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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

४६ ] [ श्री शारदा तिलक वर्णाः क्रमात्स्वरान् यौतु रेवत्यंशगतौ तदा । जन्मसंपद्विपत्क्षेम प्रत्यरिः साधको बधः ।१२५ मन्त्र के मन्त्र द्वारा जल से तर्पण करना ही तर्पण सस्कार माना गया है । तार, माया और रमा के योग से (तार, प्रणव, माया, शक्ति, रमा, श्री) मन्त्र का दीपक कहा जाता है ।१२१। जप किये जाने वाले मन्त्र का प्रकाशन न करना ही गोपन संस्कार होता है जिसे गुप्ति नाम से कहा गया है। ये ही दश संस्कार होते हैं जो बतला दिये गये हैं । ये सभी मन्त्रों में गोपित है ।१२२। जिन संस्कारों को करके मन्त्रधारी अपने वाञ्छितको प्राप्त किया करते हैं। अपनी नक्षत्र राशिऔर कोष्ठ के अनुकूल ही मन्त्र का सेवन करना चाहिए ।१२३। इस श्लोक का विशदर्थ यह है-प्रा २ य प १ लो ३, भा ४, प १, टुं १, प्रा २, ज्यं १, रु २, द्र २, र्या १, त्र, रु, २, ष्क १, स्म २, । लो २, प १, पट १, टु १, प्रा २, यः १, स ३, लो ३, द्यौ १—इस प्रकार से कथित आद्यक्षरों में अश्विनी आदि जाननी चाहिए । रेवती के अंशगत दो अन्य अन्त्य स्वरअं-अः । तब क्रमसे वर्ण है । ये जन्म-सम्पत्, विपद, क्षेम, प्रत्यारि और साधक तथा वध है।१२५। मित्रं परममित्रं च जन्मादीनि पुनः पुनः । काल गौरं खुरं शोण शमी शोभेति राशिषु ।१२६ क्रमेण भेदिता वर्णाः कन्यायां शादयः स्थिताः । लग्नं धन भ्रातृबन्धुपुत्रशत्रु कलत्रका ।१२७ मरणं धर्मकर्मार्यिव्यया द्वादश राशयः । चतुरस्रे लिखेद्वर्णंश्चतुष्कोष्ठसमन्विते ।१२८ अकारादिक्षकारान्तान्स्वनामाद्यक्षरादितः । सिद्धादीन्कल्पयेन्मन्त्री कुर्यात्सिद्धादिभिः पुनः ।१२६ सिद्धादीन् सिद्धिदः सिद्धो जपात्साध्यो हुतादिभिः । सुसिद्धः प्राप्तिमात्रेण साधकं भक्षयेदरिः ।१३० मित्र और परम मित्र जन्म आदि वार बार होते हैं । राशियों में काल, गौर, खुर, शोण, शमी और शोभा ये क्रम से वर्ण भेदित

द्वितीय पटल ] [ ४७ कन्या में आदि स्थित है। जन्म कुण्डलीमें बारह घर होते हैं उनमें प्रथम गृह लग्न का होता है जिसमें शिशु का जनन हुआ करता है दूसरा गृह धन का होता है। इसी से धन-सम्पदा आदि का विचार किया जाता है। तीसरा गृह आदि भाई, बन्धु, पुत्र, शत्रु और कलत्रका होते हैं। चार कोष्ठोंसे सनन्वित चौकोरमें वर्णोंको लिखना चाहिए ।१२६-१२७। ।१२८। अपने नाम के आदि में होने वाले अक्षर से अकार आदि से अकार के अन्त तक वर्णों की लिखे। मन्त्रधारी पुन सिद्ध आदि के द्वारा सिद्ध आदि की कल्पना करे ।१२६। सिद्ध आदि का लेखन या विचार करे । मन्त्र सिद्धि का देने वाला सिद्ध हुआदि जप से साध्य हुआ करता है। प्राप्ति मात्र ही सुसिद्ध होता है। एक आदि होता है जो साध्य का भक्षण करता है ।१३०। सिद्धार्णा बान्धवाः प्रोक्ताः साध्यास्ते सेवकाः स्मृताः । सुसिद्धाः पोषका ज्ञेयाः शत्रु वोघातका मताः । दीपस्थानं समाश्रित्य कृतं कर्म फलप्रदम् । चतुरस्रां भुव भित्त्वा कोष्ठानां नवकं लिखेत् ।°३२ पूर्वकोष्ठादि विलिखेत्सप्तवर्गाननुक्रमात् । लक्ष्मीशे मध्यकोष्ठे स्वरान्युग्मक्रमाल्लिखेत् ।१३३ दिक्षु पूर्वांदितोयत्र क्षेत्राख्याद्यक्षरं स्थितम् । मुखं तत्तस्य जानीयाद्धस्तावुभयतः स्थिते ।१३४ कोष्ठे कुक्षी उभे पादौ द्वे शिष्टं पुच्छमीरितम् । क्रमेणानेन विभजे न्मध्यस्थमपि भागतः ।१३५ सिद्ध वर्ण वाले बान्धव कहे गये हैं और जो साध्य हैं वे सेवक बताये गये हैं। जो सुसिद्ध होते हैं वे पुत्र बतल यें गये हैं और जो घातक हैं वे शत्रु बताये गये हैं ।१३१। दीप स्थान कां समाश्रय लेकर किया हुआ कर्म फल प्रदान करने वाला हुआ करता है। चतुरस्रभू का भेदन करके नौ कोष्ठों को लिखना चाहिए ।१३२। सात वर्णों को अनु- क्रम से पूर्ण कोष्ठ आदि का लेखन करे। स्वरों को युग्मक्रमसे लक्ष्मीश

