भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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३६४ ] [ श्री शारदा तिलक मूर्द्धिन भाले दृशोः श्रोत्रे गण्डयुग्मे सनासिके । आस्ये दोः सन्धिषु गले स्तयहृन्नाभिमण्डले ।८ कट्यां गुह्ये पुनः पादसन्धिष्वर्णान्न्यसेत्क्रमात् । व्यापकं तारशक्तिभ्यां कुर्याद्देहे ततःपरम् ।६ हेमाचलतटे रम्ये सिद्धकिन्नरसेविते । विविधद्रुमशाखाभिः सर्वतोवारितामपे ।१९० सुपुष्पितैर्लताजालैराश्लिष्टकुसुमद्रुमैः । शिलाविवरनिर्गच्छन्निर्झरानिलसेविते ।१९१ गायद्भृङ्गाङ्गनासङ्घैर्नृत्यद्बर्हिकदम्बके । कूजत्कोकिलसङ्घेन मुखरीकृतदिङ्‍मुखे ।१९२ परस्परविनिर्मुक्तमात्सर्यमृगसेविते । आद्यैः शुकाद्यैर्मुनिभिरजस्रं समुपस्थिते ।१९३ पुरन्दरमुखैर्देवैः सेवायातैर्विलोकितम् । वटवृक्षं महोच्छ्रायं पद्मरागफलोज्ज्वलम् ।१९४ मूर्धा में—ललाट में, नेत्रों में, श्रोत्र में, दोनों गण्ड स्थलों में, नासिका में, मुख में, बाहुओं की सन्धियों में, कण्ठ में, स्तर, हृदय में, नाभि मण्डल में, कटि में, गुह्य में, पादों की सन्धियों में क्रम से वर्णों का न्यास करना चाहिए। इसके पश्चात् तार और शक्ति से देह में व्यापक न्यास करे ।८-६। सिद्धों और किन्नरों के द्वारा सेवित सुरम्य हिमालय पर्वत के तट में जो अनेक द्रुमों की शाखाओंसे आतपके ताप को निवारित करने वाला है—जो सुपुष्पितलताओं के समुदाय से समा- श्लिष्ट कुसुमों वाले वृक्षों के द्वारा संयुत शिलाओं के विवरों से निकलने वाले निर्झरों से समन्वित वायु से सेवित हैं, जिसमें गान करने वाले भौंरियों का समुदाय विद्यमान हैं और नाचते हुये मयूरों का संघ है, वहां पर कूजन करने वाली कोयलों के समूह से दिशाओं का मुख शब्दायमान है, जहाँ पर आपसी मत्सरता का त्याग कर मृगगण विचरण कर रहे हैं, जहाँ आदि में होने वाले शुक आदि मुनिगण