदा तिलक मूर्द्धिन भाले दृशोः श्रोत्रे गण्डयुग्मे सनासिके । आस्ये दोः सन्धिषु गले स्तयहृन्नाभिमण्डले ।८ कट्यां गुह्ये पुनः पादसन्धिष्वर्णान्न्यसेत्क्रमात् । व्यापकं तारशक्तिभ्यां कुर्याद्देहे ततःपरम् ।६ हेमाचलतटे रम्ये सिद्धकिन्नरसेविते । विविधद्रुमशाखाभिः सर्वतोवारितामपे ।१९० सुपुष्पितैर्लताजालैराश्लिष्टकुसुमद्रुमैः । शिलाविवरनिर्गच्छन्निर्झरानिलसेविते ।१९१ गायद्भृङ्गाङ्गनासङ्घैर्नृत्यद्बर्हिकदम्बके । कूजत्कोकिलसङ्घेन मुखरीकृतदिङ्‍मुखे ।१९२ परस्परविनिर्मुक्तमात्सर्यमृगसेविते । आद्यैः शुकाद्यैर्मुनिभिरजस्रं समुपस्थिते ।१९३ पुरन्दरमुखैर्देवैः सेवायातैर्विलोकितम् । वटवृक्षं महोच्छ्रायं पद्मरागफलोज्ज्वलम् ।१९४ मूर्धा में—ललाट में, नेत्रों में, श्रोत्र में, दोनों गण्ड स्थलों में, नासिका में, मुख में, बाहुओं की सन्धियों में, कण्ठ में, स्तर, हृदय में, नाभि मण्डल में, कटि में, गुह्य में, पादों की सन्धियों में क्रम से वर्णों का न्यास करना चाहिए। इसके पश्चात् तार और शक्ति से देह में व्यापक न्यास करे ।८-६। सिद्धों और किन्नरों के द्वारा सेवित सुरम्य हिमालय पर्वत के तट में जो अनेक द्रुमों की शाखाओंसे आतपके ताप को निवारित करने वाला है—जो सुपुष्पितलताओं के समुदाय से समा- श्लिष्ट कुसुमों वाले वृक्षों के द्वारा संयुत शिलाओं के विवरों से निकलने वाले निर्झरों से समन्वित वायु से सेवित हैं, जिसमें गान करने वाले भौंरियों का समुदाय विद्यमान हैं और नाचते हुये मयूरों का संघ है, वहां पर कूजन करने वाली कोयलों के समूह से दिशाओं का मुख शब्दायमान है, जहाँ पर आपसी मत्सरता का त्याग कर मृगगण विचरण कर रहे हैं, जहाँ आदि में होने वाले शुक आदि मुनिगण

सप्तदश पटल ] [ ३६५ निरन्तर समुपस्थित रहा करते हैं, जिसको सेवा के लिये समायात, इन्द्रादि देवों के द्वारा देखा गया है ऐसा एक बहुत बड़े उच्छ्राय वाला और पद्म राग के समान फलों से उज्ज्वल वट का वृक्ष है ।६-१४। गार्ुत्मतमयैः पत्रै र्निवडैरुपशोभितम् । नवरत्नमयाक पैर्लम्बमानैरलङ्कृतम् ।१५ जलजैः स्थलजैः पुष्पैरामादिभिरलङ्कृतम् । शृण्वद्भिर्वेदशास्त्राणि शुकवृन्दैर्निषेवितम् ।१६ संसारतापविच्छेदकुशलच्छायमद्भुतम् । विचिन्त्य तस्य मूलस्थे रत्नसिंहासने शुभे ।१७ आसीनममिताकल्पं शरच्चन्द्रनिभाननम् । स्तूयमानं मुनिगणैर्दिव्यज्ञानाभिलाषिभिः ।१८ संस्मरेज्जगतामाद्यं दक्षिणामूर्तिमव्ययम् ।१६ वह वट वृक्ष घने गारुत्मतमय पत्रों से उपशोभित हैं । नौ रत्नों से परिपूर्ण भूषणों से जो लटके हुए हैं यह समलंकृत है । यह वेद और शास्त्रों के श्रवण करने वाले शुकों के समुदायों के द्वारा निषेवित है और जल में स्थित तथा स्थल में स्थित सुगन्धित्व पुष्पों से अलंकृत है ।