४८ ] [ श्रीशारदा तिलक मध्यकोष्ठ में लिखे ।१३३। पूर्व आदि दिशाओं में जहां पर क्षेत्रादि अक्षर स्थित होवे वह उसका मुख जानना चाहिए । दोनों और हस्त स्थित होवे और कोष्ठ में दो कुक्षियाँ होवें-दो या एक को शिष्ट पुच्छ कहा गया है । इस क्रम से भाग से साध्य में स्थित का भी विभाग करे । १३४=१,५। मुखस्थो लभते सिद्धिं करस्थः स्वल्पजीवनः । उदासीनः कुक्षिसंस्थः पादस्थो दुःखमाप्नुयात् ।१३६ पुच्छस्थः पीडयते मन्त्री बन्धनोच्चाटनादिभिः । कूर्मचक्रमिदं प्रोक्तं मन्त्राणां सिद्धिसाधनम् ।१३७ पुण्यक्षेत्रं नदीतीरं गुहापर्वतमस्तकम् । तीर्थप्रदेशाः सिंधूनां सङ्गमः पावन वनम् ।१३८ उद्यानानि विविक्तानि बिल्वमूलं गिरेस्तटम् । देवतायतनं कूलं समुद्रस्य निज गृहम् ।१३६ साधनेषु प्रशस्यन्ते स्थानान्येतानि मन्त्रिणाम् । भैक्ष्यं हविष्यं शाकानि विहितानि फल पयः ।१४० मूलं सक्तुर्यवोत्पन्नो भक्ष्याण्येतानि मन्त्रिणाम् । पुरुषार्थसमावाप्त्यै सच्छिष्यो गुरुमाश्रयेत् ।१४१ मुख में जो स्थित हो वह अवश्य ही सिद्धि को प्राप्त किया करता हे--करमें जो स्थित होवे स्वल्प जीवन वाला होता है । कुक्षि में जो स्थित होता है वह उदासीन हुआ करता है और जो पाद में स्थित होवे वह दुःख प्राप्त किया करता है ।१३६। पुच्छ में स्थित मन्त्रधारी पीड़ित हुआ करता है जो बन्धन और उच्चाटन आदिके द्वारा ही होता है । यह मन्त्रों की सिद्धि का साधन स्वरूप कूर्मचक्र बतलाया जाता है ।१३७। अब पुण्यस्थान साधनों के लिये बताये जाते हैं—कोई भी पुण्य क्षेत्र-किसी सागर गामिनी नदी का तट, कोई गुफा, पर्वत का शिखर, तीर्थ स्थल, नदियोंके सङ्गम होनेका स्थल, पावन, वन, एकान्त उद्यान, विल्व वृक्ष का मूल पर्वत का किनारा, किसी भी देव का

