भारतकोश
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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

चतुर्दश पटल ] [ ३३३ समिधाओं से दश सहस्र की अवधि पर्यन्त आहुतियां देवे ।६०-६२। तो इसका यहप्रभाव होता है कि उस पुरुषको राक्षस-भूत-पिशाच और शत्रु की पीड़ा कभी नहींहुआ करती है। निर्गुण्डी-सर्ज्‍जकनक (धतूरा) श्वेत पलाश की श्रेष्ठ समिधाओं के द्वारा किया हुआ होम क्षुद्र रोग-ग्रहों की आपदाओं का अपहरण करने वाला होता है। अपमार्ग की समिधा और घृत में श्रुत चरु तथा आज्य इनकी पृथक् एक सौ आठ बार आहुतियां देवे । फिर साधक के लिये सम्पात से साधित चरु को देवे ।६३-६५। इसका यह प्रभाव है कि उसके अभिचार कृत द्रोह सर्वथा नष्ट हो जाया करते हैं । अपमार्ग की समिधाओं को पञ्च गव्य में परिप्लुत करके मन्त्रधारी दश हजार आहुतियां देवे और दिशाओं से बलि का समाहरण करे । दध्योदन मन्त्र से करे तो क्षुद्र रोग आदिकी शान्ति होती है ।६६। ।६७। क्षीरवृक्षसमित्क्षीरहविराज्यैः पृथक् पृथक् । चतुःसहस्रं होतव्यं शान्तिः स्यात्सर्वतोमुखी ।६८ दक्षिणोत्तरङ्गं मंत्री चक्रयुग्मं समालिखेत् । वेदादि विलिखेन्मध्ये मंत्रवर्णानृषडस्रिषु ।६६ मध्ये पीतं कोणषट्कं रक्तं श्यामलमांतरम् । नेमिं श्वेतां लसद्वह्निशिखाभिरुपशोभितम् ।१०० पार्थिव मण्डल बाह्ये कुर्यादेवं यथाविधि । रक्ततोयेन सम्पूर्ण कुम्भं सौम्ये प्रविन्‍यसेत् ।१०१ आवाह्य पूजयेत्तस्मिंश्चक्रात्मान जनार्दनम् । दक्षिणे मण्डले कुर्याद्धोमकर्म विधानवित् ।१०२ दूध वाले वृक्षों की समिधा-क्षीर-हवि-और आज्य से पृथक्- पृथक चार सहस्र बार होम कर तो उस हवन करने वाले पुरुष को सर्वतोमुखी शान्ति हो जाती है ।६८। मन्त्र को धारण करने वाला दक्षिण और उत्तर में गत चक्र के युग्म को लिखे । मध्य में वेदादि का लेखन करे और षड्स्रियों में मन्त्र के वर्णों को लिखे । मध्य में

३३४ ] [ श्रीशारदा तिलक पीत छै कोणोंमें रक्त-आन्तर श्यामला-श्वेतनेमि कान्ति युक्त वह्नि शिखाओं से उप शोभित बाहर में पार्थिव मण्डल को विधि के अनुसार बनावे। सौम्य दिशा में रक्त जल से परिपूर्ण कुम्भ का निन्यास करे। ।६६-१०१। वहाँ पर उसे आवाहन करके चक्र के स्वरूप वाले जनार्दन प्रभु का यजन करे। दक्षिण मण्डल में विधान का ज्ञाता होम कर्म करे।१०२। क्रमात् सर्पिरपामार्गैस्तण्डुलैः सर्षपैस्तिलैः । पायसैर्गव्यसर्पिभ्यां षड्ििवशत्यधिकं शतम् ।१०३ जुहुयादेधिते वह्नौ प्रतिद्रव्य विधानवित् । सम्पातयेत्कुम्भतोये पूजिते सौम्यमण्डले ।१०४ प्रस्थार्द्धं चरुणा पिण्डकृत्वा तस्मिन्विनिःक्षिपेत् । बाह्ये बलिप्रदानार्थ तदर्द्धमवशेषयेत् ।१०५ स्नातं विशुद्धवस्त्राद्यैः साध्यमानीय तं पुनः । दक्षिणे स्थापयेन्मन्त्री कुम्भाग्निभ्यामनन्तरम् ।१०६ नीराज्य तौ नयेद्बाह्यं ग्रातादष्टमराशिके । नीराज्य तौ नयेद्बाह्यं ग्रामादष्टमराशिके । स्थापयेत्तौ यथापूर्वं सपस्तरणौ क्रमात् ।१०७ फिर क्रम से घृत-अपामार्ग-तण्डूल-सर्षपतिल-पायस-गौ का घृतसे एकसौ छब्बीस आहुतियां देने और एधित वह्नि में होम करे विधान का ज्ञाता पुरुष प्रति द्रव्य को पूजित कुम्भ के जल में सौम्य मण्डलमें सम्पातन करे।१०३-१०४। आधेप्रस्थ आधे प्रस्थ चरुसे पिण्डका निर्माण करके उसमें विनिःक्षिप्त कर देवे। बाहर में बलि के प्रदान करनेके लिए उसके आधे भागको अवशिष्ट रखे ।१०५। स्नान कियेहुए विशुद्ध वस्त्रादिके द्वारा समन्वित उस साध्यको वहाँलावे और मंत्रधारी दक्षिण में कुम्भ और अग्नि के अनन्तर स्थापित करे । उन दोनों का नीराजन करके बाहिर लावे और ग्राम से अष्टम राशि में स्थापित करे। उन दोनों को परिस्तरण के सहित क्रम के रखना चाहिये ।१०६-१०७।

