शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 356, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें३५६ ] [ श्रीशारदा तिलक पीडिताः कामबाणेन चिरमाश्लेषणोत्सुकाः । मुक्ताहारलसत्पीनतुङ्गस्तनभारान्विताः ।६० स्रस्तधम्मिल्लवसना मदस्खलितभूषणाः । दन्तपङ्क्तिप्रभाद्भासिस्पन्दमानाधराञ्चिताः ।६१ विलोभयन्तीविवधैर्विभ्रमैर्भावगर्भितैः ।६२ फुल्लेन्दीवरकान्तिमिन्दुवमनं वर्हत्रियसप्रियम् । श्रीवत्माङ्कमुदारकोस्तुभधरं पीताम्बरं सुन्दरम् । गोपीनां नयनोत्पलार्चिततनुं गोपालसंचावृतम् । गोविन्दं कलवेणुवादनपरं दिव्याङ्गभूषं भजे ।६३ मन्त्रमेनं यथान्यायमयुतद्वितयं जपेत् । जुहुयादरुणाम्भोजैस्तद्दश श समाहितः ।६४ वैष्णवे पूजयेत्पीठे यथावद्देवकीसुतम् । अङ्गावरणमाराध्य पत्रेषु पूजयेत्प्रियाः ।६५ ये सभी गोप कन्ताएं कामबाण से पीड़ित है । और चिरकाल तक आश्लेषण करने के लिए समुत्सुक हो रही हैं। मोतियों के हार से शोभित स्थूल और ऊँचे स्तनों के भार से युक्त हैं—इसके धम्मिल के वस्त्र स्रस्त हो गये हैं-इनके मद से इनके भूषण स्खलित हो गये हैं ये दाँतों की पंक्ति की प्रभा से उद्भासित और स्पन्दमान अधरों से अञ्चित हैं-भावों को गर्भ में रखने वाले अनेक विभ्रमों से विलोभित करती हुई हैं। अब ध्यान बतलाया जाता है-विकसित इन्दीवर की कान्ति से संयुत चन्द्र के समान मुख वाले-मयूर पिच्छ के अवतंस से परम प्रिय, श्री वत्स के चिन्ह वाले-उदार कौस्तुभ को धारण करने वाले पीत वर्ण के वस्त्रधारी, सुन्दर, गोपियों के नेत्र कमलों से अर्चित शरीर वाले, गोपालों के समुदाय से आवृत्त-कल वेणु (वंशी) के वादन करने में तत्पर, दिव्य अङ्गों की भूषा से अन्वित श्री गोविन्द का भजन करता हूँ ।६०-६३। इस मन्त्र का विधि के अनुसार बीस हजार जप करे और जप के दशांश भाग का अरुण कमलों से परम समाहित होकर