शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्दश पटल ] [ ३१७ गया है जो कल्प वृक्ष के समान होता है । इसका ऋषि ब्रह्मा, अनुष्टुप् छन्द कहा गया है । इसके देवता नृसिंह हैं जो सभी सुरों और असुरों के द्वारा वन्दित होते हैं ।१-३। चार वर्णों से हृदय और चार से ही शिर कहा गया है । आठ से शिखा और छै से कवच बताया गया है ।४। उतने ही से नमन कहा है और अस्त्र करणाक्षरों से होता है । वर्णों को क्रम के अनुसार शिर, ललाट, नेत्रों, मुख, बाहु, चरण, सन्धियों, साग्रों, कुक्षि, हृदय, कण्ड और दोनों पार्श्वों में, अपराङ्ग में और ककुद में न्यास करना चाहिये ।५-६। माणिक्याद्रिसमप्रभं निजरुचा संत्रस्तरक्षोगणम् । जानुन्यस्तकराम्बुजं त्रिनयनं रक्तोल्लसद्भूषणम् ॥ बाहुभ्यां धृतचक्रशंखमनिशं दंष्ट्राग्रवकोल्लस । ज्वालाजिह्वमुदग्रकेशनिचय ं वन्दे नृसिंहं विभुम् ।७ वर्णलक्षं जपेन्मन्त्रं तत्सहस्रं घृतप्लुतैः । पायसन्नैः प्रजहुयाद्विधिवत्पूजितेऽनले ।८ एवं कृते भवेन्मन्त्री सिद्धमन्त्रः प्रतापवान् । पूजा प्रागोरिते पीठे मूर्त्ति मूलेन कल्पयेत् ।६ पूजयेद्विधिवत्तस्यां दैत्यशत्रु मनन्यधीः । अङ्गान्यादौ समाराध्य दिग्दलेषु यजेत्पुनः ।१० पक्षीन्द्र शंकर ं मेषमव्रजयोनि यथाक्रमम् । श्रियं ह्रियं धृतिं पुष्टिमङ्- घ्यादिषु यजेत्ततः ।११ लोकपालाः समभ्यर्च्यस्तद्देस्त्राणि ..तः परम् । इत्थं जपादिभिः सिद्धे मनौ काम्यानि साधयेत् ।१२ अब नृसिंह भगवान् का ध्यान बतलाया जाता है—माणिक्य के पर्वत के समान प्रभा से समवेत—अपनी रुचि से राक्षसगणों को सत्रस्त करने वाले, जानुओं पर अपने कर-कमलों को न्यस्त किये हुए, तीन नेत्रों से समन्वित, रक्त उल्लसत् भूषणों से युक्त बाहुओं में निरन्तर चक्र और शंख को धारण करने वाले, दाढ़ों के अग्रभाग से उल्लासित ज्वाला-