१५-१६। सांसारिक ताप के विच्छेद करने में कुशल छाया वाला अत्यन्त अद्भुत वह वट वृक्ष है । ऐसे वट वृक्ष का भली-भांति ध्यान करे और उसके मूल में स्थित एक परम शुभ रत्नों से निर्मित सिंहासन है ।१७। उस सिंहासन पर अपरिमित आभूषणोंसे समन्वित—शरत्काल में उदित होने वाले चन्द्र के समान मुख वाले—दिव्य ज्ञान के अभि- लाषी मुनिगणों के द्वारा स्तवन किये हुए जगत के आद्य-दक्षिणा मूर्ति अविनाशी का स्मरण करना चाहिए ।१८-१६। कैलासाद्रिनिभं शशाङ्कशकलस्फूर्जज्जटामण्डितम् । नासालोकनतत्परं त्रिनयनं वीरासनाध्यासितम् । मुद्राटङ्ककुरङ्गजानुविलसत्पाणि प्रसन्नाननम् । कक्षाबद्धभुजङ्गमं मुनिवृतं बन्दे महेशं परम् ।२०

३६६ ] [ श्री शारदा तिलक अयुतद्वयसंयुक्तं गुणलक्षं जपेन्मनुम । तद्दशांशन्तिलैः शुद्धैर्जुहुयात् क्षीवसंयुक्तैः ।२१ पञ्चाक्षरोदिते पीठे विधानेन प्रपूजयेत् । उपचारैः सयुत्पन्नैः पाद्याद्यैः परमेश्वरम् ।२२ एवं कृतपुरश्चर्यः सिद्धमन्त्रीभवेत्सुधीः । भिक्षाहारो जपेन्मासं मनुमेनं जितेन्द्रियः ।२३ नित्यं सहस्रमष्टाढूर्धं परं विन्दति वाङ् मयम् । त्रिवार जप्तमेतेन मनुना सलिलं पिबेत् ।२४ अब ध्यान करने का प्रकार बतलाया जाता है कैलाश गिरि के सदृश—चन्द्र के खण्ड से स्फूर्यमाण जटाओं से मण्डित—ध्यान की अवस्था में अपनों नासिका के अग्रभाग को देखनेमें परायण—तीन नेत्रों से समन्वित—वीरासन पर संस्थित, मुद्रा, टंक, कुरङ्ग और जानुपर अपना कर रखे हुए परम शोभित—प्रसन्न मुख वाले—कक्षोंमें आबद्ध सर्प से युक्त तथा मुनिगणों से परिवृत परम महेश की मैं वन्दना करता हूँ ।२०। इस मन्त्रका तीन लाख बीस सहस्र जप करना चाहिए इस जप का दशांश भाग क्षीर से संयुत शुद्ध तिलों से हवन करना चाहिए । पंचाक्षर—उदित पीठ पर विधि-विधान के साथ अभ्यर्चन करे । जो भी उस अवसर पर पूजाके उपचार उपस्थित होवे उनसे और पाद्यादिक के द्वारा परमेश्वर प्रभु का यजन करे ।२२। इस रीति से पुरश्चरण किये जाने पर सुधी मन्त्र को सिद्ध करने वाला हो जाया करता है । अपनी समस्त इन्द्रियों को जीत लेने वाला तथा भिक्षान्न द्वारा अशन क्रिया के सम्पादन करने वाला पुरुष इस मन्त्र का एक मास तक जप करे ।२३। जो नित्य ही एक सहस्र चार सौ बार मन्त्र का जप करता है वह परम वाङ्मय का लाभ किया करता है । इस मन्त्रसे तीन वार अभिमन्त्रित करके जल का पान करे ।२४। नित्यशो दक्षिणामूर्ति ध्यायन्साधकत्तमः । शास्त्रव्याख्यानसामर्थ्यं लभते वत्सरान्तरे ।२५

