शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 398, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें३६८ ] [ श्री शारदा तिलक मन्त्र से समुद्भूत पदों के द्वारा क्रम से करे। पूर्व में वर्णित विशाल एवं सुरम्य वट के मूल में विराजमान मन्त्र नायक का ध्यान करना चाहिए। ३१। स्फटिकरजतवर्णं मौक्तिकीमक्षमाला- ममृतकलशविद्याज्ञानमुद्राः कराग्रैः । दधतमुरगकक्षं चन्द्रचूडं त्रिनेत्र विधृतविविधभूषन्दक्षिणामूर्तिमीडे। ३२ लक्षमेकं जपेन्मन्त्रं ब्रह्मचारिव्रते स्थितः । जुहुयात्सघृतैः पद्मैर्दशांशं संस्कृतेऽनले । ३३ पूर्वोदिते यजेत्पीठे वक्ष्यमाणेन वर्त्मना । अङ्गानभ्यर्चयेद्बाह्ये पत्रेष्वष्टसु पूजयेत् । ३४ सरस्वती वाचयन्तीं पुस्तकं सस्मिताननाम् । ब्रह्माणं सनकं पश्चात्सनन्दनमतः परम् । ३५ सनत्कुमारनामानं शुकं व्यास गणेश्रवरम् । सिद्धगन्धर्वयोगीन्द्रविद्याधरगणान्वहिः । ३६ अब ध्यान बतलाया जाता है—स्फटिकमणि और रजत (चांदी) के समान वर्ण वाले हैं अर्थात् एकदम श्वेत वर्णसे युक्त हैं—कर-कमलों के अग्रभागों के द्वारा मौक्तिकों की अक्षमाला-अमृतका परिपूर्ण कलश विद्या और ज्ञान मुद्रा धारण करने वाले—अपनी कक्ष में उरग को रखते हुए—चूड़ा में चन्द्र के धारी तीन नेत्रों से समन्वित अनेक. भूषणों को धारण किये हुए भगवान् दक्षिणा मूर्त्ति का मैं ध्यान करता हूँ । ३२। ब्रह्मचर्य के व्रत में स्थित रहकर इस मन्त्र का एक लाख जप करना चाहिए। जप का दशांश भाग संस्कार किये हुए अग्नि में घृत के सहित पद्मों के द्वारा होम करना चाहिए। पूर्व में वर्णित पीठ पर कहे जाने वाले मार्ग से यजन करे। अङ्गों का वाहर में अभ्यर्चन करे और आठ पत्रों में पूजन करना चाहिए ।३३-३४। पुस्तक का वाचन करती हुई सरस्वती देवीका, जिसके मुख पर मन्द हास्य क्रीड़ा कर रहा