भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 50, कुल 511 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 50

४६ ] [ श्री शारदा तिलक वर्णाः क्रमात्स्वरान् यौतु रेवत्यंशगतौ तदा । जन्मसंपद्विपत्क्षेम प्रत्यरिः साधको बधः ।१२५ मन्त्र के मन्त्र द्वारा जल से तर्पण करना ही तर्पण सस्कार माना गया है । तार, माया और रमा के योग से (तार, प्रणव, माया, शक्ति, रमा, श्री) मन्त्र का दीपक कहा जाता है ।१२१। जप किये जाने वाले मन्त्र का प्रकाशन न करना ही गोपन संस्कार होता है जिसे गुप्ति नाम से कहा गया है। ये ही दश संस्कार होते हैं जो बतला दिये गये हैं । ये सभी मन्त्रों में गोपित है ।१२२। जिन संस्कारों को करके मन्त्रधारी अपने वाञ्छितको प्राप्त किया करते हैं। अपनी नक्षत्र राशिऔर कोष्ठ के अनुकूल ही मन्त्र का सेवन करना चाहिए ।१२३। इस श्लोक का विशदर्थ यह है-प्रा २ य प १ लो ३, भा ४, प १, टुं १, प्रा २, ज्यं १, रु २, द्र २, र्या १, त्र, रु, २, ष्क १, स्म २, । लो २, प १, पट १, टु १, प्रा २, यः १, स ३, लो ३, द्यौ १—इस प्रकार से कथित आद्यक्षरों में अश्विनी आदि जाननी चाहिए । रेवती के अंशगत दो अन्य अन्त्य स्वरअं-अः । तब क्रमसे वर्ण है । ये जन्म-सम्पत्, विपद, क्षेम, प्रत्यारि और साधक तथा वध है।१२५। मित्रं परममित्रं च जन्मादीनि पुनः पुनः । काल गौरं खुरं शोण शमी शोभेति राशिषु ।१२६ क्रमेण भेदिता वर्णाः कन्यायां शादयः स्थिताः । लग्नं धन भ्रातृबन्धुपुत्रशत्रु कलत्रका ।१२७ मरणं धर्मकर्मार्यिव्यया द्वादश राशयः । चतुरस्रे लिखेद्वर्णंश्चतुष्कोष्ठसमन्विते ।१२८ अकारादिक्षकारान्तान्स्वनामाद्यक्षरादितः । सिद्धादीन्कल्पयेन्मन्त्री कुर्यात्सिद्धादिभिः पुनः ।१२६ सिद्धादीन् सिद्धिदः सिद्धो जपात्साध्यो हुतादिभिः । सुसिद्धः प्राप्तिमात्रेण साधकं भक्षयेदरिः ।१३० मित्र और परम मित्र जन्म आदि वार बार होते हैं । राशियों में काल, गौर, खुर, शोण, शमी और शोभा ये क्रम से वर्ण भेदित