शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 359, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंपंचदश पटल ] [ ३५६ भूपुर के युग करे। आठ अक्षरों से शोभित यह गोविन्द के दैवत वाला यन्त्र होता है ॥१०५-१०६॥ धर्मार्थकामफलदं सर्वरक्षाकरं स्मृतम् । पञ्चान्तकोधरासंस्थोमनुबिन्दुभूषितः ॥१०७ पिण्डबीजमिदं प्रोक्तं सर्वसिद्धिकरपरम् । स्मरः कृष्णाय ठद्वन्द्वं षडर्त्तो मनुरीरितः ॥१०८ गोपीजनन्ते प्रवदेद्वल्लभमायाग्निसुन्दरी । अयं दशाक्षनीरोमन्त्रीदृष्टफलप्रदः ॥१०६ प्रणवं हृदयं कृष्ण ङऽन्तमुक्ता ततः परम् । साहश देवकीपुत्रं हूँ फट् स्वाहासमन्वितः ॥११० षोडषाक्षरमन्त्रोऽयं गोविन्दस्य समीरितः । पिण्ड रतितैर्बीजं नमो भगवते ततः ॥१११ नन्दपुत्राय वालादिवपुषे श्यामलाय च । गोपीजनपदस्यान्ते वल्लभाय द्विठावधिः ॥११२ यह मन्त्र धर्म—अर्थ और काम के फल को देने वाला है और सब को रक्षा करने वाला कहा गया है। अब पिन्ड बीज बताया जाता है— पञ्चान्तक—गः धरा—लः, इठः,-यः, यह मन्त्र विन्दु से भूषित होता है। यही पिण्ड बीज कहा गया है जो परम सिद्धि के करने वाला है। स्मर—काम बीज, कृष्णाय—और उद्धन्द्व—स्वाहा। यह छै वर्णो का मन्त्र होता है ॥१०७-१०८। अन्त में 'गोपीजन' कहे और पीछे 'वल्ल- भाय' कहे तथा अन्त में 'स्वाहा' कहे । यह दश अक्षरों वाला मन्त्र होता है जो दृष्ट और अदृष्ट के फल का दाता है ॥१०६। 'प्रणव' फिर हृदय—'नमः' यह पद कहे। उसके अनन्तर चतुर्थ्यन्त 'कृष्ण' पद कहे । उज प्रकार का देवकी पुत्र कहे और 'हूँ फट् स्वाहा'—यह कहे ॥११०। यस षोडश वर्णों वाला गोविन्द का मन्त्र बताया गया है पिड-काम बीज—पीछे 'नमो भगवते'—यह पद कहे ।१११। इसके अनन्तर 'नन्द पुत्राय—वालावपुषे और श्यामलाय-ये पद कहे। फिर । 'गोपीजन'