सप्तदश पटल ] [ ३६७ ब्राह्मीसैन्धवसिद्धार्थवचाकुष्ठकणोत्पलैः । सुगन्धिसंयुतैः कल्कैः शृतं ब्राह्मी रसे घृतम् ।२६ मनुनानेन सञ्जप्रेमयुतं साधुसाधितम् । निपीतं कविताकान्तिरक्षायुः श्रीधृतिप्रदम् ।२७ प्रणवो हृदयं पश्चात्ततो भगवते पदम् । ङेयुतो दक्षिणामतिर्मह्यं मेधामूदीरयेत् ।२८ प्रयच्छ ठद्वयान्तोऽय द्वाविंशत्यक्षरो मनुः । मुनिश्चतुर्मुखश्छन्दो गायत्री देवता मनोः ।२६ दक्षिणामूर्तिराख्यातो वेदव्याख्यानतत्परः । ताररुद्धैः स्वरैर्दीर्घैः षडभिरङ्गानि कल्पयेत् ।३० अथवा मनुसम्भूतैः पदैर्वा कल्पयेत्क्रमात् । पूर्वोक्तवतमूलस्थं चिन्तयेन्मन्त्रनायकम् ।३१ साधकों में श्रेष्ठ नित्य ही दक्षिणा मूर्त्ति का ध्यान करता हुआ एक वर्ष के अन्दर में ही शास्त्रोंके व्याख्यान करने की क्षमता प्राप्त कर लिया करता है ।२५। ब्राह्मी-सैन्धव-सिद्धार्थ-वच-कुष्ठ-कणोत्पल के सुगन्धियुत कल्कों को ब्राह्मी से ही रसयुक्त करके घृत को सिद्ध करे और इस मन्त्र से उसको अभिमंत्रित करे जो दश हजार वार जप करके करना चाहिए । ऐसे साधुतया साधित करे । इसका पान करे तो यह कविता की रचना करने की शक्ति-कान्ति-सुरक्षा आयु-श्री- और धृति के प्रदान करने वाला हुआ करता है ।२६-२७। अब अन्य मन्त्र का उद्धार बतलाया जाता है—प्रणव—ओंकार, हृदयं नमः यह पद फिर 'भगवते'—यह पद होता है । पीछे चतुर्थ्यन्तः दक्षिणा मूर्त्ति पद है । इसके अनन्तर 'मह्य' मेधा प्रयच्छ'—यह पद है । अन्तमें दो ठकार हैं—यह मन्त्र बाईस अक्षरों का होता है । इसका ऋषि चतुर्मुख है और छन्द गायत्री तथा देवता इस मन्त्र का दक्षिणामूर्ति कहे गये हैं, जो वेदों के व्याख्यान करने में तत्पर हैं । तार अर्थात् प्रणव से रुद्ध दीर्घ स्वरों से षट् अङ्गों की कल्पना करे ।२८-३०। अथवा

३६८ ] [ श्री शारदा तिलक मन्त्र से समुद्भूत पदों के द्वारा क्रम से करे। पूर्व में वर्णित विशाल एवं सुरम्य वट के मूल में विराजमान मन्त्र नायक का ध्यान करना चाहिए। ३१। स्फटिकरजतवर्णं मौक्तिकीमक्षमाला- ममृतकलशविद्याज्ञानमुद्राः कराग्रैः । दधतमुरगकक्षं चन्द्रचूडं त्रिनेत्र विधृतविविधभूषन्दक्षिणामूर्तिमीडे। ३२ लक्षमेकं जपेन्मन्त्रं ब्रह्मचारिव्रते स्थितः । जुहुयात्सघृतैः पद्मैर्दशांशं संस्कृतेऽनले । ३३ पूर्वोदिते यजेत्पीठे वक्ष्यमाणेन वर्त्मना । अङ्गानभ्यर्चयेद्बाह्ये पत्रेष्वष्टसु पूजयेत् । ३४ सरस्वती वाचयन्तीं पुस्तकं सस्मिताननाम् । ब्रह्माणं सनकं पश्चात्सनन्दनमतः परम् । ३५ सनत्कुमारनामानं शुकं व्यास गणेश्रवरम् । सिद्धगन्धर्वयोगीन्द्रविद्याधरगणान्वहिः । ३६ अब ध्यान बतलाया जाता है—स्फटिकमणि और रजत (चांदी) के समान वर्ण वाले हैं अर्थात् एकदम श्वेत वर्णसे युक्त हैं—कर-कमलों के अग्रभागों के द्वारा मौक्तिकों की अक्षमाला-अमृतका परिपूर्ण कलश विद्या और ज्ञान मुद्रा धारण करने वाले—अपनी कक्ष में उरग को रखते हुए—चूड़ा में चन्द्र के धारी तीन नेत्रों से समन्वित अनेक. भूषणों को धारण किये हुए भगवान् दक्षिणा मूर्त्ति का मैं ध्यान करता हूँ । ३२। ब्रह्मचर्य के व्रत में स्थित रहकर इस मन्त्र का एक लाख जप करना चाहिए। जप का दशांश भाग संस्कार किये हुए अग्नि में घृत के सहित पद्मों के द्वारा होम करना चाहिए। पूर्व में वर्णित पीठ पर कहे जाने वाले मार्ग से यजन करे। अङ्गों का वाहर में अभ्यर्चन करे और आठ पत्रों में पूजन करना चाहिए ।३३-३४। पुस्तक का वाचन करती हुई सरस्वती देवीका, जिसके मुख पर मन्द हास्य क्रीड़ा कर रहा