द्वितीय पटल ] [ ४६ आयतन, समुद्र का तट और अपना गृह ये मन्त्रधारियों को साधन के लिए स्थान, प्रशस्त हुआ करते हैं । भिक्षा से प्राप्त अन्न-हविष्य, शाक-फलऔर दूध, मूल, यवों, का बनाया हुआ सक्तुये ही मन्त्रधारियों के भक्ष्य होते हैं । पुरुषार्थ की समाप्ति के लिए अच्छे विषय को गुरुका समाश्रय ग्रहण करना चाहिए ।१३८-१४१। मातृतः पितृतः शुद्धः शुद्धभावो जितेन्द्रियः । सर्वागमानां सारज्ञः सर्वशास्त्रार्थतत्त्ववित् ।१४२ परोपकारनिरतो जपपूजादितत्परः । अमोघवचनः शान्तो वेदवेदार्थपारगः ।१४३ योगमार्गानुसन्धायो देवताहृदयङ्गमः । इत्यादि गुणसम्पन्नो नुरुरागमसम्मतः । १४४ शिष्यः कुलीनः शुद्धात्मा पुरुषार्थपरायणः । अधीतवेदः कुशला दूरमुक्तमनोभवः । १४५ अब परम श्रेष्ठ गुरु के विषय में बतलाते हैं-मातृकुल और पितृ- कुल से शुद्ध होवे, विशुद्ध भाव से समन्वित होवे, इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने वाला होवे, सभी आगमों के सारका ज्ञाता होवे और समस्त शास्त्रों के अर्थों ;के तत्वों का जानने वाला होवे । दूसरों की भलाई करने में निरत रहने वाला होवे, जप और पूजा आदि में परायण रहने वाला होवे, अमोघ, वचनों को कहने वाला हो, परम शान्त होवे, वेदों के अर्थों का पारगामी विद्वान् होवे, योग मार्गके अनुसन्धान करने वाला होवे, देवता का हृदयङ्गम करने वाला होवे, इत्यादि सुसम्पन्न गुरु ही आगमोंके द्वारा सम्मत होता है । अब शिष्यके विषयमें बतलाता जाता है कि शिष्यकैसा होना चाहिए । शिष्य अच्छे कुलमें समुत्पन्नहुआ होवे, उसकी आत्मा सभी प्रकार के दोषोंसे रहित परम शुद्धि होनी चाहिए । शिष्य पुरुषार्थ करने में तत्पर रहने वाला होवे, उसने वेदों का अध्ययन किया हो और वह कार्य कुशल होना चाहिए । शिष्य ऐसा ही होना

५० ] [ श्री शारदा तिलक चाहिए जिसने काम-वासना का त्याग कर दिया होवे ।१४२-१४३। १४५। हितैषी प्राणिनां नित्यमास्तिकस्त्यक्तनास्तिकः । स्वधर्म्मनिरतो भक्त्या पितृमातृहितोद्यतः ।१४६ वाङ्मनः कायवसुभिर्गुरुशुश्रूषणे रतः । त्यक्ताभिमानो गुरुषु जातिविद्याधनादिभि ।१४७ गुर्वाज्ञापालनार्थं हि प्राणव्ययरतोद्यतः । विहत्य च स्वकार्याणि गुरुकार्यरतः सदा ।१४८ दासवान्निवसेद्यस्तु गुरौ भक्त्या सदा शिशुः । कुर्वन्नाज्ञां दिवारात्रौ गुरुभक्ति परायणः ।१४६ आज्ञाकारी गुरोः शिष्योमनोवाक्कायकर्मभिः । यो भवेत्स तदा ग्राह्यो नेतरः शुभकाङ्क्षया ।१५० शिष्य समस्त प्राणियों के हित के चाहने वाला, नित्य ही हित चिन्तक, आस्तिक अर्थात् वेदों और ईश्वर में परम आस्था रखने वाला, जिसने नास्तिकों का सम्पर्क दूर कर दिया होवे अपने धर्म्ममें निरत - भक्ति की भावना से अपने माता-पिता के हित सम्पादन करने में समुद्यत होवे । वाणी मन और शरीर के द्वारा तथा धन से अपने गुरुदेव की सेवा करने में रति रखने वाला होवे । जाति-विद्या और धन आदि के द्वारा अपने गुरुदेवों के विषय में अभिमान के परित्याग कर देने वाला होवे ।१४६-१४७। शिष्य ऐसा ही होना चाहिए जो अपने गुरुदेव की आज्ञा का पालन करने के लिए अपने प्राणोंका व्यय कर देने में भी उद्यत रहे । अपने कार्यों का विहनन करकेभीसदा गुरुदेवके कार्यों के करने से रति रखने वाला हो ।१४८। जो गुरु के समीप से एक दास की ही भाँति निवास करे और भक्ति भाव से सदा एक शिशु की ही तरह रहे । दिन रात गुरु की आज्ञा को करते हुए गुरुदेव की भक्ति ही में परायण रहे ।१४८-१४६। मन-वाणी और शरीर के द्वारा शिष्य को गुरु की आज्ञा का पालन करने वाला ही होना चाहिए । ऐसा जो भी

