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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

श्रीशारदा तिलक ] २६ बिन्दु पुमान् है और रवि कहा गया है । विसर्ग शक्ति निशाकर है स्वरों में जो मध्य में स्थित है वह चतुष्क नपुंसक होता है ।६। ह्रस्व पिङ्गला में स्थित होते हैं-दूसरे इड़ा में सङ्गत हैं-मध्य में रहने वाले सुषुम्णा में जानने चाहिये जो चार नपुंसक हैं ।७। स्वरों के बिना अन्य वर्णों की अभिव्यक्ति शीघ्र नहीं हुआ करती है । इस कारण से मनीषी गण वर्णों को शिव शक्ति से परिपूर्ण कहा करते है ।८। क्योंकि पञ्च- भूतोंके कारण से मातृ का समुद्भूत हुई है । इससे पाँच-पाँच के विभाग से वर्ण भूतात्मक होते हैं ।६। वायु, अग्नि, भू, जल और आकाश क्रम से पचास लिपियाँ हैं । पाँच ह्रस्व है और पाँच दीर्घ है-जिनके अन्त में विन्दु है वे सन्धि सम्भव होते हैं । 'कादि ष-क्ष-ल-स' और 'ह' अन्त वाले पचास कहे गये हैं । ये सोम-सूर्य और अग्नि के भेद से मातृका वर्ण से सम्भव होने वाले हैं ।१०-११। अष्टत्रिंशत्कलास्तन्मण्डहेव व्यवस्थिताः । अमृता मानदा पूषा तुष्टिः पुष्टीरतिवृतिः ॥१२ शशिनी चन्द्रिका कान्तिर्ज्योत्स्ना श्रीः प्रीतिरङ्गदा । पूर्णा पूर्णामृता कामदायिन्यः स्वरजाः कलाः ॥१३ तपिनी तापनी धू म्रा मरीचिर्ज्वलिनी रुचिः । सुषुम्णा भोगदा विश्वा बोधिनी धारिणी क्षमा ॥१४ कभाद्या वसुदाः सौयष्ठडान्ता द्वादशेरिताः । धू म्रार्चिरुष्मा ज्वलिनी ज्वालिनी विस्फुलिङ्गिकी ॥१५ उन-उनके मण्डली में अड़तीस कलाएं व्यवस्थित हैं । अमृता, मानदा, पूषा, तुष्टि, पुष्टि, रति, शशिनी, चन्द्रिका, कान्तिज्योत्स्ना, श्री, प्रीति, अङ्गदा, पूर्णा, पूर्णामृत, ये स्वरों मे सात कलायें काम दायिनी हैं ।१२-१३। तपनी, तापना, धूम्रा, मरीचि, ज्वालिनी, रुचि, सुषुम्णा, भोगदा, विश्वा, बोधिनी, धारिणी, क्षमा, कभाद्या, वसुदा, सौर्यष्ठडान्त द्वादश कही गयी है। धूम्रार्चि, ऊष्मा, ज्वालिनी, विस्फु- लिङ्गिनी ।१४-१५।

३० [ द्वितीय पटल सुश्रीः सुरूपा कपिला हव्यकव्यवहा अपि (इमाः) । यादीनां दशवर्णानां कला धर्म प्रदा इमाः (स्मृताः) ॥१६ अभयेष्टकरा ध्येयाः श्वेतपीतारुणाः क्रमात् । तारस्य पञ्चभेदेभ्यः पञ्चाद्वर्णगाः कलाः ॥१७ सृष्टिर्वृ (ऋ) द्धिः स्मृतिर्मेधा कान्तिर्लक्ष्मी धृतिः स्थिरा । स्थितिः सिद्धिरिति प्रोक्ताः कचवर्गकला क्रमात् ॥१८ अकारादु ब्रह्मणोत्पन्नास्तप्तचासीकरप्रभाः । एताः कर धृताक्षस्रक्पङ्कजद्वयकुण्डिकाः ॥१६ जरा च पालनी शान्तिरीश्वरी रतिकामुके । वरदा ह्लादिनी प्रीतिर्दीर्घाः स्पुष्टटवर्गगाः ॥२० सुश्री, स्वरूपा, कपिला, हव्यकव्यवहा और 'यादि' दश वर्णों की ये कलायें धर्म प्रद हैं । १६। क्रम से श्वेत-पीत और अरुण अभय तथा अभीष्ट की करने वाली ध्यान के करने के योग्य है । तार (प्रणव) के प्राप्त भेदों से पचास वर्णों में रहने वाली कलायें । १७। सृष्टि, वृद्धि, स्मृति, मेधा, कान्ति, लक्ष्मी, धृति, स्थिरा, स्थिति, सिद्ध ये क्रम से क च वर्णों की कलाये हैं । १८। ये अकार से ब्रह्मा के द्वारा उत्पन्न, तप्त सुवर्ण के समान प्रभा वाली हैं। ये करों में अक्ष माला, दो कमल और कुण्डिकाको धारण करने वाली हैं । १६। जरा, पालिनी, शान्ति, ईश्वरी, रति, कामुका, वरदा, ह्लादिनी, प्रीति, दीर्घा ये वृत्त वर्गों में रहने वाली हैं ।२०। उकरा विष्णनोत्पन्नास्तमालदलसन्निभाः । अभीति शंख (वर) चक्रेष्टवाहवः परिकीर्त्तिताः ।२१ तीक्ष्णा रौद्रा भया निद्रा तन्द्री क्षुत् क्रोधिनी क्रिया । उत्कारी मृत्युरेताः स्युः कथिताः पयवर्गगाः ।२२ रुद्रेण मारुतादुत्पन्नाः शरच्चन्द्रनिभप्रभाः । उद्वन्त्योऽभय शूलं कपालं बाहुभिर्वरम् ॥२३