ससदश पटल ] [ ३६६ है, ब्रह्माजी का—सनक और पीछे सनन्दन—सनत्कुमार नामधारी का शुक मुनिका व्यासदेव का—गणेश्वर का और बाहर सिद्ध, गन्धर्व, योगीन्द्र, विद्याधर गणों का अर्चन करना चाहिए ।३५-३६। बाह्ये लोकेश्वरा नर्चेद्वज्राद्यायुधसंयुतान् । इत्थं पूजादिभिः सिद्धे मन्त्रेऽस्मिन्साधकोत्तमः ॥३७ वल्लभोजायते वाचां वाचस्पतिरिवापरः । मन्त्रेणानेन सञ्जप्तै विशुद्धैः सलिलैः सुधीः ॥३८ अभिषिञ्चेत्स्वशिरसि श्रियमारोग्यमाप्नुयात् । कण्ठमात्रे जले स्थित्वा जपेन्मन्त्रं सहस्रकम् ॥३९ प्रत्यहं मण्डलादर्वाक्कवीनामग्रणीर्भवेत् । गौर्या पार्श्वस्थया सार्द्धं श्रीकामी चिन्तयन्विभुम् ॥४० अयुतं प्रजपेन्मन्त्रं भूयसीं श्रियमाप्नुयात् । भुञ्जानः प्रयतो मन्त्री गोमूत्रं शृतमोदनम् ॥४१ भिक्षान्नंमथवा मन्त्रमयुतद्वितयं जपेत् । अथ तान्वेदशास्त्रादीन् व्याचष्टे नात्र संशयः ॥४२ इसके बाहर मन्त्र आदि अपने आयुधों से समन्वित लोकेश्वरों का पूजन करे । इस प्रकार से पूजा आदि के द्वारा इस मन्त्र के सिद्ध हो जाने पर साधकों में परम श्रेष्ठ वाणी का प्रिय हो जाता है अर्थात् सरस्वती देवी का प्यारा बन जाया करता है और वह दूसरा वृहस्पति ही हो जाया करता है । सुधी पुरुष इस मन्त्र के द्वारा भली भाँति जाप किए हुए विशुद्ध जल से अपने मस्तक में अभिषिञ्चन करे तो श्री और आरोग्य की प्राप्ति कर लेता है । कण्ठ पर्यन्त किसी जलाशय अथवा तीर्थोदक में खड़े होकर इस मन्त्र का एक सहस्र जप करे और ऐसा जप प्रतिदिन किया करे तो मण्डल से पूर्व ही ऋषियों का अग्रणी अर्थात् नायक हो जाया करता है । श्री की कामना रखने वाला पुरुष पार्श्व में विराजमाना गौरी के साथ विभुका चिन्तन करे ।३७-४०। मंत्र धारण करने वाला यदि दश सहस्र मन्त्र का जप करे तो बहुत अधिक

४०० ] [ श्री शारदा तिलक श्रीका लाभ किया करता है। मन्त्रधारी प्रयत होकर रहे और गो मूत्र में पकाये हुए ओदन का अशन करे अथवा भिक्षा के अन्न का आहार करे और बीस हजार मन्त्र का जप करे तो वह पुरुष बिना सुने हुए वेद शास्त्र आदि की व्याख्या करने की क्षमता प्राप्त कर लिया करता है— इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।४१-४२। सिद्धगन्धर्वमुनिभिर्योगोन्द्रै रपिसेविते । ज्ञानवार्गाथनां प्रीतयै कथितौ मन्त्रनायकौ ।४३ लौहितोग्न्यासनः सद्यबिन्दुमान्प्रथमं ततः । द्वितीयं वहिनबीज स्याद्दीर्घा शान्तीन्दुभूषिता ।४४ तृतीयं लाङ्गली सर्गी मन्त्रोबीजत्रयान्वितः । नीलकण्ठात्मकः प्रोक्तोविषद्वयहरः परः ।