शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीशारदा तिलक ] २६ बिन्दु पुमान् है और रवि कहा गया है । विसर्ग शक्ति निशाकर है स्वरों में जो मध्य में स्थित है वह चतुष्क नपुंसक होता है ।६। ह्रस्व पिङ्गला में स्थित होते हैं-दूसरे इड़ा में सङ्गत हैं-मध्य में रहने वाले सुषुम्णा में जानने चाहिये जो चार नपुंसक हैं ।७। स्वरों के बिना अन्य वर्णों की अभिव्यक्ति शीघ्र नहीं हुआ करती है । इस कारण से मनीषी गण वर्णों को शिव शक्ति से परिपूर्ण कहा करते है ।८। क्योंकि पञ्च- भूतोंके कारण से मातृ का समुद्भूत हुई है । इससे पाँच-पाँच के विभाग से वर्ण भूतात्मक होते हैं ।६। वायु, अग्नि, भू, जल और आकाश क्रम से पचास लिपियाँ हैं । पाँच ह्रस्व है और पाँच दीर्घ है-जिनके अन्त में विन्दु है वे सन्धि सम्भव होते हैं । 'कादि ष-क्ष-ल-स' और 'ह' अन्त वाले पचास कहे गये हैं । ये सोम-सूर्य और अग्नि के भेद से मातृका वर्ण से सम्भव होने वाले हैं ।१०-११। अष्टत्रिंशत्कलास्तन्मण्डहेव व्यवस्थिताः । अमृता मानदा पूषा तुष्टिः पुष्टीरतिवृतिः ॥१२ शशिनी चन्द्रिका कान्तिर्ज्योत्स्ना श्रीः प्रीतिरङ्गदा । पूर्णा पूर्णामृता कामदायिन्यः स्वरजाः कलाः ॥१३ तपिनी तापनी धू म्रा मरीचिर्ज्वलिनी रुचिः । सुषुम्णा भोगदा विश्वा बोधिनी धारिणी क्षमा ॥१४ कभाद्या वसुदाः सौयष्ठडान्ता द्वादशेरिताः । धू म्रार्चिरुष्मा ज्वलिनी ज्वालिनी विस्फुलिङ्गिकी ॥१५ उन-उनके मण्डली में अड़तीस कलाएं व्यवस्थित हैं । अमृता, मानदा, पूषा, तुष्टि, पुष्टि, रति, शशिनी, चन्द्रिका, कान्तिज्योत्स्ना, श्री, प्रीति, अङ्गदा, पूर्णा, पूर्णामृत, ये स्वरों मे सात कलायें काम दायिनी हैं ।१२-१३। तपनी, तापना, धूम्रा, मरीचि, ज्वालिनी, रुचि, सुषुम्णा, भोगदा, विश्वा, बोधिनी, धारिणी, क्षमा, कभाद्या, वसुदा, सौर्यष्ठडान्त द्वादश कही गयी है। धूम्रार्चि, ऊष्मा, ज्वालिनी, विस्फु- लिङ्गिनी ।१४-१५।