शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 397, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तदश पटल ] [ ३६७ ब्राह्मीसैन्धवसिद्धार्थवचाकुष्ठकणोत्पलैः । सुगन्धिसंयुतैः कल्कैः शृतं ब्राह्मी रसे घृतम् ।२६ मनुनानेन सञ्जप्रेमयुतं साधुसाधितम् । निपीतं कविताकान्तिरक्षायुः श्रीधृतिप्रदम् ।२७ प्रणवो हृदयं पश्चात्ततो भगवते पदम् । ङेयुतो दक्षिणामतिर्मह्यं मेधामूदीरयेत् ।२८ प्रयच्छ ठद्वयान्तोऽय द्वाविंशत्यक्षरो मनुः । मुनिश्चतुर्मुखश्छन्दो गायत्री देवता मनोः ।२६ दक्षिणामूर्तिराख्यातो वेदव्याख्यानतत्परः । ताररुद्धैः स्वरैर्दीर्घैः षडभिरङ्गानि कल्पयेत् ।३० अथवा मनुसम्भूतैः पदैर्वा कल्पयेत्क्रमात् । पूर्वोक्तवतमूलस्थं चिन्तयेन्मन्त्रनायकम् ।३१ साधकों में श्रेष्ठ नित्य ही दक्षिणा मूर्त्ति का ध्यान करता हुआ एक वर्ष के अन्दर में ही शास्त्रोंके व्याख्यान करने की क्षमता प्राप्त कर लिया करता है ।२५। ब्राह्मी-सैन्धव-सिद्धार्थ-वच-कुष्ठ-कणोत्पल के सुगन्धियुत कल्कों को ब्राह्मी से ही रसयुक्त करके घृत को सिद्ध करे और इस मन्त्र से उसको अभिमंत्रित करे जो दश हजार वार जप करके करना चाहिए । ऐसे साधुतया साधित करे । इसका पान करे तो यह कविता की रचना करने की शक्ति-कान्ति-सुरक्षा आयु-श्री- और धृति के प्रदान करने वाला हुआ करता है ।२६-२७। अब अन्य मन्त्र का उद्धार बतलाया जाता है—प्रणव—ओंकार, हृदयं नमः यह पद फिर 'भगवते'—यह पद होता है । पीछे चतुर्थ्यन्तः दक्षिणा मूर्त्ति पद है । इसके अनन्तर 'मह्य' मेधा प्रयच्छ'—यह पद है । अन्तमें दो ठकार हैं—यह मन्त्र बाईस अक्षरों का होता है । इसका ऋषि चतुर्मुख है और छन्द गायत्री तथा देवता इस मन्त्र का दक्षिणामूर्ति कहे गये हैं, जो वेदों के व्याख्यान करने में तत्पर हैं । तार अर्थात् प्रणव से रुद्ध दीर्घ स्वरों से षट् अङ्गों की कल्पना करे ।२८-३०। अथवा