भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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३६६ ] [ श्री शारदा तिलक अयुतद्वयसंयुक्तं गुणलक्षं जपेन्मनुम । तद्दशांशन्तिलैः शुद्धैर्जुहुयात् क्षीवसंयुक्तैः ।२१ पञ्चाक्षरोदिते पीठे विधानेन प्रपूजयेत् । उपचारैः सयुत्पन्नैः पाद्याद्यैः परमेश्वरम् ।२२ एवं कृतपुरश्चर्यः सिद्धमन्त्रीभवेत्सुधीः । भिक्षाहारो जपेन्मासं मनुमेनं जितेन्द्रियः ।२३ नित्यं सहस्रमष्टाढूर्धं परं विन्दति वाङ् मयम् । त्रिवार जप्तमेतेन मनुना सलिलं पिबेत् ।२४ अब ध्यान करने का प्रकार बतलाया जाता है कैलाश गिरि के सदृश—चन्द्र के खण्ड से स्फूर्यमाण जटाओं से मण्डित—ध्यान की अवस्था में अपनों नासिका के अग्रभाग को देखनेमें परायण—तीन नेत्रों से समन्वित—वीरासन पर संस्थित, मुद्रा, टंक, कुरङ्ग और जानुपर अपना कर रखे हुए परम शोभित—प्रसन्न मुख वाले—कक्षोंमें आबद्ध सर्प से युक्त तथा मुनिगणों से परिवृत परम महेश की मैं वन्दना करता हूँ ।२०। इस मन्त्रका तीन लाख बीस सहस्र जप करना चाहिए इस जप का दशांश भाग क्षीर से संयुत शुद्ध तिलों से हवन करना चाहिए । पंचाक्षर—उदित पीठ पर विधि-विधान के साथ अभ्यर्चन करे । जो भी उस अवसर पर पूजाके उपचार उपस्थित होवे उनसे और पाद्यादिक के द्वारा परमेश्वर प्रभु का यजन करे ।२२। इस रीति से पुरश्चरण किये जाने पर सुधी मन्त्र को सिद्ध करने वाला हो जाया करता है । अपनी समस्त इन्द्रियों को जीत लेने वाला तथा भिक्षान्न द्वारा अशन क्रिया के सम्पादन करने वाला पुरुष इस मन्त्र का एक मास तक जप करे ।२३। जो नित्य ही एक सहस्र चार सौ बार मन्त्र का जप करता है वह परम वाङ्मय का लाभ किया करता है । इस मन्त्रसे तीन वार अभिमन्त्रित करके जल का पान करे ।२४। नित्यशो दक्षिणामूर्ति ध्यायन्साधकत्तमः । शास्त्रव्याख्यानसामर्थ्यं लभते वत्सरान्तरे ।२५