भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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२८ [ द्वितीय पटल तत्वात्मनः स्मृताः स्पर्शाः मकारः पुरुष यतः । व्यापका दश ते कामधनधर्मप्रदायिनः ॥४ ह्रस्वः स्वरेषु पूर्वोक्तः परो दीर्घः क्रमादिमे । शिवशक्तिमयास्ते स्युर्बिन्दुसर्गावसानकाः ॥५ इसके अनन्तर मनुष्यों के मुख में वर्णों की अभिव्यक्ति को बतलाया जायगा । नित्य ही वायु के द्वारा प्रेरित हुए सुषुम्णा के रन्ध्र से निर्गत हुए कण्ठ आदि करणों द्वारा क्रम से वर्ण आविर्भूत होते हैं । इनमें सौम्य-शुभोदय-स्पर्श-सौर स्वर कहे गये हैं ।१-२। सब सोम सूर्य और अग्नि देवता आश्रय और व्यापक हैं । स्वर सोलह विख्यात हैं और स्पर्श संज्ञक 'क' से आदि लेकर मकारपर्यन्त पच्चीस हैं । ये सभी स्पर्श संज्ञा वाले वर्ण तत्व के स्वरूप वाले कहे गये हैं मकार पुरुष अर्थात् परमात्मा विश्वरूप होता है । वे दश व्यापक हैं जो धन-धर्म और काम के प्रदान करने वाले होते हैं ।३-४। स्वरो में ह्रस्व पूर्वोक्त है और दीर्घ पर है । क्रम से ये शिव शक्तिमय होते हैं । जिनके अवसान में बिन्दु और विसर्ग हैं ।५। बिन्दुः पुमान् रविः प्रोक्तः सर्गः शक्तिर्निशाकरः । स्वराणां मध्यगं यच्च तच्चतुष्ट नपुंसकम् ॥६ पिङ्गलायां स्थिता ह्रस्वा इडायां सङ्गताः परे । सुषुम्णा मध्यगा ज्ञेयाश्चत्वारो ये नपुंसकाः ॥७ विना स्वरैस्तु नान्येषां जायते व्यक्तिरञ्जसा । शिवशक्तिमयान्प्राहुस्तस्माद्वार्णान्मनीषिणः ॥८ कारणात्पञ्चभूतानामुद्भूता मातृका यतः । ततो भूतात्मका वर्णाः पञ्चपञ्चविभागशः ॥६ वाय्वग्निभूजलाकाशाः पञ्चाशल्लिपयः क्रमात् । पञ्च ह्रस्वः पञ्च दीर्घा बिन्दुन्ता सन्धिसम्भवा ॥ १० पञ्चाशत्कादयः पक्षलसहान्ताः समीरिताः । सोमसूर्याग्निभेदेन मातृकावर्णसम्भवाः ॥११