शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 393, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तदश पटल ] [ ३६३ ध्यानेकनिरयाङ्गाय पश्चाद्ब्रूयान्नमः पदम्। रुद्राय शम्भवे तारशक्तिरुद्धोऽयमीरितः। ३ षट्त्रिंशदक्षरोमन्त्रः सर्वकामफलप्रदः। मुनिः शुकः समुद्दिष्टश्छन्दोऽनुष्टुप्समीरितम्। ४ दक्षिणामूर्त्तिनामास्य देवता शम्भुरीरितः। षड्भिर्वर्णैर्हृदाख्यातं द्वाभ्यां शिर उदीरितम्। ५ शिखाष्टभिः समुद्दिष्टा वस्वर्णैः कवचं मतम्। पञ्चभिर्नेत्रमाख्यातं त्रिभिरस्त्रमुदाहृतम्। ६ षडेते मारशब्दाद्या ह्लाड्यन्ताः सजातयः। अङ्गमन्त्राः समुद्दिष्टा यथावद्देशिकोत्तमैः। ७ इसके अनन्तर समस्त पुरुषार्थों के प्रदान करने वाले मन्त्र रत्न को बतलाया जाता है जिसके जप करने से मुनीश्वरों ने दिव्य ज्ञान को प्राप्त कर लिया था। १। मन्त्र का जोकि श्लोक के स्वरूप वाला है अब उसका उद्धार बतलाया जाता है—पूर्व में दक्षिणामूर्त्ति में यह पद होता है। इसके अनन्तर 'तुभ्यंम्प्रह' पद होता है। वट मूल-इस पद के अन्त में पीछे निवासिने—यह पद होता है। २। इसके पश्चात् 'ध्यांनैक निरताय'—यह पद है और अन्त में 'ममः' पद होता है। 'रुद्राय शम्भ- वे'—ये पद हैं। यह तार शक्ति से अवरुद्ध कहा गया है। ३। यह मन्त्र चौबीस अक्षरों वाला होता है। यह मन्त्र समस्त कामनाओं के फलका प्रदान करने वाला होता है। इस मन्त्र के ऋषि शुक बतलाये गये हैं और इसका छन्द अनुष्टुप् बताया गया है। इसका देवता दक्षिणा मूर्त्ति शम्भु कहे गये हैं। छै वर्णों से इसका हृदय कहा गया है और दो से शिर कहा है । ४।५। आठ से शिखा कही गयी है और आठ वर्णों से कवच माना गया है। पांच वर्णों से नेत्र बताया है और तीन वर्णों से इसका अस्त्र उदाहृत किया गया है। ६। ये छे मार शब्द आद्य है और ह्लाङादि अन्त वाले से सजाति हैं। आचार्यों ने यथावत् अङ्ग मन्त्र बनाये हैं। ७।