शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदश पटल ] [ ३६५ निरन्तर समुपस्थित रहा करते हैं, जिसको सेवा के लिये समायात, इन्द्रादि देवों के द्वारा देखा गया है ऐसा एक बहुत बड़े उच्छ्राय वाला और पद्म राग के समान फलों से उज्ज्वल वट का वृक्ष है ।६-१४। गार्ुत्मतमयैः पत्रै र्निवडैरुपशोभितम् । नवरत्नमयाक पैर्लम्बमानैरलङ्कृतम् ।१५ जलजैः स्थलजैः पुष्पैरामादिभिरलङ्कृतम् । शृण्वद्भिर्वेदशास्त्राणि शुकवृन्दैर्निषेवितम् ।१६ संसारतापविच्छेदकुशलच्छायमद्भुतम् । विचिन्त्य तस्य मूलस्थे रत्नसिंहासने शुभे ।१७ आसीनममिताकल्पं शरच्चन्द्रनिभाननम् । स्तूयमानं मुनिगणैर्दिव्यज्ञानाभिलाषिभिः ।१८ संस्मरेज्जगतामाद्यं दक्षिणामूर्तिमव्ययम् ।१६ वह वट वृक्ष घने गारुत्मतमय पत्रों से उपशोभित हैं । नौ रत्नों से परिपूर्ण भूषणों से जो लटके हुए हैं यह समलंकृत है । यह वेद और शास्त्रों के श्रवण करने वाले शुकों के समुदायों के द्वारा निषेवित है और जल में स्थित तथा स्थल में स्थित सुगन्धित्व पुष्पों से अलंकृत है ।१५-१६। सांसारिक ताप के विच्छेद करने में कुशल छाया वाला अत्यन्त अद्भुत वह वट वृक्ष है । ऐसे वट वृक्ष का भली-भांति ध्यान करे और उसके मूल में स्थित एक परम शुभ रत्नों से निर्मित सिंहासन है ।१७। उस सिंहासन पर अपरिमित आभूषणोंसे समन्वित—शरत्काल में उदित होने वाले चन्द्र के समान मुख वाले—दिव्य ज्ञान के अभि- लाषी मुनिगणों के द्वारा स्तवन किये हुए जगत के आद्य-दक्षिणा मूर्ति अविनाशी का स्मरण करना चाहिए ।१८-१६। कैलासाद्रिनिभं शशाङ्कशकलस्फूर्जज्जटामण्डितम् । नासालोकनतत्परं त्रिनयनं वीरासनाध्यासितम् । मुद्राटङ्ककुरङ्गजानुविलसत्पाणि प्रसन्नाननम् । कक्षाबद्धभुजङ्गमं मुनिवृतं बन्दे महेशं परम् ।२०