शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३० [ द्वितीय पटल सुश्रीः सुरूपा कपिला हव्यकव्यवहा अपि (इमाः) । यादीनां दशवर्णानां कला धर्म प्रदा इमाः (स्मृताः) ॥१६ अभयेष्टकरा ध्येयाः श्वेतपीतारुणाः क्रमात् । तारस्य पञ्चभेदेभ्यः पञ्चाद्वर्णगाः कलाः ॥१७ सृष्टिर्वृ (ऋ) द्धिः स्मृतिर्मेधा कान्तिर्लक्ष्मी धृतिः स्थिरा । स्थितिः सिद्धिरिति प्रोक्ताः कचवर्गकला क्रमात् ॥१८ अकारादु ब्रह्मणोत्पन्नास्तप्तचासीकरप्रभाः । एताः कर धृताक्षस्रक्पङ्कजद्वयकुण्डिकाः ॥१६ जरा च पालनी शान्तिरीश्वरी रतिकामुके । वरदा ह्लादिनी प्रीतिर्दीर्घाः स्पुष्टटवर्गगाः ॥२० सुश्री, स्वरूपा, कपिला, हव्यकव्यवहा और 'यादि' दश वर्णों की ये कलायें धर्म प्रद हैं । १६। क्रम से श्वेत-पीत और अरुण अभय तथा अभीष्ट की करने वाली ध्यान के करने के योग्य है । तार (प्रणव) के प्राप्त भेदों से पचास वर्णों में रहने वाली कलायें । १७। सृष्टि, वृद्धि, स्मृति, मेधा, कान्ति, लक्ष्मी, धृति, स्थिरा, स्थिति, सिद्ध ये क्रम से क च वर्णों की कलाये हैं । १८। ये अकार से ब्रह्मा के द्वारा उत्पन्न, तप्त सुवर्ण के समान प्रभा वाली हैं। ये करों में अक्ष माला, दो कमल और कुण्डिकाको धारण करने वाली हैं । १६। जरा, पालिनी, शान्ति, ईश्वरी, रति, कामुका, वरदा, ह्लादिनी, प्रीति, दीर्घा ये वृत्त वर्गों में रहने वाली हैं ।२०। उकरा विष्णनोत्पन्नास्तमालदलसन्निभाः । अभीति शंख (वर) चक्रेष्टवाहवः परिकीर्त्तिताः ।२१ तीक्ष्णा रौद्रा भया निद्रा तन्द्री क्षुत् क्रोधिनी क्रिया । उत्कारी मृत्युरेताः स्युः कथिताः पयवर्गगाः ।२२ रुद्रेण मारुतादुत्पन्नाः शरच्चन्द्रनिभप्रभाः । उद्वन्त्योऽभय शूलं कपालं बाहुभिर्वरम् ॥२३