चतुर्दश पटल ] [ ३३५ हुत्वा वह्नौ यथापूर्वं शिष्टान्नेन बलिं हरेत् । मनुना वक्ष्यमाणेन दशदिक्षु यथाविधि ॥१०८ सहद्विष्णुगणेष्योऽन्ते सर्वशान्ति पुनः । तेभ्यो बलि प्रगृह्णन्तु शान्तये हृदय ततः ॥१०६ ब्राह्मणान् भोजयेत् सभ्यंमधूरोत्तरमादरात् ! गुरवे दक्षिणां दद्याद्वस्त्रं भूषणसंयुतम् ॥ ११० हन्यादयं विधिः पुंसां कृत्यारोगग्रहज्वरान् । रक्षःपिशाच नर्यादि क्लेशान् शीघ्रं न संशयः ॥१११ विधाय पञ्जरं मन्त्री फलकैः क्षीरशाखिनाम् । पञ्चगव्येन सम्पूर्य तस्मिन् साध्यं निवेशयेत् ॥११२ पूर्व की ही भाँति अग्नि में हवन करके शिष्ट अर्थात् बचे हुए अन्न के द्वारा बलि का अपहरण करना चाहिये । आगे बताये जाने वाले मंत्र द्वारा विधि के सहित दश दिशाओं में 'नमः पट् ट के साथ विष्णु और गणेश के लिए तथा अन्त में सर्वशान्ति वह कर उनके लिये 'शान्ति के लिये बलिको ग्रहण करों उनको बलि देवे और अन्त में नमः' कहे ।१०८-१०६। फिर बड़े आदर भाव से ब्राह्मणों के लिए मधुर पदार्थोंका भोजन करावे । अपने गुरुदेव को वस्त्र और भूषण से युत दक्षिणा देनी चाहिए ।११०। यह विधान पुरुषों के कृत्या रोग-ग्रह और ज्वर हनन किया करता है । राक्षस-पिशाच और आर्वादि के क्लेशों का विनाश करता है-इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।१११। मन्त्र धारण करने वाला पुरुष दूध वाले वृक्षों के तख्तों के द्वारा एक पंजरका निर्माण करे । उस पंजर को पंच गव्य से सम्पूरित करके उसमें साध्य का निवेश कर देवे ।११२। धौतवस्त्रं विशुद्धाङ्ग स्पृष्ट्वा सम्यग्जपेन्मनुम् पूर्वादिदिक्षु संस्थाप्य वर्त्ति ब्राह्मणसत्तमैः १३ कारयेत्पूर्व्वसन्द्रिष्टैर्द्रव्यौर्होमं विधानविद् । तोषयेद्दक्षिणाभिस्तान् यजमानः स्वशक्तितः ॥११४

३३६ ] [ श्रीशारदा तिलक गुरुं च धनधान्याद्यैर्नत्वा सम्प्रीणयेत्तदा । सर्वरोगहरः प्रोक्तः कृत्याद्रोहादिनाशनः ।११५ अपमृत्युहरः पुंसां विधिरेष प्रकीर्तितः । पञ्चगव्यैः कषायैर्वा क्षीरभूरुहसम्भवैः ।११६ पूरितैः कलशैर्जप्तैः कृतसम्पातसंयुतैः । अभिषिञ्चेदग्रहाविष्टमभिचारातुरन्ततः ।११७ स्वस्थो भवति शीघ्रेण विधानेनामुना नरः । भानुवारेऽभिषेकस्य विधानेन सुसाधितैः ।११८ सलिलैःस्नापयेन्नारीं सुखप्रसवकाङ्क्षिणीम् । सप्तवाराभिषेकेण सर्वे नश्यन्त्युपद्रवाः ।११९ धुले हुये वस्त्रों से संयुत तथा विशुद्ध अङ्गों वाले का स्पर्श करके भली रीति से मन्त्रका जप करे । पूर्व आदि दिशाओंमें अग्नि को संस्था- पना करके विधान के ज्ञाता को चाहिये कि वह परम श्रेष्ठ ब्राह्मणों से सन्दिष्ट द्रव्यों के द्वारा होम करावे । यजमान अपनी शक्ति से दक्षिणाके द्वारा उन ब्राह्मणों को सन्तुष्ट करे।११४। उस अवसर पर गुरुदेव को प्रणाम करके धन धान्यादि से प्रसन्न करे । यह विधान समस्त रोगों के हरण करने वाला तथा कृत्यादि के देह का विनाश करने वाला है ।११५। यह विधि पुरुषों का अपमृत्यु के हवन करने वाली कीर्तित की गयी है । पञ्चगव्य से अथवा कषायों से जो क्षीर वाले वृक्षों से किये गये हों इन कलशों को पूरित जप के साथ करे और सम्पात से सम- न्वित करे । फिर इनके द्वारा जो ग्रहों से आविष्ट हो तथा अभिचार से आतुर हो उसका अभिषिंचन करना चाहिये ।११६-११७। मनुष्य इस विधान के करने पर शीघ्र ही स्वस्थ हो जाया करता है । रविवार में अभिषेक के विधान के द्वारा सुसाधित जल से नारी का स्मरण करावे इससे सुख पूर्वक प्रसव सम्पन्न हो जाता है। सातवारों में यह अभिषेक करने से सभी उपद्रव नष्ट हो जाया करते हैं ।११८-११९।

चतुर्दश पटल ] [ ३३७ पञ्चगव्ये शृतं सर्पिर्मन्त्रितं मनुनाऽमुना । गर्भिणीनां ग्रहार्त्तानां सेवितं ऽच्छुभावहम् ॥१२० उच्चस्थानगते शुक्रे मनुना साधुसाधिना । त्रिलोही मुद्रिका हन्यान् क्षुद्रभूतग्रहान् ज्वरान् ॥१२१ तद्वर्णसंख्यया सूत्रे ग्रन्थीन् कृत्वा जपादिभिः । साधितं कल्पयेद्धस्ते कण्ठे वा दुःखशान्तये ॥१२२ पञ्चगव्यं जपेत्स्पृष्ट्वा मन्त्रं दशशतावधि । न्यस्तं तत्पद्मपत्रादौ पात्रे वा ब्रह्मवृक्षजे ॥१२३ फले बिल्वस्य वा मन्त्री गृहे स्वस्य परस्य च । निखनेत् सर्वरक्षास्याद्वर्द्धते सर्वसम्पदः ॥१२४ पञ्चगव्य में शृत घृत को इस मन्त्र के द्वारा अभिमन्त्रित करे । यह गर्भिणियों और ग्रहों के द्वारा आत्तों को सेवन कराया जावे तो अत्यन्त ही शुभ करने वाला होता है ॥१२०॥ शुक्र के उच्च स्थान पर स्थित होने के समय में मन्त्र के द्वारा भली भाँति साधित की हुई तीन लोहों की मुद्रिका क्षुद्रभूत ग्रहों को और ज्वरों को नष्ट कर दिया करती हैं ॥१२१॥ उसके वर्णों की संख्या से सूत्र में जप आदि के द्वारा ग्रन्थियाँ लगाकर इसकी साधित करे और इसको हाथ में अथवा कण्ठ में धारण करे तो दुःखों की शान्ति होती है ॥१२२॥ पञ्चगव्य का स्पर्श करके एक सहस्र की अवधि पर्यन्त मन्त्र का जप करे और उसको पद्म पत्र आदि में न्यस्त करे अथवा ब्रह्म वृक्ष से निर्मित पात्र में रखे या विल्व के फल में रखे । उसको मन्त्रधारी अपने या दूसरे के गृह में गाढ़ देवे । इसका यह प्रभाव होता है कि उसकी सभी प्रकार से रक्षा होती है और सभी सम्पदा बढ़ती है ॥१२३-१२४॥ पलाशक्षीरवृक्षाणा त्वचोमलयजं पुरुम् । कुङ् कुमं यामिनीकुष्ठबिल्वायामार्गसर्षपान् ॥१२५ तिलदूर्वायवान् देवी तुलसी युगलं कुशम् । लक्ष्मी गोरोचना पद्मं वचां गोमयसंयुताम् ॥१२६