श्रीशारदा तिलक ] ३१ ईश्वरेणोदिता बिन्दोः पीता श्वेताऽरुणाऽसिता । अनन्ता च पवर्णस्था जपाकुसुमसान्निभाः ॥२४ अभयं हरिणं टङ्कं दधाना बाहुभिर्वरम् । निवृत्तिः यप्रतिष्ठा स्याद्विद्याशान्तिरनन्तम् ॥२५ उकार भगवान् विष्णु के द्वारा समुत्पन्न है और ये तमाल दल के सदृश हैं । इनके करकमलों में अभयदान शंख, चक्र, वरदान कीर्तित किये गये हैं ।२१। तीक्ष्णा, रौद्रा, भया, निद्रा, क्षुत्, क्रोधिनी, क्रिया, उत्कारी, मृत्यु, ये पय वर्गों में से स्थित कही गयी हैं !२२। ये रुद्रदेव के द्वारा मार्ग से समुत्पन्न हैं और शरत्काल के चन्द्र के समान प्रभा से युक्त है । ये अपनी बाहुओं के द्वारा अभयदान शूल, कपाल और वरदान को उद्वहन करने वाली हैं ।२३। ईश्वर के द्वारा उदित बिन्दु से पीत, श्वेत, करुण और असित और अनन्त है जो पवर्ण में स्थित होती है तथा जपा के पुष्प न सदृश है ।२४। ये अपनी बाहुओं से अभय, हरिण टंक और वरदान को धारण करने वाली हैं । ये निवृत्ति, सप्रतिष्ठा, विद्या और शान्ति हैं ।२५। इन्दिरा दीपका चैव रेचिका मोचिका परा । सूक्ष्मा सूक्ष्मामृता ज्ञानामृता चाप्यायिनी तथा ॥२६ व्यापिनी व्योमरूपा स्युरनन्ताः स्वरसंयुताः सदाशिवेन सहिता नादादेताः सितत्विषः ॥२७ अक्षस्रक् पुस्तकगु णंकपालाढ्यकराम्बुजाः । न्यासे तु योजयेदादौ षोडशस्वरजाःकलाः । २८ इति पञ्चाशदाख्याताः कलाः सर्वसमृद्धिदाः । श्रीकण्ठानन्तसूक्ष्माश्च त्रिमूर्त्तिरमटेश्वरः ॥२६ अधींशोभारभूतिश्चातिथीशः स्थाणुको हरः । झिष्टीशो भौतिकः सद्योजातश्चानुग्रहेश्वरः ॥३० अक्रूरश्च महासेनः षोडशस्वरमूर्त्तयः । पश्चात् क्रोधोश-चण्डीश-पञ्चान्तक-शिवोत्तमाः ॥३१

३२ [ द्वितीय पटल अप्यैकरुद्रकूर्मै कनेत्राङ्कचतुराननाः। अजेयः सर्वसोमेशौतथालांघलितारुका ॥३२ अर्द्धनारीश्वरश्चोमाकान्तश्चाषाढिदण्डिनौ । स्युरद्रिर्मीनमेषाख्यौलोहितश्च शिखी तथा ॥३३ छगलण्डद्विरण्डेशौ महाकालसवालिगौ । भुजङ्गे शापनाकींशखड्गीशाख्या वकस्तथा ॥३४ श्वेतभृग्वीशनक्लिशिवाःसर्व्वर्त्त कस्ततः । एते रुद्राः स्मृता रक्ता धृतशूलकपालकाः ॥३५ इन्द्रिका, दीपका, रेचिका, सूक्ष्मा, सूक्ष्मा, सूक्ष्मामृता, ज्ञानामृता, आप्यायिनी, व्यापिनी, व्यामरूपा, स्वरों से समन्वित अनन्त है। सदाशिव के सहित ये सित कान्ति वाली नाद से हुई है।२६-२७। इनके करकमल अक्षमाला-पुस्तक-गुण और कपाल से युक्त हैं। न्यास करने के समय 'म' आदि में सोलह स्वरों से समुत्पन्न कलाओं को योजित करना चाहिए।२८। ये इस प्रकार से समस्त समृद्धियों के देने वाली पचास कलाये कही गयी हैं। स्वरों की सोलह मूर्त्तियाँ होती हैं-श्रीकण्ठ, अनन्त, सूक्ष्म, त्रिमूर्ति, अमरेश्वर, अर्धीश, भारभूति, अर्धीश, भारभूति, अतिथीश, स्थाणुक, हर, झिष्टीश, भौतिक, सद्योजात, अनुग्रहेश्वर, अक्रूर, महासन, ये ही सोलह मूर्त्तियाँ हैं। पीछे क्रोधीश, चण्डोश, पञ्चान्तक, शिवोत्तम, एक रुद्र, कूर्म, एक नेत्र, चतुरानन, अजेय, शर्व, सोमेश, लाङ्घालिता, रुक, अध नारीश्वर, उमाकान्त, आषाढ़ी, दण्डी, अद्रि, मीन, मेष, लोहित, शिखी, छगलण्ड, द्विरण्डेश, महाकाल, वाणी, भुजङ्गेश, पिनाकी, खङ्गीश, वक, श्वेतभृगु, ईश, नरति, शित्र, संवर्तक, ये रुद्र कहे गये हैं जिनका रक्त वर्ण है। और ये त्रिशूल और कपाल को धारण किये हुए हैं।२६-३५। पूर्णोदरीस्याद्धिरजा शातली तदनन्तरम् । लोलाक्षी वर्त्तुलाक्षी च दीर्घघोणा समीरिताः ।३६

द्वितीय पटल ] [ ३३ सुदीर्घमुखिगोमुख्यौ दीर्घजिह्वा तथैव च । कुण्डोदर्य्यूर्ध्वकशी च तथा विकृतमुख्यपि ।३७ ज्वालामुखी तथा श्रेया पश्चांदुल्कामुखी तथा । सुश्रोमुखी च विद्या तु ख्याताः स्यु स्वरशक्तयः ३८ महाकालोसरस्वत्यौ सर्वसिद्धिमन्विता । गौरी, त्रैलोक्यविद्या च मन्त्रशक्तिस्ततः परम् ।३६ आत्मशक्तिर्भूतमाता तथा लम्बो (म्भो) दरी मता । द्राविणी नागरी भूयः खेचरी चापि मञ्जरी ।४० पूर्णोदरी, विरजा, शाल्मली, लोलाक्षी, वर्तुलाक्षी, दीर्घघोणा, सदीर्घमुखी-गोमुखी,दीर्घ-जिह्वा-कुण्डोदरी-ऊर्ध्वकेशी-विकृत मुखो-ज्व ला मुखी, उल्कामुखी, सुश्री मुखी, विद्या, ये स्वरों की शक्तियों प्रसिद्ध है ।३६-३८। महाकाली, सरस्वती, सर्व सिद्धि गौरी, त्रैलोक्य विद्या, मन्त्र,शक्ति, आत्म, शक्ति,भूतमातां, लम्बोदरी, द्राविणी, नागरी, खेचरी, मंजरी, ।३६-४०। रूपिणी वारिणी पश्चात् काकोदर्यपि पूतना । स्याद्भद्रकाली योगिन्यो शंखिनी गर्जिनी तथा ।४१ कालरात्रिश्चकुब्जिन्या कपर्दिन्यपि वज्रया । जया च सुमुखेश्वर्यौ रेवती माधवी तथा ।४२ वारूणी वायवी प्रोक्ता पश्चाद्रक्षोविदारिणी । ततश्चसहजा लक्ष्मा व्यापिनी माययाऽन्विता ।४३ एता रुद्राङ्गपीठस्थाः सिन्दरारूणविग्रहाः । रक्तोत्पलकपालाभ्यामलं- कृतकराम्बुजाः ।४४ केशवनारायणमाधवगोविन्दविष्णवः । मधुसूदनसंज्ञोऽप्यः स्यात् त्रिविक्रमवामनौ ।४५ रूपिणी, वारिणी, काकोदरी, पूतना, भद्रकाली, योगिनी, शंखिनी,गर्जनी, कालरात्रि, कुब्जिनी, कपर्दिनी, वज्र,जया, सुमुखेश्वरी, रेवती, माधवी, वारूणी, दायवी,रक्षो विदारिणीसहजा,लक्ष्मा, व्यापिनी,

