भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 41, कुल 511 में से

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द्वितीय पटल ] [ ३७ प्रबुद्ध हुआ करते हैं । दूसरे भाग में प्राण के स्थित रहनेपर सौम्य मन्त्र बोध को प्राप्त हुआ करते हैं ।६२। दोनों नाडियों से प्राण के गत हो जाने पर सभी मन्त्र बोध को प्राप्त होते हैं । मन्त्र धारियों के जब मन्त्र प्रबुद्ध होते हैं तभी सब फल दिया करते हैं ।६३। छिन्नादि दोषों से युक्त हुए मन्त्र साधक का पालन नहीं किया करते । उनके नाम छिन्न, शक्ति से हीन और पराङ्मुख कहे गये हैं ।६४। बधिर, नेत्रहीन, कीलित, स्तम्भित दग्ध, त्रस्त, भीत मलिन, तिरस्कृत ।६५। भेदितश्च सुषूप्तश्च मन्दोन्मतश्च मूर्च्छितः । हतवीर्यश्चहीनश्चप्रध्वस्तो बालकः पुनः ।६६ कमारस्तु युवा प्रोढो वृद्धो निस्त्रंशकस्तथा । निर्बीजः सिद्धहीनश्चय मन्दः कूटस्यथा पुनः ।६७ निरंशः सत्त्वहीनश्चकेकरो बीजहीनकः । धूमितालिङ्गितौ स्यातां मोहितश्चक्षुधार्तकः ।६८ अतिदृप्तोऽङ्गहोमश्च(नःस्याः) अतिक्रुद्धःसमीरितः । अतिक्रूरश्चसब्रीडः शान्तमानस एव च ।६६ स्थानभ्रष्टत विकलः सोऽतिवृद्धः प्रकीर्त्तितः निःस्नेहः पीडितश्चापि वक्ष्यत्येषां च लक्षणम् ।७० भेदित-सुषुप्त-मन्दोन्मत्त-मूर्च्छित-हतवीर्य-और हीन तथा बालक ये प्रध्वस्त हैं ।६६। कुमार, युवा-प्रौढ़-वृद्ध तथा निस्त्रिंशक, निर्बीज सिद्धिहीन, मन्द, कूट, निरंश, सत्वहीन, केकर, बीज, हीनक, भूमित अलिङ्गित, मोहित, क्षुधार्तक, आदिट्प्त, अति क्रुद्ध कहे गये हैं । क्रीड़ा सहित, शान्त मानस-जाति क्रूर है । स्थान भ्रष्ट विफल होता वह अति वृद्ध कहा गया है, जो नि.सन्देह और पीड़ित होता है - इनका लक्षण बताया जायेगा ।६७-७०। सञ्जोर्यस्यादिमध्यान्तेष्वानिलं बोजमुच्यते । संयुक्तं वा वियुक्तं वा स्वराक्रान्तं त्रिधा पुनः ।७१

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