द्वितीय पटल ] [ ५१ हो उसी को अपने शिष्य के रूप में ग्रहण करना चाहिए और शुभ की आकाङ्क्षा से भी अन्य को कभी ग्रहण न करे ॥१५०॥ मन्त्रपूजारहस्यानि यो गोपयति सर्वदा । त्रिकालं यो नमस्कुर्यादागमाचारतत्ववित् ॥१५१ स एव शिष्यः कर्तव्यो नेतर' स्वल्पजीवनः । एतादृशगुणोपेतः शिष्यो भवति नापरः ॥१५२ एकाब्देन भवेद्योग्यो ब्राह्मणोऽब्दद्वयान्नृपः । वैश्यो वर्षैस्त्रिभिः, शूद्रश्चतुर्भिर्वत्सरैर्गुरोः । स शुश्रूषुः परिग्राह्यो दीक्षायागव्रतादिषु ॥१५३ जो मन्त्र-पूजा के रहस्यों का सदा गोपन किया करता है और आचारों के तत्वों का ज्ञाता तीनों कालों में नमस्कार करे । वही अपना शिष्य बनानाचाहिए और दूसरेस्वल्प जीवन वालेको शिष्य न करे । इस प्रकार के गुणों से सयुत ही शिष्य होता है और अन्य नहीं होता है । १५१-१५२। ब्राह्मण एक वर्ष में योग्य होता है । दो वर्षमें क्षत्रिय तीन वर्षों में वैश्य और शूद्र चार वर्षों में योग्य होता है । ऐसा ही गुरु को दीक्षा-याग और व्रतादि में सुश्रुषु शिष्य ग्रहण करने योग्य है ॥१५३। तृतीय पटल ततो वक्ष्यामि दीक्षाङ्गं वास्तुयागपुरःसरम् । कृतेग येन मन्त्रज्ञो दीक्षायाः फलमश्नुते ॥१ राक्षस वास्तुनामानं हत्वाधिष्ठाय तत्तनुम् । स्थितास्त्रिपञ्चाशद्देवास्तेभ्यः पूर्वं वलि हरेत् ॥२ वलिमण्डलमेतेषां यथावदभिसीयते । पूर्वापरायतं सूत्रं विन्यसेदुक्तमानतः ॥३

सूत्र को उक्त नाप से विन्यस्त करना चाहिए । उससे मध्य में कुछ

५२ ] [ श्रीशारदा तिलक तन्मध्यं किञ्चिदालम्ब्य मत्स्यौ द्वौ परितो लिखेत् । तयोर्मध्ये स्थितं सूत्रं विन्वसेद्दक्षिणोत्तरम् ।४ द्वाभ्यां द्वाभ्यां तथाऽग्राभ्यां कोणेषु मकारल्लिखेत् । मत्स्यमध्ये स्थिताग्राणि तत्र सूत्राणि पातयेत् ।५ चतुरस्रं भवेत्तत्र चतुष्कोष्ठसमन्वितम् । तत्पुनर्विभजेन्मन्त्री चतुः, षष्टिपदं यथा ।६ ईशानाद्राक्षसं यावद्यावदग्नेः प्रभञ्जनः । एवं सूत्रद्वयं दद्यात्कर्णसूत्रं समाहितः ।७ इसके उपरान्त वास्तु याग के पूर्वक दीक्षाङ्ग की बतलाया जायगा जिसके किये जान से मन्त्र का ज्ञाता पुरुष दीक्षा के फलको प्राप्त किया करता है ।१। अब वास्तु याग की उत्पत्ति बतलाई जातीं है-पूर्व में एक महान् उग्र और समस्त प्राणियोंको भयंकर राक्षस जोदेवोके द्वारा निहत हुआ था यही भूमि में वास्तु पुरुष कहा गया है । वास्तु नाम वाले राक्षस का हनन करके उसके शरीर पर अधिष्ठित होकर तिरेपन देव स्थित हैं । पहले उनके लिए वलिका हरण करना चाहिए ।२। इनका वलिमण्डल ठीक-ठीक रीति से कहा जाता है—पूर्व और अपरमें आयत सूत्र को उक्त नाप से विन्यस्त करना चाहिए । उससे मध्य में कुछ आलम्बन करके दोनों ओर दो मत्स्यों में विन्यस्त करे ।३-४। दो-दो अग्रभागों से एक-एक मत्स्य पूर्ववत् होता है । इसी प्रकार से दूसरी ओर भी द्वितीय मत्स्य होता है । प्राची के सूत्रार्थ मित प्राची सूत्राणु में स्थित सूत्र से ईशान और अग्नि कोण में अर्ध चन्द्र करना चाहिए । फिर उसी सूत्र से उत्तर सूत्राय में स्थित से ईशान और वायव्य कोण में अर्ध चन्द्र लिखे । इस रीति से ईशान में मत्स्य उत्पन्न हो जाता है । पूर्व की ही भाँति पक्षिमार्र्ध स्थित सूत्र से वायव्य और नंऋंत्य कोण में अर्ध चन्द्र बनावे । इस तरह से दोनों ही स्थलों में दो मत्स्य हो जाते हैं ।५। वहाँ पर चार कोष्ठों से समन्वित चतुरस्र ( चौकोर ) होता है ।

