भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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३७६ ] [ श्रीशारदा तिलक भूषणों से भूषित हैं, अपने कर से देहार्लिंगन करने वाले देव का ध्यान करे ।३६। मनुलक्षां जपेन्मन्त्रं तत्सहस्र यथाविधि । जुहुयान्मधुरासिक्तैरारग्वधसमिद्वरैः ।३७ प्राक् प्रोक्ते पूजयेत्पीठे गन्धपुत्पैरूमापतिम् । अङ्गाबृत्तैर्बहिः पूज्या हृल्लेखाःद्या यथापुरा । मध्यप्राग्दक्षिणोदीच्यपश्चिमेषु विधानतः । हृल्लेखा गगना रक्ता चतुर्थी तु करालिका । ३८ महोच्छुवा क्रमादेताः पंचभूतसमप्रभाः । पाशांकुशवराभीतिधारिण्योऽमित्तभूषणाः ।३६ यजेत्पूर्वादिपत्रेषु वृषभाद्याननुक्रमात् । हिमालयाभं वृषभं तीक्ष्णशृङ्ग त्रिलोचनम् ।४० सर्वाभरणसंदीप्तं साक्षाच्छब्दस्वरूपिणाम् । कपालशूलबिलसत्करं कालधनप्रभम् ।४२ इस मन्त्र का एक लक्ष जप करे और दशांश विधि के अनुसार मधुरों में आसिक्त आरग्वध की श्रेष्ठ समिधाओं से हवन करना चाहिये ।३७। पूर्व में कहे हुये पीठ पर गन्ध पुष्पादि के द्वारा उमापति का पूजन करे। पूर्व की भाँति अंग वृतों के द्वारा हृल्लेखा आदि का बाहर पूजन करना चाहिए। मध्य-पूर्व-दक्षिणा--उत्तर-- पश्चिम में विधान के साथ पूजन करे। हृल्लेखा--गगना--रक्ता--करा- लिका-महोच्छुत्रा का क्रम से यजन करे। ये सब पाँच भूतों की प्रभा के तुल्य प्रभा वाली हैं। ये सब पाश ०।कुश-वरदान--अभयदान की धारण करने वाली है और समित भूषण वाली है ।३८-३। पूर्वादि पत्रों में अनुक्रम से वृषभादि का यजन करना चाहिये। वृषभ हिमालय के समान आभासे संयुक्त है, उसके तीक्ष्ण शृङ्ग हैं और तीन लोचनोंवाला है ।४०। समस्त आभरणों से श्रेष्ठ दीप्तिमान्--साक्षात् शब्द के स्वरूप वाले हैं। कमल और शूल से कर शोभित है और कामदेव के तुल्य