शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 316, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें३१६ ] [ श्रीशारदा तिलक प्राप्त किया करता है। ५२। मंत्रधारी इस प्रकार से धरा का जप करे तो पशु-रत्न-धन आदि के साथ वह धरा का स्वामी होता है इसमें कुछ भी विचारणा नहीं करनी चाहिए। ५३। ―― चतुर्दश पटल ॥ नारसिंह प्रकरण ॥ अथाभिधास्ये विधिवन्नारसिंहं महामनुम् । उग्रं वीरं वदेत्पूर्वं महाविष्णुमनन्तरम् । १। ज्वलन्तं पदमाभाष्य सर्वतोमुखमीरयेत् । नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं वदेत्ततः ।२ नमाम्यहमयं प्रोक्तो मन्त्रराजः सुरद्रुमः । ऋषिर्ब्रह्मा समुद्दिष्टश्छन्दोऽनुष्टुबुदाहृतम् । देवता नरसिंहः स्यात्सुरासुरनमस्कृतः । ३ चतुर्भिर्हृदयं वर्णैः शिरस्तावद्भिरेरितम् । शिखाऽष्टाभिः समुद्दिष्टा षड्भिः कवचमीरितम् ।४ तावद्भिर्नयनं प्रोक्तमस्त्रं स्यात्करणाक्षरैः । शिरोललाटनेत्रेषु मुखबाह्वङ्घ्रिसन्धिषु । ५ साग्रेषु कुक्षौ हृदये गले पार्श्वद्वये पुनः । अपरांगे ककुदि च न्यसेद्वर्णान्यथाक्रमात् । ६ इसके अनन्तर विधि के साथ नृसिंह के महान् मंत्र राज के विषय में बतलाऊँगा-पूर्व में-उग्र वीर-इन पदों को कहे। इसके अनन्तर 'महाविष्णु' इसको बोले । फिर 'ज्वलन्त'-इस पद को कहकर 'सर्वतो मुख' यह कहना चाहिये । इसके उपरान्त नृसिंह भीषण भद्र मृत्युमृत्यु' इन पदों को कहे। फिर 'नमाम्यहम्" यह कहे—यह मंत्रराज कह।