तृतीय पटल ] [ ५३ उसको फिर मंत्रधारी चौंसठ पद वाला विभक्त करे ।६। ईशान से राक्षस कोण तक और अग्नि से वायव्य कोण पर्यन्त परम सावधान होकर इस प्रकार से सूत्रद्वय कोण सूत्र देवे । कोण सूत्र की कर्ण सूत्र संज्ञा होती है ।७। ब्रह्माणं पूजयेदादौ मध्ये कोष्ठचतुष्टये । दिक्‌चतुष्केषु पूर्वादि यजेदार्यमनन्तरम् ।८ विवस्वन्ततो मित्रं महीधरमतः परम् । कोणार्द्धकोष्ठद्वन्द्वेषु वहनयादिपरितः पुनः ।६ सावित्रं सवितारं च शक्रमिन्द्रजयं पुनः । रुद्रं रुद्रजय विद्वानापञ्चाथापवत्सकम् ।१० तत्कर्णसूत्रोभयतः कोष्ठद्वन्द्वेषु देशिकः । शर्वं गृहं चार्यमणं जम्भकं पिलिपिच्छकम् ।११ चरकीं च विदारीं च पतनामर्चयेत्क्रमात्। अर्चयेद्दिक्षु पूर्वादिसाद्धांर्च्यन्तदेष्विमान् ।१२ अष्टावष्टौविभागेन देवान्देशिकसत्तमः । क्रमादीशानपर्जन्यजयन्ताः शक्रभास्करौ ।१३ सत्यो वृषान्तरिक्षौ च दिशि प्राच्यामवस्थिताः । अग्निःपूषा च वितथो यमश्च गृह्रक्षकः ।१४ गन्धर्वो भृङ्गराजश्च मृगोदक्षिणदिग्गताः । निऋर्तिदौ वारिश्च सुग्रीववरुणौ ततः ।१५ पुष्पदन्तासुरौ शेषरोगौ प्रत्यग्दिशि स्थिताः । वायुनगिश्च मुख्यश्च सोमो भल्लाटएव च ।१६ अर्गलाख्यो दित्यदिता कुवेरस्य दिशि स्थिताः । उक्तानामपि देवानां पदान्य।पूर्य पञ्चभिः ।१७ समाहित होकर आदि के मध्य में चार कोष्ठों में ब्रह्माजीका पूजन करे । पूर्वादि चारों दिशाओं में आर्य का यजन करना चाहिए । अर्थात् आर्य का पूर्व दिशा में—विवस्वान् का दक्षिण दिशा में—मित्र का

५४ ] श्री शारदा तिलक पश्चिम दिशा में और महीधर का उत्तर दिशा में पूजन करे । कोणार्ध दो कोष्ठों में वह्नि आदिका पूजन करना चाहिए ।८-६। ऊर्ध्व कोष्ठमें सावित्र का और अधः कोष्ठ में सविता का यजन करे । फिर विद्वान- पुरुष शक्र, इन्द्र जय, रुद्र-रुद्र जय पाँच अववतसक का पूजन करे ।१०। उस कोण सूत्र के दोनों ओर कोष्ठ द्वन्द्वों में आचार्य क्रम से शर्व-गुह

  • अर्यमा-जम्भक पिलि पिच्छक-तरक्षी-विहारी और पूतना का जमर्चन करे । पूर्वादि सार्ध आद्यन्त पदों में दिशाओं में इनका पूजन करना चाहिए ।११-१२। उत्तम आचार्य काम में आठ-आठ के विभाग से देवों का यजन करे । ईशान-मर्जन्य - अत्यन्त-शक्र-भास्कर - सत्य-वृष-अन्तरिक्ष जो प्राची दिशा में अवस्थित है । अग्नि - पूषा-वितथ-यम-गृह रक्षक-गन्धर्व-भृङ्गराज-मृग जो कि दक्षिण दिशा में अवस्थित है । निर्ऋति-दौवारिक-सुग्रीव-वरुण-पुष्पदन्त- असुर- शेष-रोग-जो प्रत्यग् दिशा में अवस्थित है । वायु-नाग-मुख्य- सोम-भल्लाट-दिति-अदिति जो कि कुवेर की दिशा में स्थित हैं । इन उक्त देवों के भी पदों को पाँचों से आपूरित करे ।१३-१७। रजोभिस्तेष्वथैतेभ्यः पायसान्नैर्बलिं हरेत् । अयं वास्तुबलिः प्रोक्तः सर्वसम्पत्समृद्धिदः । १८ नक्षत्रराशिवारणामनुकूले शुभेऽहनि । ततो भूमितले शुद्धे तुषाङ्गारविवर्जिते ।१६ पुण्याहं वाचयित्वा तु मण्डपं रचयेच्छुभम् । पञ्चभिः सप्तभिर्हस्तैर्नवभिर्वामितान्तरम् ।२० षोडशस्तम्भसंयुक्तं चत्वारस्तेषु मध्यगाः । अष्टहस्तसमुच्छायाः संस्थाप्या द्वादशाऽभितः ।२१ पञ्चहस्तप्रमाणास्ते निश्छिद्रा ऋजवः शुभाः । तत्पञ्चमांशं संन्यस्ये-(न्निखने) न्मेदिन्यां तन्त्रवित्तमः ।२२