३४ ] [ श्रीशारदा तिलक माया, ये रुद्र देव के पीठ और अंक स्थित है। इनका शरीर सिन्दूर के समान अरुण है। इसके करकमलों में रक्तकमल और कपाल का परम शोभा रहती है ।४१-४४। केशव, नारायण, माधव, गोविन्द, विष्णु, मधुसूदन, त्रिविक्रम, वामन ।४५। श्रीधरश्च हृषीकेशः पद्मनाभस्ततः परम् । दामोदरोवासुदेवः सङ्कर्षण इतीरिताः ।४६ प्रद्युम्नश्चानिरुद्धश्च स्वराणां मूर्त्तयस्त्विमाः । पश्चाच्चक्री गदी शार्ङ्गी खड्गी शंखी हली पुनः ।४७ मुसली शूलिसंज्ञोऽन्यः पाशी स्यादांकुशी पुनः । मुकुन्दो नन्दजो नन्दी नरो नरकजिद्धरिः ।४८ कृष्णः सद्यः सात्वतः (सात्विकः स्यात् शौरिः शूरो जनार्दनः भूधरो विश्वमूर्त्तिश्च वैकुण्ठः पुरुषोत्तमः ।४६ बली बलानुजो बालो वृषघ्नश्च वृषः पुनः । हिंसो (हंसो) वराहो विमलो नृसिंहो मूर्त्तयो हलाम् ।५० श्रीधर, हृषीकेश, पद्मनाभ, दामोदर, वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, ये स्वरों की मूर्तियाँ होती है। चक्री, गदी अर्थात् गदाधारी, शार्ङ्गी, खङ्गी, शंखी, हली अर्थात् हल के धारण करने वाले, मुशली, शूली, पाशी, अंकुशी, मुकुन्द, नन्दल, नन्दी, नर, नरक- जित्, हरि, कृष्ण, सावन्त, शौरि, शूर, जनार्दन, भूधर, विश्व, मूर्ति, बैकुण्ठ, पुरषोत्तम-वली, बलानुज,वाल, वृषघ्न, वृष, हंस, वराह, विमल और नृसिंह ये हलों अर्थात् व्यंजनों की मूर्तियाँ होती है ।४६-५०। केशवाद्या इमे श्यामाश्चक्रशंखलसत्कराः । कीर्तिः कान्तिस्तुष्टिपुष्टी धृतिःक्षान्तिः क्रियाः दया ।५१ मेधा सहर्पा श्रद्धा स्याल्लजा लक्ष्मीः सरस्वती। प्रीती रतिरिमाः प्रोक्ताः क्रमेण स्वरशक्तयः ।५२

द्वितीय पटल ] [ ३५ जया दुर्गा प्रभा सत्या चण्डा वाणी विलासि (शालि) नी । विजया विरजा विश्वा विनदा सुनदा स्मृतिः । ५३ ऋद्धिः समृद्धिः शुद्धिः स्यात् भक्तिबुद्धिः स्मृतिः (१) क्षमा । रमोमा क्लेदिनी क्लिन्ना वसुधा वसुदाऽपरा । ५४ परा परायणी सूक्ष्मा सन्ध्या प्रज्ञा प्रभा निशा । अमोघा विद्युता चेति कीर्त्याद्याः सर्वकामदाः । ५५ केशव से आदि लेकर ये श्याम शंख - चक्र से शोभित करकमलों वाले हैं । कीर्ति कान्ति, तुष्टि, पुष्टि, धृति, श्रान्ति, क्रिया, दया, मेधा सहर्षा, श्रद्धा, लज्जा, लक्ष्मी, सरस्वती, प्रीति, रति, वे क्रम से स्वरों की शक्तियाँ बतलाई गई हैं । ५१-५२। जया] दुर्गा, प्रभा, सत्या, चण्डा, वाणी, विलासिनी, विजया, विरजा, विश्वा, विनदा, सुनदा, स्मृति, ऋद्धि समृद्धि, शुद्धि, भक्ति, वृद्धि, स्मृति, क्षमा, रमा, उमा, क्लेदिनी, क्लिन्ना, वसुधा. वसुदा, अपरा, परा, परायणी, सूक्ष्मा, सन्ध्या, प्रज्ञा, प्रभा, निशा, अमोघा, विद्युता और कीर्ति आदि सब कामनाओंके प्रदान कर ने वाली हैं । ५३-५५। एताः प्रियतमाङ्केषु निष्षणाः सस्मिताननाः । विद्युद्दामसमानाङ्ग्यः पङ्कजाऽभयवाहवाः । ५६ मातृकाकावर्णभेदेभ्यः सर्वे मन्त्राः प्रजज्ञिरे । मन्त्रविद्याविभागेन त्रिविधा मन्त्रजातयः । ५७ मन्त्राः पुंदेवता ज्ञेया विद्याः स्त्रीदेवताः स्मृताः । पुंस्त्रीनपुंसकात्मानो मन्त्राः सर्वे समीरिताः । ५८ पुंमन्त्रा हुफडन्ताः स्युर्द्विठान्ताश्च स्त्रियो मताः । नपुंसका मनोनन्ताः स्युरित्युक्ता मनवस्त्रिधा । ५६ शस्तास्ते त्रिविधा मन्त्रा वश्यशान्त्यभिचारके । अग्नीषोमात्मका पन्त्रा विज्ञेयाः क्रूरसौम्ययो । ६० ये सब अपने प्रियतम की गोद में विराजमान हैं और इनका मुख