३३८ ] [ श्रीशारदा तिलक विष्णुक्रान्तामर्कयुतां जपेन्मन्त्रं विनिःक्षिपेत् । पञ्चगव्येन सम्पूर्गे पात्रे तत्संस्कृतेऽनले । १२७ संस्थाप्य क्वाथयेत् सम्यग्यांव्रत्भस्म भविष्यति । तदादाय जपेद्भूयः प्रयुतं देवता धिया । १२८ लिम्पेत्सर्वाङ्गमेतेन किञ्चिच्छिरसि निः क्षिपेत् । कृत्याद्रोहाग्रहोन्मादव्याधिदुःखानिवारणम् । १२६ सर्वशत्रु प्रशमनं सर्वपापहरम्परम् । शुभदं वश्यदं पुंसां समस्तापर्त्तिनिवारणम् । १३० गर्भिणीबालरुग्णानां विशेषेण प्रशस्यते । अस्मात्परतरा रक्षा नास्ति लोके प्रकीर्त्तित । १३१ पलाश वृक्ष तथा क्षीर वाले वृक्ष की त्वचा, चंदन, गूगन, कुंकुम वामिनी, कुण्ठ, विल्ध, अपामार्ग, सर्षप (सरसों), दूर्वा, यव, देवी, तुलसी, युगलकुशा, लक्ष्मी, गोरोचन, पद्म, वच जोगोमयेसे संयुत होवे, विष्णुक्रान्ता और अर्क इनको मंत्र का जप करते हुए पञ्चगव्य से पूर्ण पात्र में डालना चाहिए । फिर सुसंस्कृत अग्नि पर उस पात्र को रखकर भली भांति क्वाथ करे और तब तक करे जब तक भस्म हो जावे । उसको लेकर फिर देवताकी बुद्धिसे प्रयुत जप करे । १२५-१२८। इसे सर्वाङ्ग में लेपन करे और कुछ शिर पर विनिःक्षिप्त करनी चाहिए । यह कृत्या के द्रोह, ग्रहोन्माद व्याधि और दुःखों का निवारण करने वाला होता है । १२६। इसके समस्त शत्रुओं का शमन होता है और यह सब पापों का हरण करने वाला है। यह शुभों के देने वाला वश्य करने वाला और पुरुषों की सब आपदाओं का निवारक है । १३०। गर्भिणी बालक और रुग्णों को तो यह विशेष रूप से प्रशस्त माना जाता है । लोक में इससे बड़ी रक्षा कोई भी नही कही गयी है । १३१। मुस्ता शुष्ठी निशावन्हिरेलायष्टिव्रंचा वृषम् । पाठा विडङ्ग मञ्जिष्टा द्राक्षा दार्वी सरोहिणी ।१३२

चतुर्दश पटल ] [ ३३६ फलत्रयं च तैः कल्कैः पञ्चगव्येषु सर्पिषाम् । प्रस्थं पचेद्यथान्यायं मन्त्रेणानेन साधितम् । १३३ कान्तिदं सुतदं स्त्रीणां भूतप्रेतभयापहम् गर्भरक्षाकरं शुद्धं पञ्चगव्यघृतं विदुः । १३४ ठान्तान्सप्त लिखेन्मध्ये षट्षु कोणेषु तेष्वथ । मन्त्रवर्णालिखेदेतच्चक्रमापन्निवारणम् । १३५ षट्कोणमध्ये विलिखेत्ससाध्यं तारं षड् ववशिष्टवर्णान् । अङ्गानि तत्सन्धिषु मन्त्रमेतत्करोति रक्षां विधिवत्प्रजप्तम् । १३६ मुस्ता, शुण्ठी, हल्दी, वह्नि (चित्रक), एला (इलायची), यष्टि (यष्टी, मधु), वच, वृष, पाठा, विडङ्ग, माञ्जिष्ठा, द्राक्षा वार्ती, रोहिणी, तीन फल (हर्र, बहेड़ा, आमला) इन सबके कल्कींको पञ्चगव्य मिश्रित घृत में डाल कर विधिपूर्वक इस मंत्र द्वारा साधित करके पकावे । १३२-१३३। इसको शुद्ध पंचगव्य घृत कहते हैं। यह कान्ति के देने वाला, स्त्रियों को पुत्र दाता, भूत प्रेतों के भय का अपहर्त्ता, गर्भ की रक्षा करने वाला होता है । १३४। अब मन्त्र बतलाया जाता है— मध्यादि षट्कोणों में सात ठकारों को मिलकर उन ठकारों में क्रम से मन्त्र के अक्षरों का लेखन करना चाहिए । साध्य साधक का कर्म भी लिखना चाहिए । यह चक्र आपदाओं का निवारण करने वाला है । १३५। अब दूसरा मन्त्र बतलाया जाता है—षट्कोणों के मध्य में साध्य के सहित प्रणव तथा ६ अस्त्रों में अवशिष्ट वर्णों को लिखे । उनकी सन्धियों में अङ्गों को लिखे । फिर विधि के साथ अभि- मन्त्रित किया हुआ यह मन्त्र रक्षा किया करता है । १२६। तारं लिखेट्टान्तगतं ससाध्यं कोणेषू शिष्टे मनुवर्णषट्कम् अङ्गानि सन्धिष्वथ षोडशार्णं सषोडशार्णं वसुधानुरस्थम् । १३७ जपित्वा कृतसम्पातं गर्भिणीनां हितं परम् । अभिचारग्रहोन्मादान्यन्त्रमेतद्विनाशयेत् । १३८

