भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 334, कुल 511 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 334

३३४ ] [ श्रीशारदा तिलक पीत छै कोणोंमें रक्त-आन्तर श्यामला-श्वेतनेमि कान्ति युक्त वह्नि शिखाओं से उप शोभित बाहर में पार्थिव मण्डल को विधि के अनुसार बनावे। सौम्य दिशा में रक्त जल से परिपूर्ण कुम्भ का निन्यास करे। ।६६-१०१। वहाँ पर उसे आवाहन करके चक्र के स्वरूप वाले जनार्दन प्रभु का यजन करे। दक्षिण मण्डल में विधान का ज्ञाता होम कर्म करे।१०२। क्रमात् सर्पिरपामार्गैस्तण्डुलैः सर्षपैस्तिलैः । पायसैर्गव्यसर्पिभ्यां षड्ििवशत्यधिकं शतम् ।१०३ जुहुयादेधिते वह्नौ प्रतिद्रव्य विधानवित् । सम्पातयेत्कुम्भतोये पूजिते सौम्यमण्डले ।१०४ प्रस्थार्द्धं चरुणा पिण्डकृत्वा तस्मिन्विनिःक्षिपेत् । बाह्ये बलिप्रदानार्थ तदर्द्धमवशेषयेत् ।१०५ स्नातं विशुद्धवस्त्राद्यैः साध्यमानीय तं पुनः । दक्षिणे स्थापयेन्मन्त्री कुम्भाग्निभ्यामनन्तरम् ।१०६ नीराज्य तौ नयेद्बाह्यं ग्रातादष्टमराशिके । नीराज्य तौ नयेद्बाह्यं ग्रामादष्टमराशिके । स्थापयेत्तौ यथापूर्वं सपस्तरणौ क्रमात् ।१०७ फिर क्रम से घृत-अपामार्ग-तण्डूल-सर्षपतिल-पायस-गौ का घृतसे एकसौ छब्बीस आहुतियां देने और एधित वह्नि में होम करे विधान का ज्ञाता पुरुष प्रति द्रव्य को पूजित कुम्भ के जल में सौम्य मण्डलमें सम्पातन करे।१०३-१०४। आधेप्रस्थ आधे प्रस्थ चरुसे पिण्डका निर्माण करके उसमें विनिःक्षिप्त कर देवे। बाहर में बलि के प्रदान करनेके लिए उसके आधे भागको अवशिष्ट रखे ।१०५। स्नान कियेहुए विशुद्ध वस्त्रादिके द्वारा समन्वित उस साध्यको वहाँलावे और मंत्रधारी दक्षिण में कुम्भ और अग्नि के अनन्तर स्थापित करे । उन दोनों का नीराजन करके बाहिर लावे और ग्राम से अष्टम राशि में स्थापित करे। उन दोनों को परिस्तरण के सहित क्रम के रखना चाहिये ।१०६-१०७।