शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 401, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तदश पटल ] [ ४०१ हुँ फट् कवचमादिष्टं विद्वद्भिर्नीलकण्ठिने । स्वाहान्तमस्तमेतानि पञ्चांगानि मनीर्विदुः ।४८ मूर्द्धिन कण्ठे हृदयम्भोझे क्रमाद्वीजत्रयं न्यसेत् । ततः समाहितोभूत्वा नीलकण्ठं विचिन्तयेत् ।४६ वालाकार्यततेजसन्धृतजटाजूटेन्दुखण्डोज्ज्वलम् । नागेन्द्रैः कृतभूषणं जपवटी शूलं कपालङ्करैः ॥ खट्वांगं दधतं त्रिनेत्रविलसत्पञ्चाननं सुन्दरम् । व्याघ्रत्वक्परिधानमब्जनिलयं श्रीनीलकण्ठं भजे ।५० लक्षत्रयं जपेन्मन्त्रं तद्दशांशं ससर्पिषा । हविषा जुहुयात्सम्यक् संस्कृते हव्यवाहने ।५१ शैवे पीठे यजेदेनं मृत्युञ्जयविधानतः । एवं पूजादिभिः सिद्धे मनौ मन्त्रीविषद्वयम् ।५२ हुँफट्—इसका विद्वानों ने कवच समादिष्ट किया है। लीलकंठिने से स्वाहा के अन्त तक इसका अस्त्र बताया गया है । ये इस मन्त्र के पाँच अंग जानने चाहिए ।४८। मूर्धा में—कण्ठ में और हृदय कमल में क्रम से तीनों बीजों का न्यास करना चाहिए। इसके अनन्तर परम सावधान होकर वे भगवान् नीलकण्ठ प्रभु का ध्यान करना चाहिए ।४६। अब ध्यान करने की रीति बतलाई जाती है—बालसूर्य के सहित तेजयुक्त भली भाँति धारण की हुई जटा जूट में चन्द्र के खण्ड से समुज्ज्वल—नागेन्द्रोंके द्वारा भूषणों की रचना किये हुए—करकमलोंमें शूल—कपाल और खट्वांग को धारण करने वाले—तीन नेत्रों से शोभित पाँच मुखों से संयुत, सुंदर, व्याघ्र के चर्म का परिधान करने वाले—अब्ज में निवास करते हुए श्री नीलकण्ठ का मैं भजन करता हूँ ।५०। इस मंत्र का तीन लाख जप करे और जप का दशांश घृत युक्त हवि से हवन करना चाहिए जो कि सुसंस्कृत अग्नि में भली भाँति किया जावे ।५१। मृत्युञ्जय के विधान से शैव पीठ पर इनका यजन करना चाहिए । इस रीति से पूजन आदि के द्वारा मंत्र के सिद्ध