३४० ] [ श्रीशारदा तिलक मध्ये तारं ससाध्यं मनुमथ विलिखेत् षट्पु कोणेषु सन्धि ष्वङ्गान्यन्ते कलानां युगयुगविलसत्केशराष्टाणपत्रम् । किञ्जल्काद्विवसुदललसत्षोडशार्णस्वनाम्ना हक्षाभ्यां त्रिः परीतं लिखतु परिवृतंतत्त्रिपाशांड कुशाभ्याम् ।१३६ तारन्नमो भगवते महासुदर्शनाय च । वर्मास्त्रान्तश्चक्रमन्त्रः षोडशाक्षर ईरितः ।१४० अब अन्य यन्त्र बताया जाता है टकार के अन्तर्गत प्रणव को लिखे जो साध्य के सहित होवे शिष्ट कोणों में मन्त्र के छै वर्णों का लेखन करना चाहिये । सन्धियों में अङ्गों को लिखें । षोडश वर्णों के सहित षोडशाद लिखे और उसे भूपुर में स्थित करे ।१३७-१३८। जप करके सम्पात किया हुआ गर्भिणी नारियों के हित के प्रदान करने वाला होता है। यह यन्त्र अभिचार—ग्रहोन्माद का विनाश कर दिया करता है ।१३६। अब अन्य यन्त्र को बतलाते है—मध्य में राज्य के सहित प्रणव को तथा मन्त्र को लिखे । मन्त्र यहां पर प्रणव से अतिरिक्त कवच मन्त्र ग्रहण किया जाता है। इसके अनन्तर षट्कोणों में और सन्धियों में अङ्गों का लेखन करे। अन्त में अर्थात् षोडश कोणों के बाहर स्वरों के दो-दो से शोभित केशरों के आठ वर्ण पत्र को बनावे । फिर किंजल्का के आदि वर्णों से षोड़श दलों से शोभित अपने नाम से षोड़श वर्णों को लिखना चाहिये । हकार और क्षकार तीन बार परीत करे । फिर तीन पाश और अंकुशों से उसे परिवृत करे अब षोड़शाक्षर मन्त्र का उद्धार बताया जाता है - प्रणव फिर 'नमो भगवते महासुदर्शनाय' कहे और वर्म और अस्त्र अन्त में कहे—यह षोड़श अक्षरों वाला चक्र मन्त्र कहा गया है ।१३६-१४०। चक्रयन्त्रमिदं प्रोक्तं सर्वभीति निवारणम् । क्षुद्रापमृत्युशमनं राज्ञां विजयवर्द्धनम् ।१४१ रेखा विलिख्याष्टशिरांसि तामासाध्य वाह्यं श्रुतिशः क्रमेण । स्थाने हृषीकेषमनुं विभज्य पादालिखेत्कोष्ठचतुष्टतस्थान् ।१४२

पंचदश पटल ] [ ३४१ अष्टाक्षरार्णैः प्रतिदर्भितास्तान्कोष्ठद्वये चक्रमनुं यथावत् । मध्यस्थकोष्ठे विलिखेत्साध्यं स्यात्सप्तकोष्ठाद्वयन्त्रमेतत् ॥१४३ स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च । रक्षांसि भीतानि दिशोद्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघा ॥१४४ धारितं सप्तकोष्ठं तत्त्रायते महतो भयात् । दुःस्वप्नदुर्निमित्तादिशमनङ्कीर्तितं बुधैः ॥१४५ यह चक्र यन्त्र कहा गया है जो सभी प्रकार के भयों का निवारण करने वाला होता है । यह क्षुद्र अपमृत्यु के शमन करने वाला तथा नृपों के विजय के बढ़ाने वाला होता है ॥१४१॥ अब सप्तकोष्ठ यन्त्र को बतलाते हैं-आठ शिरों वाली रेखायें को लिखकर बाहिर चारों के क्रम से उनको आबद्ध करे । स्थान में हृषीकेश मन्त्र को विभक्त करके चारों ओष्ठों मेरे स्थिते पादोंका लेखन करे । उनको अष्टाक्षर के वर्णों से प्रतिदर्भित करे और यथा रीति से दो कोष्ठों में चक्र मन्त्र को लिखे । मध्य में स्थित कोष्ठ में साध्य के सहित लिखे तो यह सप्तकोष्ठ नामक यन्त्र होता है ॥ १४२-१४२॥ हे हृषीकेश ! यह ठीक ही है आपकी कीर्त्ति से यह जगत् प्रहृष्ठ और अनुरंजित होता है । इससे सब राक्षस भीत होते हैं, दिशायें द्रवित होती है और सब सिद्धों के सङ्घ नमस्कार किया करते हैं । इस सप्त कोष्ठ को धारण करे तो यह महान् भय से रक्षा करता है । मनीषियों के मतानुसार यह दुःस्वप्न और दुर्निमित्त आदि का यजन करने वाला कीर्त्तित किया है ॥१४५॥

पंचदश पटल

॥ पुरुषोत्तम प्रकरण ॥

अथ वक्ष्ये जगन्मूलं मन्त्रं श्रीपुरुषोत्तमम् । रोपितं वैष्णवे तन्त्रे भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ॥१

३४२ ] [ श्रीशारदा तिलक तारमाररमाबीजं नत्यन्ते पुरुषोत्तमम् । पुनरप्रतिरूपान्ते ततो लक्ष्मीनिवासच ।२ सकलान्ते जगत्पूर्वं क्षोभणेति पद पुनः । सर्वस्त्रीहृदयोपेत विदारणपदं पुनः । ३ ततः परं त्रिभुवनमदोन्मादकरं ततः सुरासुरान्ते मनुजसुन्दरीजनशब्द (वर्ण) तः ।४ मनांसि तापयद्वन्द्वं दीपयद्वितयं पुनः । शोषयद्वियं भूयो मारयद्वितयं पुनः । ५ स्तम्भयद्वितयं पश्चान्मोहयद्वितये पुनः । द्रावयद्वितयं पश्चादाकर्षययुगं ततः ।६ समस्तपरमोपेतं सुभगेन च संयुतम् । सर्वसौभाग्यशब्दान्ते करेति पदसंयुतम् ।७ सर्वकामप्रदममुकं हनयुग्मकम् । चक्रेण गदया पश्चात् खड्गेन तदनन्तरम् ।८ इसके अनन्तर जगत् के मूल स्वरूप श्री पुरुषोत्तम मन्त्र को बतलाऊँगा जो वैष्णव तन्त्र में गोपित है और सांसारिक सुखों के उपभोग और सांसारिक बन्धन से मोक्ष दोनों ही के फल का प्रदान करने वाला है ।१। तार (प्रणव), मार, काम बीज, रमा बीज, फिर ‘नमः’—यह पद, इसके अन्त में ‘पुरुषोत्तम’—यह पद, फिर ‘अप्रतिरूप’ और इसके अन्त में लक्ष्मी निवास’ यह पद, सबके अन्त में ‘जगत्पूर्व—वह पद, फिर ‘क्षोभण’ पद, फिर ‘सर्व स्त्री हृदयोपेत विदारण’—यह पद, इसके आगे ‘त्रिभुवन मदोन्मादकर’ यह पद, फिर ‘सुरासुर’ इसके अन्त में ‘मनुजसुन्दरीजन’—यह पद, फिर इसके अन्त में ‘मनासि’ यह पद होना चाहिए । फिर ‘मारय’—यह दोवार फिर ‘दीपय’—यह पद दो बार, इसके पश्चात् ‘शोषय’ और ‘मारय ये दोनों पद दो-दो बार कहे । फिर ‘स्तम्भय’ और ‘मोहय’ ये दोनों पद दो- दो बार कहे । फिर ‘द्रावय’ और आकर्षय’—ये दो पद दो-दो बार

