भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 320, कुल 511 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 320

३२० ] [ श्रीशारदा तिलक स्मृत्वाऽऽत्मानं रिपुं पश्चाद्ध्यायेन्मृगशिशुं पुरः । गृहीत्वा गलदेशे तं पुनर्दिक्षु क्षिपेद्द्रुतम् ।२३ इसके करने पर क्षुद्र भूत ज्वर आदि के द्वारा होने वाले उपसर्ग विनष्ट हो जाया करते हैं। रवि में दुःस्वप्न केहो जाने पर स्नान करके इस मन्त्र का जप करना चाहिए। २८। इसके पीछे मन्त्र का ज्ञाता निद्रा रहित रहेतो उसको सुन्दर स्वप्नहुआ करता है। भयसे समाकुल महान् अरण्य में व्याघ्र चोर और मृगादि से यह जपा हुआ मंत्र रक्षा किया करता है तथा अन्य प्रकार के मंत्रों में भी यह मंत्रधारी की रक्षा करता है। इसके द्वारा अभिमंत्रित भस्म विष ग्रह के महान् भयों का तुरन्त ही विनाश कर दिया करता है। इस मन्त्र का यह प्रभाव होता है। घोर अभिचार मे उन्माद में महान् उत्पात में और महान् भय में इस महान् मंत्र का जप करे और देव का स्मरण करना चाहिए। इससे मनुष्य दुःख से विमुक्त हो जाया करता है। अपने आपको सिंह के स्वरूप वाला महान् भीषण नखों और दंष्ट्रा से अत्यन्त भयानक स्मरण करके इसके पश्चात् शत्रु को अपने आगे मृग के शिशु के रूप में ध्यान करना चाहिये। उसके कण्ठ को पकड़कर उसको शीघ्रही दिशाओं में क्षिप्त कर देवे ।१६-२३। पुत्रमित्रकलत्राद्यं रुच्चाटोजायते रिपोः । पूर्वमृत्युपदे साध्यनामकृत्वा स्वयं हरिः २४ निशितैखदंष्ट्राग्रैः खाद्यमानं रिपुं स्मरेत् । नित्यमष्टोत्तरशतं जपेन्मन्त्रमतन्द्रितः ।२५ जायते मण्डलादर्वाक् शत्रु वैवस्वतप्रियः । कुर्वीत यत्नं विधिवच्छत्रुसेनानिवारणे ।२६ बिभीतकाष्ठे ज्वलिते पावके रिपुमर्द्दनम् । विचित्य देवं नृहरिं सम्पूज्य कुसुमादिभिः ।२७ समूलतू (तूलम्) लैर्जुहुयाच्छरैर्दशशतं पृथक् । रिपुं खादन्निव जपेतिभेदन्निव च तान् जपे (क्षिपे) त ।२८