तृतीय पटल ] [ ५५ नारिकेलदलैर्वंशैश्छादयेत्तत्समन्ततः । द्वारेषु तोरणानि स्युः क्रमात् क्षीरमहोरुहाम् ।२३ उनको रजों से पूरित करना चाहिए । इसके अनन्तर इसके लिए पायस अन्नों के द्वारा बलिका समाहरण करना चाहिए । यही वास्तु- बलिका बतायी गयी है जो सभी की समृद्धि के प्रदान करने वाली होती है ।१८। नक्षत्र, राशि और वारों के अनुकूल किसी शुभ दिन में परम शुद्ध भूमि तल में जो तुष और अङ्गार आदि से रहित होवे पुण्याह वाचन कराके परत शुभ एक मण्डप की रचना करनी चाहिए । वह मंडप पाँच-सात अथवा नौ हस्त के अन्तर वाला होना चाहिए ।१९- २०। उस मंडप में सोलह स्तम्भ होने चाहिए उन सोलह स्तम्भों में से चार स्तम्भ मध्य गत होने चाहिए। इन स्तम्भों की ऊँचाई आठ हाथ की होवे । परस्परिक स्तम्भोंके सब ओर बारहस्तम्भ संस्थापित होवे । इनका प्रमाण पाँच हाथ का ही होना चाहिए । ये सब छिद्र रहित— सीधे और शुभ संस्थापित करे । तन्त्र वेत्ता पुरुष को चाहिए कि उन स्तम्भों का पाँचवा भाग भूमि में खोदकर रक्खे ।२१-२२। नारियल के पत्तों से और बाँसों से सभी ओर से उसका छादन कर देवे । द्वारों में क्रम से दूध वाले वृक्षों के तोरण होने चाहिए ।२३। स्तम्भोच्छायाः स्मृतास्तेषां सप्तहस्तैः पृथक् पृथक् । दशांगुलप्रमाणेन तष्परीणाह ईरितः ।२४ तिर्यक्फलकमानं स्यात्स्तम्भानामर्द्धमानतः । शूलानि कल्पयेन्मध्ये तोरणे हस्तमानतः ।२५ दिक्षु ध्वजान्निवध्नीताल्लोकपालसमप्रभान् । वितानदर्भमालाद्यैरलङ्कुर्वीत मण्डपम् ।२६ सात हाथों से पृथक्-पृथक् उन स्तम्भों की छाया कही गयी है । दश अंगुल प्रमाण से उनका परीणाह (परिमाण) कहा गया है ।२४। दोनों स्तम्भों के मध्य में देहली के रूप से जो ऊपर में तिरछा फलक है उसका मान स्तम्भों के अर्ध मान से ही होना चाहिए । एक हाथ

५६ ] [ श्रीशारदा तिलक के मान से तोरण में मध्य में शूलों को कल्पना करे ।२५। दिशाओ में लोक पालों के समान प्रभा वाली ध्वजाओं को बांध देवे । उस मण्डप को वितान-दर्भ और मालाये आदि के द्वारा भली-भांति समलंकत करना चाहिए ।२६। तत्तिभागमिते क्षेत्रेऽरत्निमात्रसमन्विताम् । चतुरस्रां ततो वेदि मण्डलाय प्रकल्पयेत् । २७ प्रागेव दीक्षादिवसात्सप्तभिर्विधिवहितैः । सर्वमङ्गलसम्पत्यै विदध्यादङ्कुरार्पणम् ।२८ मण्डपस्योत्तरे भागे शालां पूर्वापरायताम् । मूढां कुर्यात्ततस्तस्यां मण्डलं रचयेत्सुधीः । २६ पञ्चहस्तप्रमाणानि पञ्चसूत्राणि पातयेत् । पूर्वापरायतान्येषामन्तरं द्वादशांगु लम् ।३० दक्षिणोत्तासूत्राणि तद्वदेकादशार्पयेत् । पदानि तत्र जायन्ते चत्वारिंशत्प्रमार्जयेत् । ३१ षड्क्त्यावीथीश्चतस्रोऽतश्चतुष्कोभयपार्श्वयोः । वीथ्यौ द्वे च चतुष्कोष्ठत्रयमत्रावशिष्यते । ३२ उसके विभाग से परिमित क्षेत्र में अरत्नि मात्र से समन्वित चतु- रस्र वेदी मण्डल के लिए कल्पित करे ।२७। दीक्षादि दिवस से पहिले ही सात दिन में विधि के सहित सब प्रकार के मङ्गलों की सम्पत्ति के लिए अंकुरों का आरोपण करना चाहिए ।२८। मण्डप के उत्तर भाग में पूर्वापर में आयता गूढ़ डाला जनानी चाहिए । फिर उनके उपरान्त उस शाला में सुधी व्यक्ति को चाहिए कि मण्डप की रचना करे ।२६। फिर पाँच हाथों के प्रमाण वाले पाँच सूत्रों का पालन करे जो पूर्वा पर आयत हों वे और जिनका अन्तर बारह अंगुल होवे ।३०। उसी भाँति दक्षिण सूत्रों को ग्यारह वार करे । वहाँ पर चालीस पद उत्पन्न होते हैं उसकी प्रमार्जित करना चाहिए । ३१। पांकुम चारों विधियों का मार्जन करे । पूर्व से चार कोष्ठो वाली एकविधि आठ कोष्ठों वाली