३६ ] [ श्री शारदा तिलक मन्दस्मित से समन्वित है। इनके अङ्ग विद्युल्लता के समान हैं और ये पंकज तथा अभय दान को करकमलों के द्वारा वहन करने वाली है। ।५६। मातृका वर्णों के भेदों से ही सब मन्त्र समुत्पन्न हुए हैं। मन्त्र विद्या के द्वारा मन्त्रों की जातियां तीन प्रकार की है ।५७। मन्त्रों के देवता पुमान् होते हैं और विद्याएं स्त्रीदेवता वाली कहींगयी हैं। सभी मन्त्र पुमान् - नपुंसक और स्त्री संज्ञा वाले कहे गये हैं ।५८। जिन मन्त्रों के अन्त में हुँफट् होता है वे मन्त्र पुमान् कहे गये हैं और जिन के अन्त में दो ठकार अर्थात् ठ-ठ होने पर वे मन्त्र स्त्री संज्ञा वाले माने गये हैं। जो मन्त्र नपुंसक होते हैं उसके अन्त में नमः—यह होता है। इस रीति से मन्त्र तीन प्रकार वाले होते हैं ।५६। वे तोनों प्रकार के मन्त्र वश्य कर्म-शान्ति कर्म और अभिचार में प्रशस्त होते हैं। मन्त्र अग्नीषोम के स्वरूप वाले जानने चाहिए, क्रूर और सौम्य कर्मों में ।६०। कर्मणोर्वहिनतारान्त्यवियत्प्रायाः समोरिताः । आग्नेया मनवः सौम्या भूयिष्टेन्द्वमृताक्षराः ।६१ आग्नेयाः संप्रबुध्यन्ते प्राणे चरति दक्षिणे । भागेऽन्यस्मिन् स्थिते प्राणे सौम्या बोधं प्रयान्ति च ।६२ नाडीद्वय गते प्राणे सर्वे बोधं प्रयान्ति च । प्रयच्छन्ति फलं सर्वे प्रवृद्धा मन्त्रिणां सदा ।६३ छिन्नादिदृष्टा ये (१) मन्त्राः पालयन्ति न साधकम् । छिन्नो रुद्धः शक्तिहीनः पराङ् मुख उदीरितः ।६४ बधिरो नेत्रहीनश्च कीलित स्तम्भित स्तथा । दग्धस्त्रस्तश्च भीतश्च मलिनश्च तिरस्कृतः ।६५ जिनके अन्त में वहिनतार और वियत् प्राया होते हैं वे ही बतलाये गये हैं अर्थात् क्रूर और सौम्यकर्मोंमें उनका ही प्रयोग करना चाहिए। आग्नेय मन्त्र सौम्य होते हैं जिसमें विशेष करके अधिकता में इन्दु-अमृत अक्षर होते हैं ।६१। दक्षिण में प्राण के चरण करने पर आग्नेय मन्त्र

द्वितीय पटल ] [ ३७ प्रबुद्ध हुआ करते हैं । दूसरे भाग में प्राण के स्थित रहनेपर सौम्य मन्त्र बोध को प्राप्त हुआ करते हैं ।६२। दोनों नाडियों से प्राण के गत हो जाने पर सभी मन्त्र बोध को प्राप्त होते हैं । मन्त्र धारियों के जब मन्त्र प्रबुद्ध होते हैं तभी सब फल दिया करते हैं ।६३। छिन्नादि दोषों से युक्त हुए मन्त्र साधक का पालन नहीं किया करते । उनके नाम छिन्न, शक्ति से हीन और पराङ्मुख कहे गये हैं ।६४। बधिर, नेत्रहीन, कीलित, स्तम्भित दग्ध, त्रस्त, भीत मलिन, तिरस्कृत ।६५। भेदितश्च सुषूप्तश्च मन्दोन्मतश्च मूर्च्छितः । हतवीर्यश्चहीनश्चप्रध्वस्तो बालकः पुनः ।६६ कमारस्तु युवा प्रोढो वृद्धो निस्त्रंशकस्तथा । निर्बीजः सिद्धहीनश्चय मन्दः कूटस्यथा पुनः ।६७ निरंशः सत्त्वहीनश्चकेकरो बीजहीनकः । धूमितालिङ्गितौ स्यातां मोहितश्चक्षुधार्तकः ।६८ अतिदृप्तोऽङ्गहोमश्च(नःस्याः) अतिक्रुद्धःसमीरितः । अतिक्रूरश्चसब्रीडः शान्तमानस एव च ।६६ स्थानभ्रष्टत विकलः सोऽतिवृद्धः प्रकीर्त्तितः निःस्नेहः पीडितश्चापि वक्ष्यत्येषां च लक्षणम् ।७० भेदित-सुषुप्त-मन्दोन्मत्त-मूर्च्छित-हतवीर्य-और हीन तथा बालक ये प्रध्वस्त हैं ।६६। कुमार, युवा-प्रौढ़-वृद्ध तथा निस्त्रिंशक, निर्बीज सिद्धिहीन, मन्द, कूट, निरंश, सत्वहीन, केकर, बीज, हीनक, भूमित अलिङ्गित, मोहित, क्षुधार्तक, आदिट्प्त, अति क्रुद्ध कहे गये हैं । क्रीड़ा सहित, शान्त मानस-जाति क्रूर है । स्थान भ्रष्ट विफल होता वह अति वृद्ध कहा गया है, जो नि.सन्देह और पीड़ित होता है - इनका लक्षण बताया जायेगा ।६७-७०। सञ्जोर्यस्यादिमध्यान्तेष्वानिलं बोजमुच्यते । संयुक्तं वा वियुक्तं वा स्वराक्रान्तं त्रिधा पुनः ।७१

३८ ] [ श्रीशारदा तिलक चतुर्द्धा पञ्चधा वा स्युः (ऽथ) स मन्त्रश्छिन्नसंज्ञकः । आदिमध्यावसानेषु भूबीजद्वन्द्व लाञ्छितः ।७२ रुद्धमन्त्रः स विज्ञेयो भुक्तिमुक्तिविवर्जितः । मायात्रितत्वश्रीबीजरावहीनस्तु योमनुः ।७३ शक्तिहीनः स कथितो, यस्य मध्ये न विद्यते । कामबीजं मुखे माया शिरस्यङ्कुशमेव वा ।७४ असौ पराङ् मुखः प्रोक्तो, हकारो विन्दुसंयुतः । आद्यन्तमध्येष्विन्दुर्वाद्वौ नाभावेद्वधिरः स्मृतः ।७५ जिस मन्त्र के अन्त में-मध्य में और आदि में अनिल बीज कहा जाता है, संयुक्त हो अथवा वियुक्त हो तीन प्रकार से स्वर क्रान्त होवे अथवा चार या पाँच प्रकार से होवे, वह छिन्न संज्ञा वाला हुआ करता है। जो आदि मध्य और अवसान के भूबीज के इन्द्र से लाञ्छित होता है वह मन्त्ररुद्ध समझना चाहिए। जो भुक्ति और मुक्तिसे रहित हुआ करता है। जो माया-त्रितत्व-श्रीबीज से अवहीन मन्त्र होता है वह शक्तिहीन कहा गया है। जिसके मध्य में काम बीज नहीं होता है- मुख में माया ओर शिर में अंकुश नहीं है वह मन्त्र पराङ्मुख कहा गया है। बिन्दु से संयुक्त हकार अथवा आदि-अन्त और मध्य में इन्दु नहीं होता है, वह बधिर कहा गया है ।७१-७५। पञ्चवर्णोमनुर्यः स्याद्रेफार्केन्दुविवर्जितः । नेत्रहीनः स विज्ञेयोदुःखशोकभयप्रदः ।७६ आदिसध्यावसानेषु हंसः प्रासादवाग्भवौ । हकारो बिन्दुभाञ्जीवो रावश्चापि चतुष्कलम् ।७७ माया नमामि च पदं नास्ति यस्मिन्स कीलितः । एक मध्ये द्वयं मूर्द्धनि यस्मिन्नस्त्रपुरन्दरौ ।७८ न विद्यते, स मन्त्रः स्यात्स्तम्भितः सिद्धिरोधकः । वह्निवायु॑समामुक्तो यस्य मन्त्रस्य मूर्द्धनि ।७९

