शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३२ [ द्वितीय पटल अप्यैकरुद्रकूर्मै कनेत्राङ्कचतुराननाः। अजेयः सर्वसोमेशौतथालांघलितारुका ॥३२ अर्द्धनारीश्वरश्चोमाकान्तश्चाषाढिदण्डिनौ । स्युरद्रिर्मीनमेषाख्यौलोहितश्च शिखी तथा ॥३३ छगलण्डद्विरण्डेशौ महाकालसवालिगौ । भुजङ्गे शापनाकींशखड्गीशाख्या वकस्तथा ॥३४ श्वेतभृग्वीशनक्लिशिवाःसर्व्वर्त्त कस्ततः । एते रुद्राः स्मृता रक्ता धृतशूलकपालकाः ॥३५ इन्द्रिका, दीपका, रेचिका, सूक्ष्मा, सूक्ष्मा, सूक्ष्मामृता, ज्ञानामृता, आप्यायिनी, व्यापिनी, व्यामरूपा, स्वरों से समन्वित अनन्त है। सदाशिव के सहित ये सित कान्ति वाली नाद से हुई है।२६-२७। इनके करकमल अक्षमाला-पुस्तक-गुण और कपाल से युक्त हैं। न्यास करने के समय 'म' आदि में सोलह स्वरों से समुत्पन्न कलाओं को योजित करना चाहिए।२८। ये इस प्रकार से समस्त समृद्धियों के देने वाली पचास कलाये कही गयी हैं। स्वरों की सोलह मूर्त्तियाँ होती हैं-श्रीकण्ठ, अनन्त, सूक्ष्म, त्रिमूर्ति, अमरेश्वर, अर्धीश, भारभूति, अर्धीश, भारभूति, अतिथीश, स्थाणुक, हर, झिष्टीश, भौतिक, सद्योजात, अनुग्रहेश्वर, अक्रूर, महासन, ये ही सोलह मूर्त्तियाँ हैं। पीछे क्रोधीश, चण्डोश, पञ्चान्तक, शिवोत्तम, एक रुद्र, कूर्म, एक नेत्र, चतुरानन, अजेय, शर्व, सोमेश, लाङ्घालिता, रुक, अध नारीश्वर, उमाकान्त, आषाढ़ी, दण्डी, अद्रि, मीन, मेष, लोहित, शिखी, छगलण्ड, द्विरण्डेश, महाकाल, वाणी, भुजङ्गेश, पिनाकी, खङ्गीश, वक, श्वेतभृगु, ईश, नरति, शित्र, संवर्तक, ये रुद्र कहे गये हैं जिनका रक्त वर्ण है। और ये त्रिशूल और कपाल को धारण किये हुए हैं।२६-३५। पूर्णोदरीस्याद्धिरजा शातली तदनन्तरम् । लोलाक्षी वर्त्तुलाक्षी च दीर्घघोणा समीरिताः ।३६