शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 355, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंपंचदश पटल ] [ ३५५ देवता कथितः कृष्णः सर्वकामफलप्रदः । चतुः करणवेदानेत्रसंख्याक्षरैः क्रमात् ॥ ८३ पञ्चाङ्गानि मनोः कुर्यान्मन्त्रविज्जातिसंयुतैः । स्मरेद्वृन्दावने रम्ये मोहयन्तं मनोरमम् ॥८८ गोविन्दं पुण्डरीकाक्षं गोपकन्याः सहस्रशः । आत्ममो वदनाम्नाम्भोजप्रेषिताक्षिमभ्रया ।८६ घृतसे एक लाख आहुतियां देवे तो राजा शत्रुओं पर विजय प्राप्त र् या करता है इस मन्त्र के द्वारा साधित अब्ज सूत्र को अपनी भुजा में बाँधे तो वह अपने रोग-अपमृत्यु और दुःखों का विनाश कर देता है इसमें कुछ भी संशय नहीं है । जल की अञ्जलियों के द्वारा दिनों दिन अपने अपका अभिषिञ्चन् करे और स्नान के समय में करे तो वह श्री और समृद्धिवाला होता है । दोनों बाहुओं का ऊपर की ओर करके मन्त्रधारी पुरुष आदित्य मण्डल में देखता हुआ मन्त्र को नित्य एक सहस्र जप करे तो पनी बुद्धि वाला होता है । उस मनुष्य के सब मनोरथ सिद्ध होते हैं--इसमें तनिक भी संशय नहीं है ।८१-८४। अब गोपाल मन्त्र का उद्धार करके बताया जाता - 'कृष्णाय' यह पद कह कर उसके पश्चात् 'गोविन्दाय' कहे । फिर 'गोपीजन' इस पद के अन्त में 'वल्लभाय' - यह कहे और अन्त में द्विष्ट् अर्थात् 'स्वाहा' बोले ।८५ काम वीज अर्थात 'क्लीं' यह आदि में कहा गया है। यह मन्त्रराज आठ अक्षरों वाला होता है । इसका ऋषि नारद और गायत्र छन्द बताया गया है ।८६। इसके देवता भगवान् श्री कृष्ण कहे गये हैं जो सब कामों के फल के प्रदान करने वाले हैं। चार करण-वेद (चार)-अब्धि तथा नेत्र (दो) की संख्या वा अक्षरों से क्रम से मन्त्र का वेत्ता जाति संयुतों से मन्त्र के पाँच अङ्गों को करे । रम्य वृन्दावन में मोहन करते हुए- मनोरम पुण्डरीकाक्ष गोविन्द का स्मरण करना चाहिए । सहस्रों गोप कन्याएं उनके मुख कमल में लगायी हुई आँखों के भ्रमरों वाली हैं ।८७-८६।