शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 288, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें२८८ ] [ श्रीशारदा तिलक निवास किया करती ।१४३। एक सौ आठ वार जप किये हुए जल को प्रातः काल में पीवे तो घृत ले अग्नि की ही भाँति उसकी जठराग्नि जला करती है ।१४४। कृत्वा नवपदात्मानं मण्डलं प्रागुदीरितम् । कलशान्नव कल्याणांस्थापयेत्प्रोक्तवर्त्मना ।१४५ क्षीरवृक्षत्वगुद्भूतैः क्वाथैस्तान्पूरयेत्क्रमात् । वस्त्रादिभिरलङ्कृत्य नवरत्नानि निः क्षिपेत् ।१४६ मध्ये सम्पूज्येदग्निं मूर्तीरष्टौदिशं क्रमात् । कुम्भेषु गन्धपुष्पाद्यैर्धूपदीपैर्मनोरमैः ।१४७ स्पृष्ट्वाः जपेत्ततःकुम्भान् मंत्रमष्टोत्तरं शतम् । अभिषिञ्चेत्ततः साध्यं विनीत दत्तदक्षिणम् ।१४८ ज्वरग्रह महारोगदारिद्र्यादीन्विजित्य सः । जीवेद्वर्षशतं सम्यगभिषिक्तः श्रिया सह ।१४६ पूर्व में वर्णित नव पदों के स्वरूप वाले मण्डल की रचना करके वहाँ पर नौ मङ्गल कलशों को कथित मार्ग के द्वारा स्थापित करना चाहिये ।१४५। फिर दूध वाले वृक्षों के वल्कल से बनाये हुये क्वाथ से क्रम से उनको भर देवे । फिर वस्त्र आदि से उनको भूषित करके उनमें नौ रत्नों का निःक्षेप करना चाहिये ।१४६। मध्य में अग्नि का पूजन करे और क्रम से आठों दिशाओं में आठ मूर्तियों का गन्ध पुष्पादि के द्वारा कुम्भों में मनोरम धूप-दीपों के द्वारा पूजन करे । इसके अनन्तर उन कुम्भों का स्पर्श करके अष्टोत्तर शत मन्त्र का जप करना चाहिये । फिर परम विनीत दक्षिणा देने वाले साध्य का अभिषिंचन करे ।१४७। ।१४८। वह पुरुष ज्वर—ग्रह-महारोग और दरिद्रता ओदि पर विजय प्राप्त करके श्री के सहित अभिषिक्त हुआ भली-भांति एक सौ वर्ष तक जीवित रहा करता है ।१४६।