भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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चतुर्दश पटल ] [ ३३३ समिधाओं से दश सहस्र की अवधि पर्यन्त आहुतियां देवे ।६०-६२। तो इसका यहप्रभाव होता है कि उस पुरुषको राक्षस-भूत-पिशाच और शत्रु की पीड़ा कभी नहींहुआ करती है। निर्गुण्डी-सर्ज्‍जकनक (धतूरा) श्वेत पलाश की श्रेष्ठ समिधाओं के द्वारा किया हुआ होम क्षुद्र रोग-ग्रहों की आपदाओं का अपहरण करने वाला होता है। अपमार्ग की समिधा और घृत में श्रुत चरु तथा आज्य इनकी पृथक् एक सौ आठ बार आहुतियां देवे । फिर साधक के लिये सम्पात से साधित चरु को देवे ।६३-६५। इसका यह प्रभाव है कि उसके अभिचार कृत द्रोह सर्वथा नष्ट हो जाया करते हैं । अपमार्ग की समिधाओं को पञ्च गव्य में परिप्लुत करके मन्त्रधारी दश हजार आहुतियां देवे और दिशाओं से बलि का समाहरण करे । दध्योदन मन्त्र से करे तो क्षुद्र रोग आदिकी शान्ति होती है ।६६। ।६७। क्षीरवृक्षसमित्क्षीरहविराज्यैः पृथक् पृथक् । चतुःसहस्रं होतव्यं शान्तिः स्यात्सर्वतोमुखी ।६८ दक्षिणोत्तरङ्गं मंत्री चक्रयुग्मं समालिखेत् । वेदादि विलिखेन्मध्ये मंत्रवर्णानृषडस्रिषु ।६६ मध्ये पीतं कोणषट्कं रक्तं श्यामलमांतरम् । नेमिं श्वेतां लसद्वह्निशिखाभिरुपशोभितम् ।१०० पार्थिव मण्डल बाह्ये कुर्यादेवं यथाविधि । रक्ततोयेन सम्पूर्ण कुम्भं सौम्ये प्रविन्‍यसेत् ।१०१ आवाह्य पूजयेत्तस्मिंश्चक्रात्मान जनार्दनम् । दक्षिणे मण्डले कुर्याद्धोमकर्म विधानवित् ।१०२ दूध वाले वृक्षों की समिधा-क्षीर-हवि-और आज्य से पृथक्- पृथक चार सहस्र बार होम कर तो उस हवन करने वाले पुरुष को सर्वतोमुखी शान्ति हो जाती है ।६८। मन्त्र को धारण करने वाला दक्षिण और उत्तर में गत चक्र के युग्म को लिखे । मध्य में वेदादि का लेखन करे और षड्स्रियों में मन्त्र के वर्णों को लिखे । मध्य में