भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 51, कुल 511 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 51

द्वितीय पटल ] [ ४७ कन्या में आदि स्थित है। जन्म कुण्डलीमें बारह घर होते हैं उनमें प्रथम गृह लग्न का होता है जिसमें शिशु का जनन हुआ करता है दूसरा गृह धन का होता है। इसी से धन-सम्पदा आदि का विचार किया जाता है। तीसरा गृह आदि भाई, बन्धु, पुत्र, शत्रु और कलत्रका होते हैं। चार कोष्ठोंसे सनन्वित चौकोरमें वर्णोंको लिखना चाहिए ।१२६-१२७। ।१२८। अपने नाम के आदि में होने वाले अक्षर से अकार आदि से अकार के अन्त तक वर्णों की लिखे। मन्त्रधारी पुन सिद्ध आदि के द्वारा सिद्ध आदि की कल्पना करे ।१२६। सिद्ध आदि का लेखन या विचार करे । मन्त्र सिद्धि का देने वाला सिद्ध हुआदि जप से साध्य हुआ करता है। प्राप्ति मात्र ही सुसिद्ध होता है। एक आदि होता है जो साध्य का भक्षण करता है ।१३०। सिद्धार्णा बान्धवाः प्रोक्ताः साध्यास्ते सेवकाः स्मृताः । सुसिद्धाः पोषका ज्ञेयाः शत्रु वोघातका मताः । दीपस्थानं समाश्रित्य कृतं कर्म फलप्रदम् । चतुरस्रां भुव भित्त्वा कोष्ठानां नवकं लिखेत् ।°३२ पूर्वकोष्ठादि विलिखेत्सप्तवर्गाननुक्रमात् । लक्ष्मीशे मध्यकोष्ठे स्वरान्युग्मक्रमाल्लिखेत् ।१३३ दिक्षु पूर्वांदितोयत्र क्षेत्राख्याद्यक्षरं स्थितम् । मुखं तत्तस्य जानीयाद्धस्तावुभयतः स्थिते ।१३४ कोष्ठे कुक्षी उभे पादौ द्वे शिष्टं पुच्छमीरितम् । क्रमेणानेन विभजे न्मध्यस्थमपि भागतः ।१३५ सिद्ध वर्ण वाले बान्धव कहे गये हैं और जो साध्य हैं वे सेवक बताये गये हैं। जो सुसिद्ध होते हैं वे पुत्र बतल यें गये हैं और जो घातक हैं वे शत्रु बताये गये हैं ।१३१। दीप स्थान कां समाश्रय लेकर किया हुआ कर्म फल प्रदान करने वाला हुआ करता है। चतुरस्रभू का भेदन करके नौ कोष्ठों को लिखना चाहिए ।१३२। सात वर्णों को अनु- क्रम से पूर्ण कोष्ठ आदि का लेखन करे। स्वरों को युग्मक्रमसे लक्ष्मीश