भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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पृष्ठ 373

षोडष पटल ] [ ३७३ है- 'नमोभगवते - सकलगुणात्मशक्तियुक्ताय - अनन्ताययोगपीठात्मने नमः'। इसके आदि में प्रणव होता है। इस मन्त्र के द्वारा गिरिजापति देव को आसन अर्पित करना चाहिए ।१६-२०। मूत्ति मूलेन संकल्प्य तत्रावाह्य यजेच्छिवम् । कर्णिकायां यगेन्मूर्ती रोशमीशानदिग्गतम् ।२१ शुद्धस्फटिकसंकाश दिक्षु तत्पुषादिकाः । पीताञ्जश्वेतरक्ताः प्रधानसदृशायुधाः ।२२ चतुर्वक्त्रसमायुक्ता यथावत्यंप्रपूजयेत् । कोणेष्वर्च्यः निवृत्याद्यास्तेजोरूपाः कलाः क्रमात् ।२३ अङ्गानि केसरस्थानि विघ्नेशान्पत्रगान्यजेत् । अनन्तं सूक्ष्मनामानं शिवोत्तममनन्तरम् ।२४ एकनेत्रमकरुद्रं त्रिमूत्ति (नेत्रं) तदनन्तरम् । पश्चाच्छ्रीकण्ठनामान शिखण्डिनमनन्तरम् ।२५ रक्तपीतसितारक्तकृष्णरक्ताञ्जनासितम् किरीटापितवालेन्दुपद्मस्थान् भूषणान्वितान् ।२६ त्रिनेत्रात् शूलवज्रास्त्रचापसस्तान्मनोहरान् । उत्तरादि यजेत्पश्चादुमा चण्डेश्वरं पुनः ।२७ मूल मन्त्र के द्वारा मूत्ति की कल्पना करके वहां पर अर्थात् उस मूत्तिमें आवाहन करके भगवान् शिवका अभ्यर्चन करना चाहिये। कर्णिका में मूर्तियों का यजन करे। ईशान दिशा में संस्थित ईश का यजन करे ।२१। ईश देव शुद्ध स्फटिक मणि के सदृश हैं। दिशाओं में तत्पुरुष आदि का पूजन करना चाहिए। ये वर्णों में पीत, अञ्जन, श्वेत और रक्त है और प्रधान सदृश इनके आयुध हैं-इन सबके चार मुख हैं। इन सबका यथा रीति से अभ्यर्चन करना चाहिए। कोणों में जो तेजोरूपा निवृत्ति आदि कलाओं का क्रम से पूजन करे ।२२-२३। केसरों में संस्थित अंगों का तथा पत्रों में विराजमान विघ्नेश्वरों का यजन करे। अनन्त, सूक्ष्मनामा, शिवोत्तत, एकनेत्र, एकरुद्र त्रिमूत्ति-