पंचदश पटल ] [ ३४३ है। फिर 'समस्त परम' से उपेत और सुभगन'—इससे संयुत कहे । सर्व सौभाग्य' के अन्त में कर' इस पद से संयुत करे। फिर 'सर्व काम प्रद' यह कहकर 'अमुकं, हन-हन' कहे। फिर 'चक्रेण, गदया, खङ्गेन' में पद कहे ।२-८। कट्टद्वयान्तेऽङ्कुशेन ताडयद्वितय पुनः । सर्ववाणिभिन्दयुग पाशेनेति पदं ततः ।६ त्वरशब्दद्वयमथोकिन्तिष्ठसि पदं पुनः । तावद्यावत्सदस्यान्ते समाहितमनन्तरम् ।१० ततो मे सिद्धिमाभाष्य भवत्वन्ते सवर्म फट् । नमोऽन्तोऽय मन् प्रोक्तो द्विशताक्षरसंयुतः ।११ जैमिनिर्मुनिराख्यातश्छन्दश्चामितमीरितम् । समस्तजगतामादिर्देवता पुरुषोत्तमः ।१२ फिर दो वार 'कट्ट' पद कहे और 'अंकुशेन' यहकहकर 'ताड़य' इस पद को दो वार बोले । फिर 'सर्व वाणिः' कहकर 'भिन्द' इस पद को दो बार बोले । इसके पश्चात् 'पाशेन" - यह कहकर 'त्वर'—इस पद को दो बार कहे । फिर 'कि तिष्ठसि' इस पद को कहे। 'तावद यावत्' इस पद के अनन्तर 'समाहित' यह कहे । फिर ततो में सिद्धि भवतु' यह कहकर अन्त में वर्म सहित 'फट् यह कहे। अन्त में इस मन्त्र के 'नमः' यह पद होता है। इस प्रकार से यह मन्त्र दो सौ अक्षरों वाला होता है ।६-११। इस मन्त्र का ऋषि जैमिनि कहा गया है। इस का छन्द अमित कहा गया है। इसका देवता सम्पूर्ण विश्व का आदि भगवान पुरुषोत्तम है । अब षडङ्ग मन्त्रों का उद्धार बताया जाता है ।१२। पुरुषोत्तमशब्दान्ते वदेत्त्रिभुवनं ततः (पुनः) । मदोन्मादकरान्ते हुँ हृदयं सफलं ततः ।१३ जगत् क्षोभणशब्दान्ते लक्ष्मोदयितहुँ शिरः ।१४

३४४ ] [ श्री शारदा तिलक मन्थोत्तंमसंयुक्तमङ्गजैं कामदायिनि । हुँ शिखापरमोपेतसुभगाक्षरसंयुतम् । १५ सर्वसौभाग्यकरहुँ कवच परिकीर्त्तितम् । उक्त्वा सुरासुरोपेतमनुजान्वितसुन्दरीम् । १६ ततः परस्ताद्धृदयविदारणपद वदेत् । सर्वप्रहरणधरसर्वकामिकतत्परम् । १७ हनद्वयं च हृदयं बन्धनानि ततः परम् । आकर्षयपदद्वन्द्वं महाबलहुमस्त्रकम् । १८ त्रिभुवनेश्वरपदन्ततः सर्वजनन्ततः । मनासि हनयुग्मान्ते दारय द्वितयं च मे । १६ वशमानय हुँ नेत्रं ताराद्याः फट् नमोन्तकाः । षडङ्गमन्त्राः सन्दिष्टा नेत्रान्तास्तन्त्रवेदिभिः । २० पुरुषोत्तम शब्द के अन्त में त्रिभुवन बोलना चाहिये । मदोन्माद कह कर अन्त में 'हुं', हृदयं सकलं कहे 'जगत्' क्षोभण के अन्त में लक्ष्मी दयित हुँ शिर है । मन्मथोत्तमसे सयुक्त अङ्ग के कामदायिनि हुँ शिखा है परमोपेत सुभगाक्षर से संयुत सर्व सौभाग्य करहु कवच कीर्त्तित किया गया है । सुरासुर से युक्त मनुज सुन्दरीम् यह कह कर इसके आगे हृदय विदारण पद बोलना चाहिये । उसके आगे सर्व प्रहरण धर कामिक कहे । दो हन पद हृदय है और इसके आगे बन्धनानि पद कहे । दो बार 'आकर्षय कहे । महाबल हुँ—यह प्रमव होता है । इससे आगे 'त्रिभुवनेश्वर' और फिर 'सर्वजन' कहे । फिर मनांसि कहकर दो बार हन पद और दो बार दारय पद कहे । 'वशमानयहु' नेत्र है । इनके आदि में प्रणव और अन्त में फ्ट्तथा, नमः- यह पद है । ये षडङ्ग मन्त्र सन्दिष्ट किये हैं जो तन्त्र के ज्ञाताओं के द्वारा नेत्रान्त कहे गये हैं ।१२-२०। त्रैलोक्यमोहनाणान्ते हृषीकेशपदं पुनः । पश्चादप्रतिरूपादि मन्मथानन्तरं वदेत् । २१

पंचदश पटल ] [ ३४५ सर्वादि स्त्रीपदं पश्चाद्दहृदयाकर्षणं ततः । आगच्छागच्छ मन्त्रोऽयं ताराद्यो नमसान्वितः । २२ अनेन मनुना कृत्वा व्यापकं न्यस्य बाहुषु । अष्टायुधानि मुद्राभिर्मन्त्रैः सार्द्धं विचिन्तयेत् ।२३ क्षीराम्भोनिधिमध्यस्थं निरन्तरसुरद्रुमम् । उद्यदकेंन्दुकिरणदूरीकृततमोभरम् ।२४ कालमेघसमालोकनृत्यद्बर्हिकदम्बकम् । उत्फुल्लकुसुमामोदप्रहृष्यद्भृङ्गसङ्कुलम् ।२५ कूजत्कोकिलसंघेनः वाचालितदिगन्तरम् । नानाकुसुम सौगन्धवाहिगन्धवहान्वितम् ।२६ कल्पवल्ली निकुञ्जेषु क्रीडत्सिद्धकदम्बकम् । देवगन्धर्वकन्या (नारो) भिर्यान्तोग्भिरलङ् कृतम् । २७ अनेनदीर्घिकायुक्तमुद्यानं महदधुभतम् । तस्य मध्ये मणिमये मण्डपे तोरणान्विते ।२८ त्रैलोक्य मोहन वर्णों के अन्त में हृषीकेश पद को कहे । पीछे अप्रति रूपादि और इसके अनन्तर मन्मथ बीजे ।२१। पीछे सर्वादि पद वाला स्त्री पद कहे । फिर हृदयाकर्षण कहे । पीछे आगच्छ-आगच्छ कहे। इसके आदि में प्रणव और अन्त में 'नमः यह पद है यह मंत्र है ।२२। इस मंत्र के द्वारा बाहुओं में व्यापक न्यास करे । मुद्राओं के सहित आठ आयुधों का मन्त्रों के साथ चिन्तन करना चाहिए ।२३। क्षीर सागर के मध्य में स्थित निरन्तर सुर द्रुम है-उदीय मान सूर्य और चन्द्र की किरणों से तम के भार को जहाँ पर दूर भगा दिया है-काल मेघों के समलोक में जहाँ पर नृत्य करते हुए मयूरों का समुदाय है--खिले हुए पुष्पों के गन्ध से प्रसन्न होते हैं भ्रमरों से समावृद्ध है--कूजन करती हुई कोकिलों के समूह के द्वारा दिशाओं का अन्तर शब्दायमान हो रहा है—अनेक प्रकार के कुसुमों को सुगन्ध की वहन करने वाली वायु से समन्वित कल्प वल्ली के निकुंजों में क्रीड़ा करते हुए सिद्धों के समुदाय