द्वितीय पटल ] [ ३६ सप्तधा दृश्यते तं तु दग्धं मन्येत मन्त्रवित् । अस्त्रं द्वाभ्यां त्रिभिः षड्भिरष्टाभिर्दृश्यतेऽक्षरैः ।८० जो मन्त्र पाँच वर्णों वाला होवे और रेफ-इन्दु और अर्क से रहित होवे उसे नेत्रहीन समझना चाहिए। वह दुःख, शोक और भय के देने वाला हुआ करता है ।७६। आदि-मध्य और अवसान में चतुष्कल राव भी हो तथा माया और नमामि -यह पद जिसमें नहीं है वह कीलित कहा गया है । मध्य में एक-दो मूर्धा में जिसमें अस्त्र और पुरन्दर नहीं होते हैं वह मन्त्र स्तम्भित और सिद्धि का रोधक होता है । जिस मन्त्र के मूर्धा में वहिन वायु समायुक्त सात प्रकार से दिखलाई दिया करता है, मन्त्रों के ज्ञाता उस मन्त्र को दग्ध मानते हैं। जो दो से अस्त्र और तीन वकारों से ऐसे आठ से अक्षरों युक्त होता है ।७७-८०। त्रस्तः सोऽभिहितो यश्य मुखे न प्रणवः स्थितः । शिवो वा शक्तिरथवा भीताख्यः स प्रकीर्तितः ।८१ आदिमध्यावसानेषु भवेन्तार्र्णचतुष्टयम् । यस्य, मन्त्रः स मलिनो मन्त्रवित्त विवर्जयेत् ।८२ गरु मध्ये दकारोऽथ (वा) क्रोधो वा मूर्द्धनि द्विधाः । अस्त्रं तिष्ठति मन्त्रः स तिरस्कृत उदाहृतः ।८३ भ्योद्वयं हृदये शीर्षे वषठ् वौषट् च मध्यतः । यस्यासौ भेदितो मन्त्रस्त्याज्यः सिद्धिषु सूरिभिः ।८४ त्रिवर्णे हंसहीनो यः सुषुप्तः स उदाहृतः । मन्त्रो वाऽप्यथवाविद्या सप्ताधिकसताक्षरः ।८५ जिसके मुख में प्रणव स्थित नहीं होता है वह मन्त्र त्रस्त समझना चाहिए । शिव अथवा शक्ति न हो वह मन्त्र भीत कहा गया है ।८१। जिसके आदि—मध्य और अवसान में मार्णव चतुष्टय हो अर्थात् चार मवर्ण होवे वह मन्त्र मलिन होता है । मन्त्रों का ज्ञाता उसको वर्जित कर देवे ।८२। जिसके मध्य में हुँकार हो अथवा मूर्धा में क्रोध होवे और दो प्रकार से अस्त्र स्थित होता है वह मन्त्र तिरस्कृत कहागया है ।

४० ] [ श्री शारदा तिलक ।८३। भ्योद्वय हृदय में-शीर्ष में वषट् और मध्य में वौषट् होवे वह मन्त्र भेदित होता है। सूरियों के द्वारा वह मन्त्र सिद्धियों में सर्वदा त्याग करने के योग्य होता है ।८४। जो तीन वर्णों से युक्त और हंस से हीन होता है वह मन्त्र सुषुप्त कहा गया है। मन्त्र हो अथवा विद्या हो सत्रह अक्षरों वाला हो ।८५। फट्कारञ्चकादिर्यो मदोन्मत्तः उदीरि (उदाहृ) तः । तद्वदस्त्वं स्थितं मध्ये यस्य, मन्त्रः स मूर्च्छितः ।८६ विरामस्थानगं यस्य हतवीर्य्यः स कथ्यते । आदौ मध्ये तथा मूर्द्धिन चतुरस्त्रयतो मनुः ।८७ ज्ञातव्यो हीन इत्येषु यः स्यादष्टादशाक्षरः । एकोनविंशत्वर्णो वा यो मनुस्तारसंयुतः ।८८ हल्लेखाङकुशबीजाद्य स्तत्प्रध्वस्तं प्रचक्षते । सप्तवर्णो मनुर्बालः कुमारोऽष्टाक्षरस्तु यः (स्मृतः) ।८६ षोडशार्णो युवा, प्रोक्तश्च वारिंशल्लिपर्मनुः । त्रिशवर्णश्चतृष्पष्टिवर्णी मन्त्रः शताक्षरः ।६० जिसके आदि में फट्कार पञ्चक होवे वह मन्त्र मन्दोमत्त कहा गया है। उसी भाँति जिसके मध्य में अस्त स्थित होवे वह मन्त्र मूर्च्छित कहा गया है ।८६। जिसके विराम के स्थानमें गत हो वह मन्त्र हतवीर्य्यक कहा जाता है। आदि में-मध्य में और मूर्धा में जो चतुः- अस्त्रों से युक्त होवे वह मन्त्र हीन जानना चाहिए। जो अठारह अक्षरों वाला होता है-अथवा जो मन्त्र उन्नीस अक्षरों वाला होवे और तार से अर्थात् प्रणव से समन्वित होवे, जिसके आदि में रहने वाले हृल्लेखा- अंकुश और बीज होवे उस मन्त्र को प्रध्वस्त कहा जाता है। सात वर्णों वाला मन्त्र बाल होता है। आठ अक्षरों वाला मन्त्र कुमार कहा गया है। सोलह वर्णों वाला युवा होता है तथा अड़तालीस का मन्त्र प्रौढ़ दुरता है। तीस वर्णों वाला चौसठ वर्णों वाला शताक्षर मन्त्र- वृद्ध होता है ।८७-६०।

