शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 392, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें३६२ ] [ श्री शारदा तिलक अभिषेकोऽयमाख्यातः कीर्तिलक्ष्मीं जयप्रदः ।१३५ मध्ये साध्याक्षराढ्यं ध्रुवमभिविलिखेन्मध्यमं दिग्दलस्थम् । कोणेष्वन्त्यं मनोस्तत्क्षितिभुवनमथोदिक्षुच द्रं विदिक्षु । टान्तं यन्त्रं तदुक्तं सकलभयहरं क्ष्वेडभूतापमृत्यु- व्याधिव्यामोहदुःखप्रशमनमुदितं श्रीप्रदं कीर्तिदायि ।१३६ परम विनम्र और दी हुई दक्षिणा वाले साध्य का इसके जल से अभिषेक नित्य ही करे तो अभिषिंचत समस्त आधियाँ-व्याधियाँ- महान् रोग और कृत्या के द्रोह का विनाश करने वाला हुआ करता है ।१३४। यह इस प्रकार से किया हुआ अभिषेक कीर्ति-लक्ष्मी और विजयके प्रदान करने वाला कहा गया है ।१३५। अब एक यंत्र बतलाया जाता है-मध्य में साध्य के अक्षरों से युक्त ध्रुवको लिखे । मध्य का अभिप्राय कर्णिका होता है । मध्यम दिग्दलों में स्थित करे और कर्णोंमें मन्त्र का अन्त्य लिखे । दिशाओं में क्षितिभुवन और विदिशाओंमें चंद्र लिखे । वह मंत्र टांत कहा गया है । यह सब प्रकार के भयों के हरण करने वाला है । इस यंत्र को क्ष्वेड-भूत-अपमृत्यु-व्याधि व्यामोह दुःखों का शमन करने वाला तथा श्री का प्रदाता और कीर्ति का देने वाला बताया गया है ।१३५-१३६। —x— सप्तदश पटल पुरुषार्थ मन्त्र अथ वक्ष्ये मन्त्ररत्नं समस्तपुरुषार्थदम् । अवापुर्येन जप्तेन दिव्यं ज्ञान मुनीश्वराः ।१ दक्षिणामूर्तये पूर्वं तुभ्य पदमनन्तरम् । वटमूलपदस्यान्ते पदं पश्चान्निवासिने ।२