३४६ ] [ श्रीशारदा तिलक से समन्वित-देवों और गन्धर्वों की गायन करती हुई कन्याओं के द्वारा समलंकृत बहुत-सी बावडियों से संयुक्त एक महान् अद्भुत उद्यान है। उस उद्यान के मध्य में तोरणों से सज्जित एक मणिमय मण्डप है ।२४-२८। ऋतुभिः षड्भिरनिशं सेवितस्य महीयसः । सुरद्रुमस्य मूलस्थे महासिंहासने शुभे ।२६ रक्तारविन्दमध्यस्थगरुडोपरि संस्थितम् । ध्यायेद्वल्लभया सार्द्धं जगन्नाथं जगन्मयम् ।३० देवं श्रीपुरुषोत्तमं कमलया स्वाङ्कस्थया पङ्कजं । बिभ्रत्या परिरब्धमम्बुजरुचा तस्यां निबद्धेक्षणम् । ध्यायेच्चेतसि शंखपाशमुशलाङ्गागारि षड्गङ्गदां हस्तैरङ्कुशमुद्वहन्तमरुण स्मेरारविन्दाननम् ।३१ एवं ध्यात्वा श्रियः कान्तं मनुं लक्षचतुष्टयम् । जपेद्धशी विधायाथ कुण्डमर्द्धेन्दुसन्निभम् ।३२ जुहुयाद्वैष्णवे वह्नौ पद्मैर्जातिसमुद्भवैः । पुष्पैर्यवैः क्रमात्पश्चाद्ब्राह्मणानपि भोजयेत् ।३३ उस मण्डप में निरन्तर छ ऋतुओं के द्वारा सेवित एक महान् कल्प वृक्ष है । उस कल्प वृक्ष के मूल मे स्थित एक परम शुभ महान् सिंहासन है। उस सिंहासन पर रक्त कमल में मध्य में विराजमान गरुड़ के ऊपर संस्थित अपनी वल्लभा के साथ में जगन्मय जगन्नाथ प्रभु का ध्यान करना चाहिए ।२६-३०। अब ध्यान करने का प्रकार बतलाया जाता है—अपनी गोद में विराजमान पंकज को धारण करती हुई कमला के द्वारा समालिङ्गित कमल की कान्ति से उसमें ही अपनी दृष्टि को बाँधे हुए—कर कमलों के द्वारा शंख, पाश, मुशल, चाप शंख, गदा और अंकुश का वहन करने वाले—अरुण और मन्दस्मित युक्त मुख कमल वाले देव श्री पुरुषोत्तम का चित्त में ध्यान करना चहिए ।२६-३१। इस रीति से श्री देवी के कान्त का ध्यान करके मन्त्र

पंचदश पटल ] [ ३४७ का चार लाख जप करें । वशी आधे चन्द्रमा के समान कुण्ड की रचना करके वैष्णव वह्नि में पद्मों के द्वारा जाती के पुष्पों से और यवों से क्रम से होम करे और ब्राह्मणों को भी भोजन करावे ।३२-३३। अर्चयिष् न् जगन्नाथं गायत्र्या परिशोधयेत् । आत्मानं यागवस्तूनि यागभूमिं च देशिकः ।।३४ त्रैलोक्यमोहनायै विद्महे पदमीरयेत् । स्मराय धीमहि पश्चात्तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ।।३५ गायत्र्यैषा समाख्याता वैष्णवा सर्वसिद्धिदा । प्राक्प्रोक्ते वैष्णवे पीठे कल्पयेदामन ततः ।।३६ पक्षिराजाय ठद्वन्द्वमस्य मन्त्रः प्रकीर्त्तितः । सङ्कल्पितायां मूलेन मूर्त्तौ देवमनन्यधीः ।।३७ आवाह्य मनुना विद्वान्ब्यापकेन समर्चयेत् । भृगुर्लान्तियुतः सेन्दु बीज देव्याः प्रकीर्तितम् ।।३८ जगन्नाथ प्रभु का अर्चन करते हुए देशिक को चाहिये कि गायत्री के द्वारा अपनी आत्मा का, याग की वस्तुओं का और याग की भूमि का शोधन करे ।३४। 'त्रैलोक्य मोहनाय विद्महे' - यह पद कहे । फिर 'स्मराय धीमहि' -यह कहे-इसके पश्चात् 'प्रचोदयात्' यह बोले । वह सर्व सिद्धियों के देने वाली वैष्णवी गायत्री कही है । पूर्व में कथिते वैष्णव पीठ पर आसन की कल्पना करनी चाहिए । ३५-३६। इसके बाद 'पक्षिराशाया' कहकर दो ठकार कहे-यह इसका मन्त्र कहा गया है । मूल मन्त्र के द्वारा कल्पित की हुई मूर्त्ति में आनन्य बुद्धि वाला होकर देव का आवाहन करे । विद्वान पुरुष व्यापक मन्त्र के द्वारा समर्चन करे । लान्त से युक्त बिन्दु के सहित भृगु देवी का बीज कीर्तित किया गया है ।३७-३८। कर्णिकायां यजेदादौ विधानेनाङ्गदेवताः । दलेषु पूजयेत्पश्चाल्लक्ष्म्याद्या घृतचामराः ।३६