द्वितीय पटल ] [ ४१ चतुः शताक्षरश्चापि वृद्ध इत्यभिधीयते । नवाक्षरो ध्रुवयुतो मनुर्निस्त्रिंश ईरितः । ६१ यस्यावसाने हृदयशिरोमन्त्रौ च मध्यतः । शिखा वर्म च न स्यातां वौषट् फट्कार एव च । ६२ शिवशक्त्यर्णहीनो वा स निर्वोज इति स्मृतः । एष स्थानेषु फट्कारः षोढा यस्मिन्प्रदृश्यते । ६३ स मन्त्रः सिद्धिहीनः स्यात्, मन्दः षड्वत्यक्षरो मनुः । कूट एकाक्षरो मन्त्रः स एवोक्तो निरंशुकः .६४ द्विवर्णः सत्वहीनः स्यात्, चतुर्वर्णस्तु केकरः । षडक्षरो बीजहीन, स्त्वर्द्धसप्ताक्षरो मनुः । ६५ और एक सौ चार अक्षरों वाला भी मन्त्र वृद्ध कहा गया है । नौ अक्षरों वाला ध्रुवसे समन्वित मन्त्र निस्रिंश कहा गया है । ६१। जिसके अवसान में हृदय और शिरोमन्त्र होवे-मध्यमें शिखा होवे और वर्म होवे और वौषट् तथा भट्कार होवे और शिव भक्ति से हीन होवे वह् मन्त्र निर्बीज कहा गया है । जिन स्थानों में छै बार फट्कार दिखलाई दिया करता है वह मन्त्र सिद्धिहीन होता है और षडवत्यक्षर मन्त्र मन्द होता है । एकाक्षर मन्त्र कूट होता है और वह ही निरंशुक कहा गया है । । ६२-६४। दो वर्णों वाला मन्त्र सत्व से हीन हुआ करता है और चार वर्णों वाला मन्त्र केकर होता है । छै अक्षरों का मन्त्र बीज हीन होता है । उसी भाँति अर्ध सात अक्षरों वाला है । ६५। सार्द्धद्वादशवर्णो वा धूमितः स तु निन्दितः । सार्द्धवीसत्रयक्तद्वदेकविंशतिवर्णकः । ६६ विंशत्यर्ण स्त्रिंशवर्णो यः स्यादालिङ्गितस्तु सः । द्वात्रिंशदक्षरो मन्त्रो मोहितः परकीर्त्तितः । ६७ चतुर्विंशतिवर्णो यः सप्तविंशतिवर्णकः । क्षुधार्त्तः स तु विज्ञेयश्चतुर्विंशतिवर्णकः । ६८

४२ ] [ श्रीशारदा तिलक एकादशाक्षरो वाऽपि पञ्चविंशतिवर्णकः । त्रयोविंशतिवर्णो वा मन्त्रो दृप्त उदाहृतः ।६६ षड्विंशत्यक्षरो मन्त्रः षट्त्रिंशद्वर्णक स्तथा । त्रिंशदेकोनवर्णो याऽप्यङ्गहीनोऽभिधीयते । अष्टाविंशत्यक्षरो वा एक त्रिंशदथापि वा ।१०० अथवा सार्ध द्वादश वर्णो वाला मन्त्र धूमित हुआ करता है वह निन्दित होता है । अर्ध बीज त्रयस्के सहित और उसी भाँति इक्कीस वर्णों वाला बीज वर्णों का तथा तीस वर्णों का जो मन्त्र होता हैं वह मन्त्र आलिङ्गित होता है । बाईस अक्षरों वाला मन्त्र मोहित कहा गया है । जो चौबीस वर्णों का ही और सत्ताईश वर्णों का मन्त्र ही उसे क्षुधार्त समझना चाहिए । चौबीस वर्णों वाला-ग्यारह अक्षरों वाला अथवा पच्चीस वर्णों का या तेईस वर्णों का मन्त्र होवे वह मन्त्र दृप्त कहा गया है ।६६-६६। छब्बीस अक्षरों वाला मन्त्र तथा छत्तीस वर्णों वाला मन्त्र अथवा उनतीस अक्षरों वाला मन्त्र अङ्गहीन कहा जाता है । अट्ठाईस अक्षरों का अथवा इकतीस वर्णों का मन्त्र होवे ।१००। अतिक्रुुद्धः स कथितो निन्दितः सर्वकर्मसु । त्रिंशदक्षरो मन्त्रा स्त्रयस्त्रिंशदथापि ।१०१ अतिक्रूरः स कथितो निन्दितः सर्वकर्मसु । चत्वारिंशन्मारभ्य त्रिषष्टियर्विदापयेत् । १०२ तावत्संख्यां निगदिता मन्त्राः सब्रीडसज्ञकाः । पञ्चषष्ठ्यक्षरा ये स्युर्मन्त्रांस्ते शान्तमानसाः ।१०३ एकोनशतपर्यन्त पञ्चषष्ठ्यक्षरादितः । ये मन्त्रास्ते निगदिता स्थानभ्रष्टाह्वया बुधैः ।१०४ त्रयोदशाक्षरा ये स्युर्मन्त्राः पञ्चदशाक्षराः । विकलास्तेऽभिधीयन्ते शतं सार्द्धं शतं तु वा (तथा) ।१०५ ऐसा मन्त्र अति क्रुद्र कहा गया है जो सभी कर्मों में निन्दित माना गया है । तीस वर्णों वाला तथा तैंतीस वर्णों का मंत्र अति क्रुद्र कहा

द्वितीय पटल ] [ ४३ गया है और यह सभी कर्मों में निन्दित माना गया है। चालीस से आरम्भ करके तिरेसठ वर्णों तक होवे तो इन संख्या वाले मंत्र सक्रीड़ संज्ञा वाले कहे गये हैं। जो मंत्र पैंसठ अक्षरों से संयुत होवे वे मंत्र शान्त मानस होते हैं। पैंसठ अक्षरों से लेकर एक कम सौ अक्षरों वाले जो मंत्र कहे गये हैं वे बुधों के द्वारा स्थान भ्रष्ट कहे गये हैं । जो मंत्र तेरह अक्षरों से युत है और पन्द्रह अक्षरों वाले हैं वे सब विकल कहे जाते हैं। शत (सौ) अथवा सार्धशत हों ।१०५-१०५। शतद्वयं द्विनवतिरेकहीनाथवापि सा । शतत्रयं वा यत्संख्या निः स्नेहास्ते समीरिताः ।१०६ चतुः शतान्यथारंभ्य यावद्वर्णसहस्रकम् । अतिवृद्धः संयोगेषु परित्याज्यः सदा बुधैः ।१०७ सहस्रावर्णाधिका मन्त्रा दण्डकाः पीडिताह्वयाः । द्विसहस्राक्षरा मन्त्राः खण्डशः शतधा कृताः ।१०८ ज्ञातव्या स्तोत्ररूपास्ते तन्त्र एते यथास्थिताः । तथाविधाश्च बोद्धव्या मन्त्रिभिः काम्य कर्मसु ।१०६ दोषानिमानविज्ञाय यो मन्त्रान् भजते जडः । सिद्धिर्न जायते तस्य कल्पकोटिशतैरपि ।११० दो-सौ-बानवें अथवा एक से हीन-अथवा तीन जो भी संख्या है, ऐसे मन्त्र निःस्नेह कहे गये हैं ।१०६। चार सौ से आरम्भ करके एक सहस्रवर्ण तक जो होते हैं वह संयोगों में अतिवृद्ध कहे गये हैं। बुधों को सदा ही उन्हें परित्याग कर देना चाहिए ।१०७। एक सहस्र वर्णों से भी अधिक वर्णों वाले मन्त्र दण्डक नाम से कहे गये है। यन्त्र पीड़ित नाम वाले होते हैं। दो सहस्र अक्षरों वाले मन्त्र खण्डशः सौ प्रकार से किये गये हैं। वे मन्त्र स्तोत्रों के ही रूप वाले समझने चाहिये । ये यथा स्थित हैं। उस भाँति वाले सब मन्त्र धारण करने वालों के द्वारा सभी कर्मों में समझ लेने चाहिए ।१०८-१०९। इन दोषों का ज्ञान प्राप्त

