शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 308, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें३०८ ] [ श्रीशारदा तिलक हुम् आदि वाला है और दश अक्षरों का राम मन्त्र होता है ।१०५। जप आदि से साधित किये हुये यन्त्र को स्वर्णपट्ट आदि पर कल्पित करे । इसको बाहु पर विघृत करे तो वह विजय श्री और पराक्रम देता है ,१०६। गदितं राममन्त्रस्य विधानं सुरपूजितम् । तारं नमो भगवते वराहपदमीरयेत् । १०० रूपाय भूर्भुवः स्वः स्यात् पतये तदनन्तम् । स्यात् भूपतित्वं मे पदान्ते देह्यन्ते च ददापय ।१०८ वह्निजायावधिर्मन्त्रः स्यात्त्रयस्त्रिंशदक्षरः । भार्गवो मुनिराख्यात श्छन्दोऽनुष्टुबुदाहृतम् ।१०६ देवतादिवराहोऽस्य मन्त्रस्य कथितो बुधैः । एकदंष्ट्राय हृदयं व्योम्नोल्काय शिर.स्मृतम् ।११० शिखा तेजोऽधिपतये विश्वरूपाय वर्म च । महावराहायास्त्रं स्यात्पञ्चाङ्गमिति कल्पयेत् ।१११ यह राम मन्त्र का सुरों द्वारा पुजित विधान कहा गया है । आदि में प्रणव-फिर 'नमो भगवते' यह पद-इसके बाद 'वराह पद' को कहे । फिर 'रूपाय भूर्भवः, स्वः' कहे । इसके अनन्तर 'पतये'- यह पद बोले । फिर 'भूपति त्व ये'-इस पद के अन्त में 'देहि' और अन्त में 'ददापय' कहे । अन्त में 'स्वाहा' कहे । यह मन्त्र तैंतीस अक्षरों का होता है । इसका मुनि भार्गव और छन्द अनुष्टुप् कहा गया है ।१०७-१०६। इस मन्त्र का देवता आदि वराह है-ऐसा बुधगणों ने कहा है । एह दंष्ट्राय-इसका हृदय है । व्योम्नोल्काय-शिर कहा गया है । तेजोऽधिपतये-इसकी शिखा है और विश्वरूपाय-इसका वर्म होता है । महावराहाय-अस्त्र है इस तरह से पञ्चाङ्ग की कल्पना करनी चाहिये ।११०-१११। आपादञ्जानुदेशाद्वरकनकनिभं नाभिदेशादधस्ता। न्मुक्ताभं कण्ठदेशात्तरुणारविनिभं मस्तकान्नीलभासम् ।