३४८ ] [ श्रीशारदा तिलक मुक्ताहारलसच्चारुपयोधरभारान्विताः । जपाकुसुमसदृक्षाशा मदविभ्रममन्थराः ।४० ह्रस्वत्रयल्कीविसर्गरहितस्वरशोभितम् । देवीबीजं क्रमदासां मन्त्रमाहुर्मनीषिणः ।४१ दलाग्रेषु यजेच्छंखं शार्ङ्गं चक्रमसिं गदाम् । अङ्कुशं मुसलं पाशमेतान्यस्त्राणि शार्ङ्गिणः ।४२ स्वमुद्राभिः स्वमनुभिः कथ्यन्ते मनवः क्रमात् । आद्योजलचरायान्ते ठद्वयं मनुरीरितः ।४३ शार्ङ्गाय सशरायान्ते स्वाहान्तोऽनन्तरो मनुः । सुदर्शनमहाचक्रराजान्ते स्याद्दहदद्वयम् ।४४ सर्वदुष्टभयं पश्चात्कुरु छिन्दद्वयं (युगं) पृथक् । विदारय पदद्वन्द्वं परमन्त्रान्ग्रसग्रस ।४५ भक्षाय त्रासयद्वन्द्वं प्रत्येकं वर्मठद्वयम् । चक्राय नम इत्येष तृतीयो मन्त्र ईरितः ।४६ आदि में कर्णिका में विधान से अङ्ग देवों का यजन करना चाहिए पीछे दलों में चमर धारण की हुई लक्ष्मी आदि का पूजन करे । ये सब मोतियों के हार से शोभित सुन्दर पयोधरों के भार समन्वित है । ये सब जपा के पुरुष के सदृक्ष हैं और मद के विभ्रमों से मन्थरगति वाली हैं ।३६-४०। ह्रस्वत्रय अर्थात् अ इ उ इनसे रहित और क्लीब और विसर्गों से रहित स्वर अर्थात् आ—ई ऊ—ए—ऐ—ओ—औ और अं से युक्त देवी का बीज इनको मनीषी गण मन्त्र कहते हैं ।४१। अपनी मुद्राओं से अपने मन्त्रों से क्रम से मन्त्र कहे जाते हैं । ‘आद्यजल चराय’ पद है और अन्त में दो डकार (उः डा) हैं यह मन्त्र कहा गया है ।४३। शार्ङ्गाय सशराय--इसके अन्त में स्वाहा है--यह अनन्तर मन्त्र है । सुदर्शन महचक्र राज के अन्त में तो डकार हैं । पीछे सर्व दुषभयं कुरु और दो बार छिन्द पृथक् पृथक् कहे । फिर ‘विदारय’ इस पद को दा वार कहे । पश्चात् ‘परमन्त्रान् ग्रस-ग्रस कहे’ । भक्षय--भक्षय, त्रासय--

चतुर्थोऽयं मनुः प्रोक्तः, कौमोदकि महाबले ।४७

पंचदश पटल ] [ ३४६ त्रासय' कहे । प्रत्येक में दो ठकार वर्म हैं। चक्राय नमः यह कहे-यह तीसरा मन्त्र कहा है ।४४-४६। खड्गतीक्ष्णपदान्ते स्याच्छिन्दयुग्मं हुमादि च । चतुर्थोऽयं मनुः प्रोक्तः, कौमोदकि महाबले ।४७ सर्वासुरान्तकि पदं प्रसीदयुगवर्मफट् । स्वाहान्तोऽयं मनुः प्रोक्तःसद्भिः कौमोदकी प्रिय ।४८ अङ्कुशान्ते कट्टयुगं षष्ठोऽयं मनुरीरितः । संवर्त्तका मुशलं पोथयद्वितयं पुनः ।४६ हुँ फट् द्विष्टान्तोमन्त्रोऽन सप्तमः परिकीर्तितः । पाशबन्धद्वयं पश्चादाकर्षय पदद्वयम् ।५० वह्निजायावधिः सद्भिरष्टमो मन्त्रईरितः । खड्ग तीक्ष्ण पद के अन्त में छिन्द छिन्द में ये कहे और हुम आदि यह चौथा मन्त्र कहा गया है । 'कौमोदिक-महाबले-सर्वा सुरान्तकि' ये पद कहे दो वार प्रसीद पद कहे तथा वर्म और फट् कहे यह स्वाहा अन्त वाला सत्पुरुषों ने मन्त्र कहा है । कौमोदकी प्रिय-यह पद कहकर अन्त में अंकुश पद कहे । फिर दो बार 'कट्ट' यह पद कहे । यह छठवां मन्त्र कहा गया है । सम्वर्त्तक-इन पद के अन्त में मुशलं-यह पद होता है और फिर दो बार 'पोथय' यह शब्द बोले । इसके अन्त में हुँफट् और दो ठकार कहे-यह सातवाँ मन्त्र कहा गया है । फिर दो वार पाश बन्ध-यह तथा दो बार 'आकर्षय,-यह पद बोले । अन्त में 'स्वाहा' यह कहे तो सत्पुरुषोंके द्वारा यह आठवां मन्त्र कहा गया है । इसके पीछे वज्रादि आयुधों के सहित लोकेशों का अर्चन करना चाहिए ।४७-५१। लोकेशान् पूजयेत्पश्चाद्वज्राद्यै रायधैः सह ।५१ इत्थमभ्यर्चयेन्नित्यं यथावत्पुरुषोत्तमम् । प्राप्नोति महतीं लक्ष्मीं सौभाग्यमतुलं यशः ।५२ आयुरारोग्यमैश्वर्य्यंमनोभीष्टानि विन्दति । ह्यारिकुसुमैर्देवमर्चयित्वा यथाविधि ।५३

