भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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४०० ] [ श्री शारदा तिलक श्रीका लाभ किया करता है। मन्त्रधारी प्रयत होकर रहे और गो मूत्र में पकाये हुए ओदन का अशन करे अथवा भिक्षा के अन्न का आहार करे और बीस हजार मन्त्र का जप करे तो वह पुरुष बिना सुने हुए वेद शास्त्र आदि की व्याख्या करने की क्षमता प्राप्त कर लिया करता है— इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।४१-४२। सिद्धगन्धर्वमुनिभिर्योगोन्द्रै रपिसेविते । ज्ञानवार्गाथनां प्रीतयै कथितौ मन्त्रनायकौ ।४३ लौहितोग्न्यासनः सद्यबिन्दुमान्प्रथमं ततः । द्वितीयं वहिनबीज स्याद्दीर्घा शान्तीन्दुभूषिता ।४४ तृतीयं लाङ्गली सर्गी मन्त्रोबीजत्रयान्वितः । नीलकण्ठात्मकः प्रोक्तोविषद्वयहरः परः ।४५ हरद्वयं वह्निजाया हृदयं परिकीर्तितम् । कपर्दिने ठयुगलं शिरोमन्त्र उदाहृतः ।४६ नीलकण्ठाय ठद्वन्द्वं शिखामन्त्र उदाहृतः । कालकूटपदस्यान्ते विषभक्षणङेयुतम् ।४७ सिद्ध, गन्धर्व, मुनियों के द्वारा तथा योगीन्द्रों के द्वारा सेवित ज्ञानयोग के अर्थियों की प्रीति के लिए ये मन्त्र नायक कहे गये हैं ।४३। अब भगवान् नीलकण्ठ के मन्त्र को बतलाते हैं—लोहित—पः, अग्नि— रेफ के आसन वाला, सद्य, ओ और विन्दु—अनुस्वार से युक्त होवे । फिर प्रथमं—तः वह्निबीज—रेफ, दीर्घा—णकार, शान्ति—ई, और बिंदु—अनुस्वार से संयुक्त होवे । लाङ्गली—टकार, सर्ग—विसर्ग से संयुक्त होवे । यह तीन बीजों से अन्वित मन्त्र हैं । नीलकण्ठ के स्वरूप वाला दोनों (स्थावर-जङ्गम) विषों के परम हरण करने वाला कहा गया है ।४४-४५। दोनों हर् और वह्निजाया (स्वाहा) इसका हृदय कीर्त्तित किये गये हैं । 'कपर्दिद ने युगल ठकार' शिरो मन्त्र उदाहृत किया है ।४६। नीलकण्ठाय–दो ठकार, शिखा मंत्र बताया है । कालकूट इस पद के अन्त में चतुर्थ्यन्त विष भक्षण है ।४७।