तृतीय पटल ] [ ५७ दक्षिण विधि-फिर चार कोष्ठों वाली पश्चिम विधि-और आठ कोष्ठों वाली उत्तर विधि का मार्जन करे । इस मण्डप में चतुष्कोष्ठ त्रय अव- शिष्ट रहता है । ३२। पदानि रञ्जयेत्तानि श्वेतपीतारुणासितैः । रजोभिः श्यामलेनाथ वीथीरापूरयेत्सुधीः । ३३ पात्राणि त्रिविधांयाहुरंकुरार्पणकर्मसु । पालिकाः पञ्च मुख्यश्च शरावाश्च चतुष्क्रमात् । ३४ प्रोक्ताः स्मृताः सर्वतन्त्रज्ञैर्हरिब्रह्मशिवात्मकाः । एषामुत्सेध (च्छाय) उन्नेयः षोडश द्वादशाष्टभिः । ३५ अंगुलैः क्रमशस्तानि शुभांयावेष्ट्य तंतुना । प्रक्षाल्य देशिकस्तेषु पदेष्वाहितशालिषु । ३६ सगन्धदर्भकूर्चेषु पश्चिमादि निवेशयेत् । करीषवालुकामृद्भिस्तानि पात्राणि पूरयेत् । ३७ उन पदों का श्वेत-पीत-अरुण और सितरज से तथा श्यामल रज से सुधी पुरुष को विधि पूर्वक अपूरित करना चाहिए । ३३। अंकुरा- र्पण कर्मों में तीन प्रकार के पात्र कहे गये हैं-पालिका-पाँच मुखी और शराव ये क्रम से बताये गये हैं । ये सभी तन्त्रों के ज्ञाताओं के द्वारा हरि ब्रह्मा और शिव के स्वरूप वाले कहे गये हैं । इनकी ऊँचाई क्रम से षोड्श-द्वादश और अष्ट अंगुलों की समझनी चाहिए । वे शुभ होती हैं । इनको तन्तु से आवेष्टित करके प्रक्षालन करके आचार्य आहित शाली वाले गन्ध दर्भ कूर्च से युक्त उन पदों के पश्चिम आदि निवेशित करना चाहिए । करीष बालुका-मृत्तिका से उन पात्रों को पूरित कर देवे । ३४-३७। सुधाबीजेन बीजानि दुग्धैः प्रक्षाल्य तन्त्रवित् । मूलमन्त्राभिजप्तानि पंचघोषपुरःसरम् । ३८ आशीर्वाग्भिर्द्विजातीनां मंगलाचारपूर्वकम् । निर्वपेत्तेषु पात्रेषु देशिको यतमानसः । ३६