४४ ] [ श्रीशारदा तिलक न करके जो जड़ पुरुष दूषित मन्त्रों का सेवन किया करता है उसको करोड़ों कल्पों में भी सिद्धि नहीं होती है ।११०। इत्यादिदोषोदुष्टांस्तान्मन्त्रानात्मनि योजयेत् । शोधयेदूर्ध्वपवनोबद्धया योनिमुद्रया ।१११ मन्त्राणां दश संस्काराः कथ्यन्ते सिद्धिदायिन जननं जीवनं पश्चात्ताडनं बोधनं तथा । ११२ तथाभिषेको विमलीकरणाप्यायने पुनः । तर्पणं दीपनं गुप्तिर्दशै या मन्त्रसंस्क्रियाः ।११३ मन्त्राणां मातृकामध्यादुद्धारो जननं स्मृतम् । प्रणवान्तरितान्कृत्वा मन्त्रवर्णाञ्जपेत्सुधीः ।११४ एतज्जीवनमित्याहुर्मन्त्रविशारदाः । मन्त्रवर्णान् समालिख्य ताडयेच्चदनाम्भसा ।११५ इन उक्त दोषों से दूषित उन मन्त्रों को अपनी आत्मामें योजित करना चाहिए । बद्धयोनिमुद्रा के द्वारा ऊर्ध्व पवन द्वारा उनका शोधन करना चाहिए ।१११। मन्त्रों के दश संस्कार बतलाये गये हैं । जो सिद्धि के देने वाले होते है । उनके नाम बतलाते हैं-जनन, जीवन, ताड़न, बोधन, अभिषेक, विमली-करण, आप्यायन, तर्पण, दीपन और गुप्ति- ये दश मन्त्रों के संस्कार होते हैं ।११२-११३। मन्त्रों का मातृका के मध्य से उद्धार करना ही मन्त्रका जनन कहा गया है । प्रणवों को अन्त- रित करके सुधी पुरुष मन्त्र के वर्णों का जाप करे, इसी को वे जीवन संस्कार कहते हैं, जो मन्त्र-तन्त्र के विद्वान् होते हैं । मन्त्र के वर्णों को भली भाँति लिखकर चन्दन के जल के द्वारा ताड़न करना चाहिए, यही मन्त्र का ताड़न संस्कार होता है ।११४-११५। प्रत्येकं वायुना मन्त्री ताडनं तदुदाहृतम् । विलिख्य यन्त्रन्तं मन्त्री प्रसूनैः करवीरकै ।११६ तन्मन्त्राक्षरसंख्यातैर्हन्याच्चैतेन बोधनम् । स्वतन्त्रोक्तविधानेनमन्त्री मन्त्रार्णसंख्ययाः।११७

द्वितीय पटल ] [ ४५ अश्वत्थपल्लवैर्मन्त्रमभिषिञ्चेद्विशुद्धये । सञ्चिन्त्य मनसा मन्त्र ज्योतिर्मन्त्रेण निदहेत् ।११५ मन्त्रे मलत्रयं मन्त्री विमलीकरणं त्विदम् । तारं व्योमाग्निमनुयुक् दण्डी ज्योतिर्मनुमतः ।११६ कुशोदकेन जप्तेन प्रत्यर्णं (प्रत्येकं) प्रोक्षणं मनोः । तेन मन्त्रेण विधिवदेतदाप्यायनं मतम् ।१२० प्रत्येक को मन्त्रधारी ताड़न करे, ऐसा कहा गया है । मन्त्र को लिखकर मन्त्रधारी उसका करवीर के प्रसूतों से जो उस मन्त्र के अक्षरों की संख्या वाले होंवे उससे हनन करे उससे बोधन होता है । अपने तन्त्र में कथित विधान के द्वारा मन्त्रधारी पुरुष मन्त्रके वर्णों की संख्या से विशुद्धि के लिए अश्वत्थ के पत्तों के द्वारा अभिषिञ्जन करे, यही अभिषेक संस्कार होता है । मन के द्वारा मन्त्र का चिन्तन करके ज्योति मन्त्र के द्वारा निर्दग्ध करे जो कि मन्त्रमें तीन मल होते हैं-यही विमली करण मन्त्र का संस्कार होता है । व्योम अग्नि मन्त्रसे युक्त प्रणव और दण्डी, यही ज्योति मन्त्र कहा गया है । व्योम का अर्थ, हकार है । अग्नि का अर्थ रेफ है । मनुका तात्पर्य रो है । दण्डीका अर्थ अनुस्वार से युक्त होता है । अभिमन्त्रित किये हुए कुशोदक के द्वारा मन्त्र के प्रत्येक वर्ण का प्रोक्षण उस मन्त्र से विधि पूर्वक करे यही आप्यायन नामक संस्कार है ।११६-१२०। मन्त्रेण वारिणा मन्त्रे तर्पणं स्मृतम् । तारमा यारमायोगे मनोर्दीपनमुच्यते ।१२१ जप्यमानस्य मन्त्रस्य गोपनञ्च प्रकाशनम् । संस्कार दश संप्रोक्ताः सर्वमन्त्रेषु गोपिताः ।१२२ यान् कृत्वा संप्रदायेन मन्त्री वाञ्छितमश्नुते । स्वताराराशिकोष्ठानातनुकूलं भलंतमनुम् ।१२३ प्राप लोभात्पटु म्प्राज्यं रुद्रस्यात्र (द्वि) रुरुष्करम् । लोकलोपटु प्रायः खलौद्योभेषु भेदिताः ।१२४

