भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 307, कुल 511 में से

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पृष्ठ 307

त्रयोदश पटल ] [ ३०७ किञ्जल्केषु स्वरगणमथो यन्त्र मध्येपु मालामन्त्रो- त्थाणान् गुहमुखमितनष्टमे पञ्चवर्णान् ।१०१ दशाक्षरेण संवेष्ट्य कादिवर्णैश्च भूपुरे । दिग्विदिक्षु लिखेद्बीजे नरसिंहवराहयोः ।१०२ नमो भगवते ब्रूयाच्चतुर्थ्या रघुनन्दनम् ।' रक्षोध्नविषदायान्ते मधुरादि समीरयेत् ।१०३ प्रसन्नवदनायेति पश्चादमिततेजसे । बलाय पश्चाद्रामाय विष्णवे तदनन्तरम् । प्रणवादि नमोन्तोऽय मालाममुरोदीरितः ।१०४ जानकीवल्लभायाथ भवेत्पावकवल्लभा । हृमादिरेषः कथितो राममन्त्रो दशाक्षरः ।१०५ जपादिसार्वितं यन्त्रं स्वर्णपट्टादिकल्पितम् । बाहुना विधृतं दद्याद्विजयश्रीपराक्रमान् ।१०६ अब धारण यन्त्र बतलाया जाता है मध्य में प्रणव लिखे, छः कोणों में मन्त्र लिखे, सन्धियों में अङ्गलिखे, पीछे कोण गण्डों में क्रम से माया और स्वर का भी लेखन करे । यन्त्र के मध्य किजल्कों में स्वर गण को लिखना चाहिये । मालामन्त्रोत्थ गुह मुखसित पांच वर्णों को अष्टम में लिखे । दशाक्षर और कादि वर्णों से भूपुर में संवेष्टित करना चाहिए । दिशा और विदिशाओं में नरसिंह और वराह के बीजों को लिखे ।१०१-१०२। अब माला मन्त्र को बतलाया जाता है-आदि में 'नमो भगवते' यह बोले । फिर चतुर्थी अन्त वाले 'रघुनन्दन' इस पद को कहे अर्थात् 'रघुनन्दनाय' यह कहे । फिर ,रक्षोध्न विषदाय, यह कहे और अन्त में मधुरादि कहना चाहिये । फिर 'प्रसन्न वदनाय' यह और पीछे 'अमिततेजसे' यह बोले । 'बलाय' पीछे 'रामाय' और इसके अनन्तर विष्णवे, यह कहें । इसके आदि में प्रणव और अन्त में 'नमः' यह पद होता है । यह माला मन्त्र कहा गया है ।१०३-१०४। 'जानकी वल्लभाय' । फिर पावक वल्लभा अर्थात् 'स्वाहा' कहे । यह

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