३५० ] [ श्रीशारदा तिलक शशिप्रसूनजुहुयाद्वसुसंख्यसहस्रकम् । मासमात्रेण वशगास्तस्युः सकला नृपाः ॥५४ हुत्वा बिल्वफलैः पक्वैः श्रियं विन्देदनिन्दिताम् । प्रफुल्लैररुणाम्भोजैस्तामेव लभते पुनः ॥५५ हुत्वा ज्योतिष्मतीतैलं सहस्रं वसुसंख्यक्रम् । सुभखगा जायते सम्यक् सर्वेषां नात्र संशयः ॥५६ इस रीति से नित्य ही अर्चन करता हुआ यथा रीति से पुरुषोत्तम प्रभु की पूजा करनी चाहिए । इस के प्रभाव से मनुष्य बहुत बड़ी लक्ष्मी को तथा अतुल वैभव को प्राप्त किया करता है ॥५२॥ आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य और यम के अभीष्टों की प्राप्ति किया करता है। ऽयारि के पुष्पों से नित्य ही यथाविधि अर्चन करके शशि के पुष्पों के द्वारा एक सहस्र आठ बार होम करना चाहिये । इसके प्रभाव से एक ही मास में सम्पूर्ण नृप वश में हो जाने वाले हो जाया करते हैं ॥५३-५४॥ पके हुए बेल के फलों द्वारा होम करके अनिन्दित श्री को मानव प्राप्त कर लेता है । खिले हुए अरुण कमलों से होम करके वही फल प्राप्त कर लेता है ॥५५॥ ज्योतिष्मती के तैल से एक हज़ार आठ आहुतियाँ देकर भली भाँति सुभगा लक्ष्मी सबको प्राप्त हो जाया करती है-इसमें कुछ भी संशय नहीं है ॥५६॥ विधानेनामुवा मन्त्री महारोगात्प्रमुच्यते । अश्वत्थसमिधां होमः पराहृतधनप्रदः (नावहः) ॥५७ आज्याक्तदूर्वाहोमेन मुच्यते महतोभयात् ॥५८ यस्य नामयुतं मन्त्रं जपेदयुतसंख्यया । स भवेद्दासवत्तस्य नात्र कार्या विचारणा ॥५६ वह्नि किसिहोक्तेन मनुना साधकोत्तमः । साधयेत्सकलान्कामान् साक्षाद्विष्णुरिवापरः ॥६० उत्तिष्ठ पदमाभाष्य श्री क्रोकपोधिशहुतशानौ । वह्निजायावर्म्मिन्त्रो वस्वक्षरसमन्वितः ॥६१

पंचदश पटल ] [ ३५१ मन्त्रधारी इस विधान से महारोग से मुक्त हो जाया करता है। पीपल की समिधाओं के द्वारा किया हुआ होम दूसरों के द्वारा हरण किये हुए धन के प्रदान करने वाला होता है ।५७। घृत में अक्त की हुई दूर्वा के होम के द्वारा महान् भय से छुटकारा पा जाया करता है ।५८। जिसके नाम से युक्त मन्त्र का दश सहस्र की संख्या में जप करे तो वह मानव उसके दान की ही भाँति हो जाता है-इसमें विचारणा कभी नहीं करनी चाहिए ।५६। यहाँ पर इस विषय में बहुत अधिक कथन से क्या प्रयोजन है। इस मन्त्र के द्वारा साधक अपने सभी कामों का साधन करता है और साक्षात् दूसरे विष्णु के ही समान हो जाता है ।६०। अब श्री कर मन्त्र का उद्धार बतलाया जाता है--उत्तिष्ठ श्री कहकर ककार और रेफ कह कर स्वाहा-यह पद कहे। यह मन्त्र आठ अक्षरों वाला होता है ।६१। ऋषिरस्य भवेद्वामः पंक्तिश्छन्द उदाहृतम् । श्रीकराख्यो हरिः प्रोक्तो देवतास्य मनीषिभिः ।६२ हृदयं भीषय द्वन्द्वं त्रासयद्वितयं शिरः । शिखाप्रमर्दययुगं वर्मपध्वंसयद्वयम् ।६३ अस्त्रं रक्षयुगं सर्वे हुतन्ताः समुदीरिताः । मूर्द्धनि नेत्रद्वये कण्ठे हृदयोदरयोः पुनः ।६४ उरुजङ्घापदद्वन्द्वे मन्त्रवर्णान्प्रविन्ससेत् । मुखे न्यसेद्ब्राह्मणोस्य मुखमासीदिमं मनुम् ।६५ बाहूराजन्यः कृतोऽयं न्यैस्तत्र्यो बाहुयुग्मके । ऊरू तदस्य यद्वैश्य इममूरुद्वये न्यसेत् ।६६ पादद्वये न्यसेन्मत्रं पद्भ्यां शूद्रो अजायत । चक्रं शंखं गदां पद्मं हस्ताग्रेष्वथ विन्ययेत् ।६७ इस मन्त्र का ऋषि वाम देव है और पंक्ति इस का छन्द कहा गया मनीषियों ने इस मन्त्र का देवता श्रीकर नाम वाले हरि भगवान् को बताया है ।६२। भीषय का द्वन्द्व इसका हृदय है और त्रासय का जोड़ा

३५२ ] [ श्रीशारदा तिलक इस का शिर होता है । मर्दय का जोड़ा उग्रकी शिखा है । प्रध्वसद्- इसका युगल इसका वर्म होता है ।६३। रक्ष का युगल अस्त्रा है । ये सब हुम अन्त वाले कहे गये हैं । अर्थात् इन सबको अन्त में हुम यह होता है । मूर्धा, दोनों नेत्र, कण्ठ, हृदय, उदर, ऊरु, जंघा पद द्वन्द्व में मन्त्र के वर्णों का विन्यास करना चाहिए । ब्रह्मण इसका मुख है---इस मन्त्र का मुख में न्यास करे ।६५। बाहूराजन्यः कृत--- इसका दोनों बाहुओं में न्यास करे । 'ऊरू तदस्य यद् वैश्यः'--इसका ऊरू हृदय में न्यास करना चाहिए । 'पद्भ्याशूद्रो अजायत्--इसका दोनों पादों में विन्यास करे । हस्तौ के अग्र भागों में शंख, चक्र, गदा और पद्म का न्यास करना चाहिए ।६६।६७। इत्थं न्यासं तनौ कृत्वा देवं पूर्वोक्तमण्डपे । रक्तपद्मासनस्थस्य गरुडस्योपरि स्थितम् ।६८ काञ्चनाद्रिसमप्रभ कमलाननं कमलेक्षणम् । चक्रशंखगदासरोजधरं मनोहरदर्शनम् ।६६ कौस्तुभाङ्कितवक्षसं मुकुटाङ्गदादिविभूषणम् । तार्क्ष्यवाहनमच्युतं हृदि भावयामि जगत्पतिम् ॥७० अष्टलक्षं जपेन्मन्त्री मन्त्रमेतं दशांशतः । बिल्वक्षीरद्रुमोत्थाभिः समिद्द्भिररुणाम्बुजैः ।७१ पयोन्नैः सर्पिषा हुत्वा गुरुं सन्तोषयेद्धनैः । मृत्तौ मूलेन क्लृप्तायां पूजयेद्देवमन्वहम् ।७२ अङ्गान्यादौ समाराध्य दिक्पत्रेषु समर्चयेत । श्रियं धृतिं रतिं कान्तिं लोलापङ्कजधारिणीः ।७३ पीतारुणाः श्यामनीला विदिक्पत्रेषु पूजयेत् । वासुदेवादिका मूर्तीः पार्श्वयोर्निधियुग्मकम् ।७४ इस प्रकार से शरीर में न्यास करके पूर्व में कहे हुए मण्डप में देव का जो रक्त पद्म के आसन पर स्थित है---गरुड़के ऊपर विराजमान हैं सुवर्ण के पर्वत के समान प्रभा से संयुत---कमल जैसा जिनका मुख