भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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षोडश पटल ] [ ३८१ सिद्धान्नैर्विहितो होमो महाज्वरविनाशनः । अपामार्गसमिद्धोमः सर्वामयनिषूदनः ।१३० प्रणवरचितनालं मन्त्रमष्टार्णपत्रं भृगुविलसितमध्यं पद्ममुग्मं तदन्तः । कृतवसतिमुमेशं वर्गनिर्यत्सुधार्द्रं कलयतु हृदि नित्यं सर्वदुःखप्रशान्त्यैः ।१३१ यन्त्राढ्ये कमले सौम्ये कलशं प्रोक्तवर्त्मना । नवरत्नसमायुक्तं दुकूलाभ्याममलङ्कृतम् ।१३२ आपूर्य सलिलैः शुद्धैस्तस्मिन्देवं प्रपूजयेत् । उपचारैः षोडशभिर्विधानेन विधानवित् ।१३३ सुधा वल्ली—कश्मरी और बकुल की समुद्भूत समिधाओंसे अग्नि में होम करने वाला मनुष्य सब प्रकार की मृत्यु और ग्रहों के अपहरण करने वाला होता है ।१२६। सिद्ध अन्नों के द्वारा किया हुआ होम महा- ज्वर के विनाश करने वाला होता है । अपामार्ग की समिधाओं से किया हुआ होम सभी रोगों का विनाश करने वाला हुआ करता है । ।१३०। प्रणव के द्वारा विरचित नाल वाला—पत्रों के मध्य में मन्त्र के वर्ण होवें — विसर्ग सहित सकार से युक्त मध्य होवे—उसके अन्दर पत्रों का युग्म होवे—वर्णों से निर्यत्सुधा के लिए निवास करने वाले उमेश को कलिन करे । यह मन्त्र हृदय में नित्य ही सब दुःखों की प्रशान्ति करने के लिए होता है ।१३१। यन्त्र से युक्त सौम्य कमल में कहे हुए मार्ग के द्वारा नौ प्रकार के रत्नों से समायुक्त और दो वस्त्रों से अलंकृत कलश स्थापित करे और उसको शुद्ध जल से पूरित कर देवे । इस कलश में देव का अभ्यर्चन करना चाहिए । विधान के ज्ञाता पुरुष को विधि के साथ सोलह पूजन के उपचारों के द्वारा अर्चन करना चाहिए । ।१३२-१३३। अभिषिञ्चेत्प्रियं साध्यं विनीतं दत्तदक्षिणम् । आधिव्याधिमहारोगकृत्याद्रोहनिवारणम् ।१३४