शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंससदश पटल ] [ ३६६ है, ब्रह्माजी का—सनक और पीछे सनन्दन—सनत्कुमार नामधारी का शुक मुनिका व्यासदेव का—गणेश्वर का और बाहर सिद्ध, गन्धर्व, योगीन्द्र, विद्याधर गणों का अर्चन करना चाहिए ।३५-३६। बाह्ये लोकेश्वरा नर्चेद्वज्राद्यायुधसंयुतान् । इत्थं पूजादिभिः सिद्धे मन्त्रेऽस्मिन्साधकोत्तमः ॥३७ वल्लभोजायते वाचां वाचस्पतिरिवापरः । मन्त्रेणानेन सञ्जप्तै विशुद्धैः सलिलैः सुधीः ॥३८ अभिषिञ्चेत्स्वशिरसि श्रियमारोग्यमाप्नुयात् । कण्ठमात्रे जले स्थित्वा जपेन्मन्त्रं सहस्रकम् ॥३९ प्रत्यहं मण्डलादर्वाक्कवीनामग्रणीर्भवेत् । गौर्या पार्श्वस्थया सार्द्धं श्रीकामी चिन्तयन्विभुम् ॥४० अयुतं प्रजपेन्मन्त्रं भूयसीं श्रियमाप्नुयात् । भुञ्जानः प्रयतो मन्त्री गोमूत्रं शृतमोदनम् ॥४१ भिक्षान्नंमथवा मन्त्रमयुतद्वितयं जपेत् । अथ तान्वेदशास्त्रादीन् व्याचष्टे नात्र संशयः ॥४२ इसके बाहर मन्त्र आदि अपने आयुधों से समन्वित लोकेश्वरों का पूजन करे । इस प्रकार से पूजा आदि के द्वारा इस मन्त्र के सिद्ध हो जाने पर साधकों में परम श्रेष्ठ वाणी का प्रिय हो जाता है अर्थात् सरस्वती देवी का प्यारा बन जाया करता है और वह दूसरा वृहस्पति ही हो जाया करता है । सुधी पुरुष इस मन्त्र के द्वारा भली भाँति जाप किए हुए विशुद्ध जल से अपने मस्तक में अभिषिञ्चन करे तो श्री और आरोग्य की प्राप्ति कर लेता है । कण्ठ पर्यन्त किसी जलाशय अथवा तीर्थोदक में खड़े होकर इस मन्त्र का एक सहस्र जप करे और ऐसा जप प्रतिदिन किया करे तो मण्डल से पूर्व ही ऋषियों का अग्रणी अर्थात् नायक हो जाया करता है । श्री की कामना रखने वाला पुरुष पार्श्व में विराजमाना गौरी के साथ विभुका चिन्तन करे ।३७-४०। मंत्र धारण करने वाला यदि दश सहस्र मन्त्र का जप करे तो बहुत अधिक