भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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श्रीशारदा तिलक ] ३१ ईश्वरेणोदिता बिन्दोः पीता श्वेताऽरुणाऽसिता । अनन्ता च पवर्णस्था जपाकुसुमसान्निभाः ॥२४ अभयं हरिणं टङ्कं दधाना बाहुभिर्वरम् । निवृत्तिः यप्रतिष्ठा स्याद्विद्याशान्तिरनन्तम् ॥२५ उकार भगवान् विष्णु के द्वारा समुत्पन्न है और ये तमाल दल के सदृश हैं । इनके करकमलों में अभयदान शंख, चक्र, वरदान कीर्तित किये गये हैं ।२१। तीक्ष्णा, रौद्रा, भया, निद्रा, क्षुत्, क्रोधिनी, क्रिया, उत्कारी, मृत्यु, ये पय वर्गों में से स्थित कही गयी हैं !२२। ये रुद्रदेव के द्वारा मार्ग से समुत्पन्न हैं और शरत्काल के चन्द्र के समान प्रभा से युक्त है । ये अपनी बाहुओं के द्वारा अभयदान शूल, कपाल और वरदान को उद्वहन करने वाली हैं ।२३। ईश्वर के द्वारा उदित बिन्दु से पीत, श्वेत, करुण और असित और अनन्त है जो पवर्ण में स्थित होती है तथा जपा के पुष्प न सदृश है ।२४। ये अपनी बाहुओं से अभय, हरिण टंक और वरदान को धारण करने वाली हैं । ये निवृत्ति, सप्रतिष्ठा, विद्या और शान्ति हैं ।२५। इन्दिरा दीपका चैव रेचिका मोचिका परा । सूक्ष्मा सूक्ष्मामृता ज्ञानामृता चाप्यायिनी तथा ॥२६ व्यापिनी व्योमरूपा स्युरनन्ताः स्वरसंयुताः सदाशिवेन सहिता नादादेताः सितत्विषः ॥२७ अक्षस्रक् पुस्तकगु णंकपालाढ्यकराम्बुजाः । न्यासे तु योजयेदादौ षोडशस्वरजाःकलाः । २८ इति पञ्चाशदाख्याताः कलाः सर्वसमृद्धिदाः । श्रीकण्ठानन्तसूक्ष्माश्च त्रिमूर्त्तिरमटेश्वरः ॥२६ अधींशोभारभूतिश्चातिथीशः स्थाणुको हरः । झिष्टीशो भौतिकः सद्योजातश्चानुग्रहेश्वरः ॥३० अक्रूरश्च महासेनः षोडशस्वरमूर्त्तयः । पश्चात् क्रोधोश-चण्डीश-पञ्चान्तक-शिवोत्तमाः ॥३१