४६ ] [ श्री शारदा तिलक वर्णाः क्रमात्स्वरान् यौतु रेवत्यंशगतौ तदा । जन्मसंपद्विपत्क्षेम प्रत्यरिः साधको बधः ।१२५ मन्त्र के मन्त्र द्वारा जल से तर्पण करना ही तर्पण सस्कार माना गया है । तार, माया और रमा के योग से (तार, प्रणव, माया, शक्ति, रमा, श्री) मन्त्र का दीपक कहा जाता है ।१२१। जप किये जाने वाले मन्त्र का प्रकाशन न करना ही गोपन संस्कार होता है जिसे गुप्ति नाम से कहा गया है। ये ही दश संस्कार होते हैं जो बतला दिये गये हैं । ये सभी मन्त्रों में गोपित है ।१२२। जिन संस्कारों को करके मन्त्रधारी अपने वाञ्छितको प्राप्त किया करते हैं। अपनी नक्षत्र राशिऔर कोष्ठ के अनुकूल ही मन्त्र का सेवन करना चाहिए ।१२३। इस श्लोक का विशदर्थ यह है-प्रा २ य प १ लो ३, भा ४, प १, टुं १, प्रा २, ज्यं १, रु २, द्र २, र्या १, त्र, रु, २, ष्क १, स्म २, । लो २, प १, पट १, टु १, प्रा २, यः १, स ३, लो ३, द्यौ १—इस प्रकार से कथित आद्यक्षरों में अश्विनी आदि जाननी चाहिए । रेवती के अंशगत दो अन्य अन्त्य स्वरअं-अः । तब क्रमसे वर्ण है । ये जन्म-सम्पत्, विपद, क्षेम, प्रत्यारि और साधक तथा वध है।१२५। मित्रं परममित्रं च जन्मादीनि पुनः पुनः । काल गौरं खुरं शोण शमी शोभेति राशिषु ।१२६ क्रमेण भेदिता वर्णाः कन्यायां शादयः स्थिताः । लग्नं धन भ्रातृबन्धुपुत्रशत्रु कलत्रका ।१२७ मरणं धर्मकर्मार्यिव्यया द्वादश राशयः । चतुरस्रे लिखेद्वर्णंश्चतुष्कोष्ठसमन्विते ।१२८ अकारादिक्षकारान्तान्स्वनामाद्यक्षरादितः । सिद्धादीन्कल्पयेन्मन्त्री कुर्यात्सिद्धादिभिः पुनः ।१२६ सिद्धादीन् सिद्धिदः सिद्धो जपात्साध्यो हुतादिभिः । सुसिद्धः प्राप्तिमात्रेण साधकं भक्षयेदरिः ।१३० मित्र और परम मित्र जन्म आदि वार बार होते हैं । राशियों में काल, गौर, खुर, शोण, शमी और शोभा ये क्रम से वर्ण भेदित

द्वितीय पटल ] [ ४७ कन्या में आदि स्थित है। जन्म कुण्डलीमें बारह घर होते हैं उनमें प्रथम गृह लग्न का होता है जिसमें शिशु का जनन हुआ करता है दूसरा गृह धन का होता है। इसी से धन-सम्पदा आदि का विचार किया जाता है। तीसरा गृह आदि भाई, बन्धु, पुत्र, शत्रु और कलत्रका होते हैं। चार कोष्ठोंसे सनन्वित चौकोरमें वर्णोंको लिखना चाहिए ।१२६-१२७। ।१२८। अपने नाम के आदि में होने वाले अक्षर से अकार आदि से अकार के अन्त तक वर्णों की लिखे। मन्त्रधारी पुन सिद्ध आदि के द्वारा सिद्ध आदि की कल्पना करे ।१२६। सिद्ध आदि का लेखन या विचार करे । मन्त्र सिद्धि का देने वाला सिद्ध हुआदि जप से साध्य हुआ करता है। प्राप्ति मात्र ही सुसिद्ध होता है। एक आदि होता है जो साध्य का भक्षण करता है ।१३०। सिद्धार्णा बान्धवाः प्रोक्ताः साध्यास्ते सेवकाः स्मृताः । सुसिद्धाः पोषका ज्ञेयाः शत्रु वोघातका मताः । दीपस्थानं समाश्रित्य कृतं कर्म फलप्रदम् । चतुरस्रां भुव भित्त्वा कोष्ठानां नवकं लिखेत् ।°३२ पूर्वकोष्ठादि विलिखेत्सप्तवर्गाननुक्रमात् । लक्ष्मीशे मध्यकोष्ठे स्वरान्युग्मक्रमाल्लिखेत् ।१३३ दिक्षु पूर्वांदितोयत्र क्षेत्राख्याद्यक्षरं स्थितम् । मुखं तत्तस्य जानीयाद्धस्तावुभयतः स्थिते ।१३४ कोष्ठे कुक्षी उभे पादौ द्वे शिष्टं पुच्छमीरितम् । क्रमेणानेन विभजे न्मध्यस्थमपि भागतः ।१३५ सिद्ध वर्ण वाले बान्धव कहे गये हैं और जो साध्य हैं वे सेवक बताये गये हैं। जो सुसिद्ध होते हैं वे पुत्र बतल यें गये हैं और जो घातक हैं वे शत्रु बताये गये हैं ।१३१। दीप स्थान कां समाश्रय लेकर किया हुआ कर्म फल प्रदान करने वाला हुआ करता है। चतुरस्रभू का भेदन करके नौ कोष्ठों को लिखना चाहिए ।१३२। सात वर्णों को अनु- क्रम से पूर्ण कोष्ठ आदि का लेखन करे। स्वरों को युग्मक्रमसे लक्ष्मीश

४८ ] [ श्रीशारदा तिलक मध्यकोष्ठ में लिखे ।१३३। पूर्व आदि दिशाओं में जहां पर क्षेत्रादि अक्षर स्थित होवे वह उसका मुख जानना चाहिए । दोनों और हस्त स्थित होवे और कोष्ठ में दो कुक्षियाँ होवें-दो या एक को शिष्ट पुच्छ कहा गया है । इस क्रम से भाग से साध्य में स्थित का भी विभाग करे । १३४=१,५। मुखस्थो लभते सिद्धिं करस्थः स्वल्पजीवनः । उदासीनः कुक्षिसंस्थः पादस्थो दुःखमाप्नुयात् ।१३६ पुच्छस्थः पीडयते मन्त्री बन्धनोच्चाटनादिभिः । कूर्मचक्रमिदं प्रोक्तं मन्त्राणां सिद्धिसाधनम् ।१३७ पुण्यक्षेत्रं नदीतीरं गुहापर्वतमस्तकम् । तीर्थप्रदेशाः सिंधूनां सङ्गमः पावन वनम् ।१३८ उद्यानानि विविक्तानि बिल्वमूलं गिरेस्तटम् । देवतायतनं कूलं समुद्रस्य निज गृहम् ।१३६ साधनेषु प्रशस्यन्ते स्थानान्येतानि मन्त्रिणाम् । भैक्ष्यं हविष्यं शाकानि विहितानि फल पयः ।१४० मूलं सक्तुर्यवोत्पन्नो भक्ष्याण्येतानि मन्त्रिणाम् । पुरुषार्थसमावाप्त्यै सच्छिष्यो गुरुमाश्रयेत् ।१४१ मुख में जो स्थित हो वह अवश्य ही सिद्धि को प्राप्त किया करता हे--करमें जो स्थित होवे स्वल्प जीवन वाला होता है । कुक्षि में जो स्थित होता है वह उदासीन हुआ करता है और जो पाद में स्थित होवे वह दुःख प्राप्त किया करता है ।१३६। पुच्छ में स्थित मन्त्रधारी पीड़ित हुआ करता है जो बन्धन और उच्चाटन आदिके द्वारा ही होता है । यह मन्त्रों की सिद्धि का साधन स्वरूप कूर्मचक्र बतलाया जाता है ।१३७। अब पुण्यस्थान साधनों के लिये बताये जाते हैं—कोई भी पुण्य क्षेत्र-किसी सागर गामिनी नदी का तट, कोई गुफा, पर्वत का शिखर, तीर्थ स्थल, नदियोंके सङ्गम होनेका स्थल, पावन, वन, एकान्त उद्यान, विल्व वृक्ष का मूल पर्वत का किनारा, किसी भी देव का