भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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३७२ ] [ श्रीशारदा तिलक के पर्वत के समान सुन्दर, चन्द्र के भूषण से संयुत, रत्नों के आकल्पों से उज्ज्वल अङ्ग वाले-कर कमलों में परशु, मृग, वरदान और अभय- दान धारण किए-प्रसन्न-पद्म के आसन पर विराजमान-चारों ओर से अमर गणों के द्वारा स्तवन किये गये-व्याघ्र के चर्म को धारण करने वाले विश्व के आद्य, विश्व के स्वरूप वाले, सम्पूर्ण भय को हरण करने वाले, पाँच मुखों से समन्वित, तीन नेत्रों से युक्त-महेश का नित्य ध्यान करना चाहिए।१४। तत्त्वलक्षं जपेन्मन्त्रं दीक्षितः शैववर्त्मना । तावत्संख्यासहस्राणि जुहुयात्पायसैः शुभैः ।१५ ततः सिद्धो भवेन्मन्त्रः साधकाभीष्टसिद्धिदः । देवं संपूजयेत्पीठेवामादिनव शक्तिके ।१६ वामा ज्येष्ठा ततोरौद्री काली कलपदादिका । विकरिण्याह्वया प्रोक्ता शलाद्याविकरिण्यथ ।१७ बलप्रमथनी पश्चात्सर्वभूतदमन्त्यथ । मनोन्मनीति संप्रोक्ताः शैवपीठस शक्तयः ।१८ मनो भगवते पश्चात्सकलादिवदेत्पुनः । गुणात्मशक्तियुक्ताय ततोऽनन्ताय तत्परम् ।१६ योगपीठात्मने भूयो नमस्तारादिको मनुः । अमुना मनुना दद्यादासनं गिरिजापतेः ।२० इस दन्त्र का चौबीस लाख जप शिव के मार्ग से दीक्षित होकर करे। उतने ही सहस्र संख्या में शुभ पायस से हवन करना चाहिये ।१५। इसके अनन्तर मन्त्र सिद्धहो जाता है और यह साधना करने वाले साधक के अभीष्टों की सिद्धि का प्रदान करने वाला है। वामादि नौ शक्तियों से समन्वित पीठ में देव का भली-भाँति पूजन करना चाहिये ।१६। वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, काली, कलपदा, विकरिणी, आह्वया वलाद्या, अविकरिणी, बलप्रमथनी, सर्वभूतदमनी, मनोन्मनी, ये शैव पीठ की शक्तियां हैं ।१७-१८। अब मन्त्र का उद्धार बताया जाता