४५ हरद्वयं वह्निजाया हृदयं परिकीर्तितम् । कपर्दिने ठयुगलं शिरोमन्त्र उदाहृतः ।४६ नीलकण्ठाय ठद्वन्द्वं शिखामन्त्र उदाहृतः । कालकूटपदस्यान्ते विषभक्षणङेयुतम् ।४७ सिद्ध, गन्धर्व, मुनियों के द्वारा तथा योगीन्द्रों के द्वारा सेवित ज्ञानयोग के अर्थियों की प्रीति के लिए ये मन्त्र नायक कहे गये हैं ।४३। अब भगवान् नीलकण्ठ के मन्त्र को बतलाते हैं—लोहित—पः, अग्नि— रेफ के आसन वाला, सद्य, ओ और विन्दु—अनुस्वार से युक्त होवे । फिर प्रथमं—तः वह्निबीज—रेफ, दीर्घा—णकार, शान्ति—ई, और बिंदु—अनुस्वार से संयुक्त होवे । लाङ्गली—टकार, सर्ग—विसर्ग से संयुक्त होवे । यह तीन बीजों से अन्वित मन्त्र हैं । नीलकण्ठ के स्वरूप वाला दोनों (स्थावर-जङ्गम) विषों के परम हरण करने वाला कहा गया है ।४४-४५। दोनों हर् और वह्निजाया (स्वाहा) इसका हृदय कीर्त्तित किये गये हैं । 'कपर्दिद ने युगल ठकार' शिरो मन्त्र उदाहृत किया है ।४६। नीलकण्ठाय–दो ठकार, शिखा मंत्र बताया है । कालकूट इस पद के अन्त में चतुर्थ्यन्त विष भक्षण है ।४७।

सप्तदश पटल ] [ ४०१ हुँ फट् कवचमादिष्टं विद्वद्भिर्नीलकण्ठिने । स्वाहान्तमस्तमेतानि पञ्चांगानि मनीर्विदुः ।४८ मूर्द्धिन कण्ठे हृदयम्भोझे क्रमाद्वीजत्रयं न्यसेत् । ततः समाहितोभूत्वा नीलकण्ठं विचिन्तयेत् ।४६ वालाकार्यततेजसन्धृतजटाजूटेन्दुखण्डोज्ज्वलम् । नागेन्द्रैः कृतभूषणं जपवटी शूलं कपालङ्करैः ॥ खट्वांगं दधतं त्रिनेत्रविलसत्पञ्चाननं सुन्दरम् । व्याघ्रत्वक्परिधानमब्जनिलयं श्रीनीलकण्ठं भजे ।५० लक्षत्रयं जपेन्मन्त्रं तद्दशांशं ससर्पिषा । हविषा जुहुयात्सम्यक् संस्कृते हव्यवाहने ।५१ शैवे पीठे यजेदेनं मृत्युञ्जयविधानतः । एवं पूजादिभिः सिद्धे मनौ मन्त्रीविषद्वयम् ।५२ हुँफट्—इसका विद्वानों ने कवच समादिष्ट किया है। लीलकंठिने से स्वाहा के अन्त तक इसका अस्त्र बताया गया है । ये इस मन्त्र के पाँच अंग जानने चाहिए ।४८। मूर्धा में—कण्ठ में और हृदय कमल में क्रम से तीनों बीजों का न्यास करना चाहिए। इसके अनन्तर परम सावधान होकर वे भगवान् नीलकण्ठ प्रभु का ध्यान करना चाहिए ।४६। अब ध्यान करने की रीति बतलाई जाती है—बालसूर्य के सहित तेजयुक्त भली भाँति धारण की हुई जटा जूट में चन्द्र के खण्ड से समुज्ज्वल—नागेन्द्रोंके द्वारा भूषणों की रचना किये हुए—करकमलोंमें शूल—कपाल और खट्वांग को धारण करने वाले—तीन नेत्रों से शोभित पाँच मुखों से संयुत, सुंदर, व्याघ्र के चर्म का परिधान करने वाले—अब्ज में निवास करते हुए श्री नीलकण्ठ का मैं भजन करता हूँ ।५०। इस मंत्र का तीन लाख जप करे और जप का दशांश घृत युक्त हवि से हवन करना चाहिए जो कि सुसंस्कृत अग्नि में भली भाँति किया जावे ।५१। मृत्युञ्जय के विधान से शैव पीठ पर इनका यजन करना चाहिए । इस रीति से पूजन आदि के द्वारा मंत्र के सिद्ध