भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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पृष्ठ 318

३१८ । [ श्रीशारदा तिलक युत जीभ वाले, ऊपरकी ओर उठे हुए केशोंके समूहों से युक्त विभु भग- वान् नृसिंह की वन्दना करता हूँ ।७। इस मंत्र के जितने वर्ण हैं उतने ही लाख इस मन्त्र का जप करना चाहिए और उतने ही सहस्र घृत से प्लत पायसान्न से विधि के साथ समर्चित अग्नि में होम करे ।८। इस प्रकार से करने पर मन्त्रधारी सिद्ध मन्त्र वाला हो जाया करता है और प्रताप वाला होता है । पूर्व मे वर्णित पीठपर पूजा करनी चाहिए और मूल मन्त्र के द्वारा मूर्ति की कल्पना करनी चाहिये ।६। उसी मूर्ति में अनन्य धी वाला पुरुष दैत्यों के शत्रु नृसिंह भगवान् का विधि के साथ अर्चन करे । आदि में अङ्गों की समाराधना करके पुनः दिन्दलों में यजन करना चाहिये ।१०। फिर पक्षीन्द्र शंकर-शेष अन्य योनि का क्रमानुसार यजन करे । श्री-ह्री धृति-पुष्टि का अन्धू आदि में यजन करना चाहिये ।११। लोकपालों का भली भाँति अर्चन करे और इनके उपरान्त आगे उनके अस्त्रों का यजन करना चाहिये । इस प्रकार से जप आदि के द्वारा मन्त्र के सिद्ध हो जाने पर काम्य कर्मों का साधन करना चाहिए ।१२। उद्यत्कोटिरविप्रभं नरहरिं कोटीरहारोज्ज्वलम् । दंष्ट्राभीममुखं लसन्नखमुखैर्दीर्घैरनेकभुजैः । निर्भिन्नासुरनाथमग्निशशभृत्यूर्यात्मनेत्रत्रयम् । विद्युत्पुञ्जजटाकलापभयदं वह्निं वमन्तं भजे ।१३ सौम्ये सौम्यं स्मरेत्कार्ये क्रूरे क्रूरमिमं भजेत् । श्रीपुष्पैर्जुहुयान्मन्त्री बिल्वकाष्ठैंधितेनले ।१४ सहस्रं श्रियमाप्नोति पत्रैर्वा बिल्वसम्भवैः । प्रसूनैर्वा फलैस्तद्वद्दुर्वाहोतादरोगताम् ।१५ मन्त्रजप्तं वचां श्वेतां भक्षयेत्प्रातरन्वहम् । वाक्सिद्धिं लभते मन्त्री वाचस्पतिरिवापरः ।१६ सलिले देवमभ्यर्च्य गन्धपुष्पादिभिः शुभैः । दूर्वाभिस्तत्र जुहुयान्नित्यमष्टोत्तरं शतम् ।१७