शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 321, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्दश पटल ] [ ३२१ हुत्वा सप्तदिनं मन्त्री सेनामिष्टा महीपतेः । प्रस्थापयेच्छुभेलग्ने परराज्यजयेच्छया ।२६ तस्याः पुरस्तान्नृहरिं निघ्नन्तं रिपुमण्डलम् । स्मृत्वा प्रयोगं कुर्वीत यावदायाति सा पुनः ।३० विजित्य निखिलाञ्छत्रून् सहवीरश्रिया सुखम् । आगत्य विजयी राजा ग्रामक्षेत्रधनादिभिः ।३१ प्रीणयेन्मन्त्रिणं सम्यग्विभवैः प्रीतमानसः । मन्त्री यदि न सन्तुष्टोह्यनर्थः स्यान्महीपतेः ।३२ बीजं साध्यसमन्वितं प्रविलिखेन्मध्येऽष्टपत्रेष्वथो । मन्त्रार्णान् श्रुतिशो विभज्य विलिखेत् लिप्या बहिर्वेष्टयेत् । यन्त्रं क्षुद्रविषग्रहाभयरिपुप्रध्वसनं श्रीप्रदम् ।३३ रिपु को पुत्र-मित्र-कलत्र आदि से उच्चाटन हो जाता है । पूर्व मृत्यु पद में ( मन्त्र में तो दो मृत्यपद है उनमें पिछले मृत्यु पद में ) साध्य का नाम करके हरि स्वयं पैने नखों के अग्र भागों के द्वारा खद्य- अर्थात् खाये जाने वाले अपने शत्रु का स्मरण करना चाहिए । तन्द्रा रहित होकर नित्य ही मन्त्र को एक सौ आठ बार जपे तो मण्डल से पहिले ही शत्रु यमराज का प्रिय अर्थात् मृत हो जाया करता है । विधि के साथ शत्रु के निवारण करने में यत्न करना चाहिए । २४- २६। बिभीत वृक्ष के काष्ठ से ज्वलित अग्नि में रिपु के मर्दन का ध्यान करके कुसुम आदि उपचारों से नृसिंह देव का पूजन करे । २७ मूल के सहित तूल शरों से पृथक् एक सहस्र का होम करे । रिपु को खाते हुये के समान तथा उसका भेदन करते हुये के समान जप करे ।२१। मन्त्रधारी सात दिन होम करके राजा को अभीष्ट सेना को शुभ लग्न में प्रस्थान करावे और दूसरे की राज्य की इच्छा से करावे ।२६। उस सेना के आगे रिपु मण्डल का निहनन करते हुये नृसिंह भगवान् का स्मरण करके जब तक फिर न आवे प्रयोग करे ।३०।