५८ ] [ श्री शारदा तिलक शालिश्यामाढकामुद्गतिलनिष्पावसर्षपाः । कुलत्थ कंगुमाषाश्च बीजान्यङ्.कुरर्मणि ।४० हरिद्रद्भि समभ्युक्ष्य वस्त्रैराच्छाद्य देशिकः । बलिंत्रिविधपात्राणां दिक्षु पूर्वादिंतोहरेत् ।४१ प्रणवाद्यैर्नमोन्तैश्च रात्रौ रात्रीशनामभिः । भतानि पितरो यक्षा नागा ब्रह्मा शिवो हरिः ।४२ तन्त्रों का ज्ञाता सुधा बीज के द्वारा बीजों को दूध से प्रक्षालित करके मूल मंत्र से अभिमंत्रित करे और पाँच घोषों के साथ-द्विजातियों के आशीर्बचनों से मङ्गलाचार पूर्वक आचार्य संयत मंत्र वाला होकर उन पात्रोंमें निर्वपन करे ।३८-३६। शाली, श्यामा, आढकी, मुद्ग, तिल, निष्पाव, सर्षप कुलत्थ कङ्गु, मास, इनके बीजों को अंकुर, कर्म्म में ग्रहण करना चाहिए । आचार्य हल्दी से सभ्युक्षण करके वस्त्रसे आच्छा- दित कर देवे । पूर्वादि दिशाओं में त्रिविध पात्रों की बलि का समाहरण करे ।४०-४१। यह बलि रात्रीशके नामों द्वारा देवे जिनके आदिमें प्रणव होवे और अन्त में नमः'–यह पद होवे । भूत, पित्रगण, यक्ष, नाग, ब्रह्मा, शिव ओर हरि ये सातों रात्रियों के देवता कहे गये हैं ।४२। सप्तानामपि रात्रीणां देवताः समुदीरिताः : भूतेभ्यः स्यलजतिलहरिद्रादधिसक्तवः ।४३ सान्नाः पितृभ्यः सतिलास्तण्डुलाः परिकीर्तिताः । करम्भलाजा यक्षेभ्यो नारिके लोदकान्वितम् ।४४ सक्तुपिष्टं च नागेभ्यो ब्रह्मणे पंकजाक्षताः । सापूपमन्नं शर्वाय विष्णवे च गुडौदनम् ।४५ ततो लोकेश्वरेश्भ्योऽपि वितरेद्विधिवत्बलिम् । दीक्षायामभिषेकेषु नववेश्मप्रवेशने ।४६ उत्सवेषु च संपत्यै (त्तौ) विदध्यादङ्कुरापंणम् । प्राक् प्रोक्ते मण्डपे बिद्वान्वेदिकाया बहिस्त्रिधा ।४७

तृतीय पटल ] [ ५६ क्षेत्रं विभज्य मध्यांशे पूर्वादि परिकल्पयेत् । अष्टास्वाशासु कुण्डानि रम्याकाराण्यनुक्रमाद् ।४८ भूतों के लिए बलि में लाजा, तिल, हरिद्रा, दधि, सक्तु और अन्न ये होते हैं। पितृभ्यों के लिए तिलों के सहित तण्डुल बताये गये हैं । यक्षों के लिए आरम्भ और लाजा ( खील ) होते हैं । नागों के लिए नारियल के जल से सतन्वित सक्तुपिष्ट होता है और ब्रह्मा के लिये पंकज तथा अक्षत है। शर्व के लिए पूजों के सहित अन्न तथा विष्ण भगवान्‌की गुड़ और ओदन होता है ।४३-४५। उसके अनन्तर लोकपालों के लिए भी विधि के साथ बलि का वितरण करना चाहिए । दीक्षा में, अभिषेकों में, नवीन गृह के प्रवेश करने में, उत्सवों में सम्पदा के लिए अंकुरार्पण करना ही चाहिए । पूर्व में वर्णित मण्डप में विद्वान् पुरुषको वेदिका से बाहिर तीन भागों में क्षेत्र का विभाग करके मध्यांशमें पूर्वादि दिशाओं की कल्पना कर लेनी चाहिए । और अनुक्रम से रम्य आकार वाले कुण्डों की आठों दिशाओं में रचना करनी चाहिए ।४४-४८। चतुरस्रं योनिमर्द्धचन्द्रं त्र्यस्रं सुवर्तुलम् । षडस्रं पंकजाकारमष्टास्रं तानि नामतः ।४६ आचार्य कुण्डं मध्ये स्यान्गौरीपतिमहेन्द्रयोः । हस्तमानमितां भूमि पूर्ववत्परिकल्पयेत् ।५० समन्तात्कुण्डमेतत्सयाच्चतुरस्रं शुभावहम् । चतर्विशत्यंगुलाढयं हस्तं तन्त्रविदोविदुः ।५१ कर्तुर्दक्षिणहस्तस्य मध्यमांगुलिपर्व्वणः । मध्यस्य दीर्घमानेन मानांगुलमुदीरितम् ।५२ यवानामष्टभिः क्लृप्तं मानांगुलमुदीरितम् । चतुरस्त्रीकृतं क्षेत्रं पञ्चधा विभजेत्सुधीः ।५३ न्यसेत्पुरस्तादेकांशं कोणादर्द्धार्धतप्रमाणतः । भ्रामयेत्कोणमानेन तथान्यदपि मन्त्रवित् ।५४

सूत्रयुग्मं ततो दद्यात्कुण्डं योनिनिभं भवेत् ।

६० ] [ श्रीशारदा तिलक सूत्रयुग्मं ततो दद्यात्कुण्डं योनिनिभं भवेत् । चतुरस्रीकृत क्षेत्रं दशधा विभजेत्पुनः ।५५ उन कुण्डों के चतुरस्रयौनि, अर्धचन्द्र, त्र्यस्र, सुवर्त्तल- षडस्र-पक- जाकर और अष्टस्र ये नाम होते हैं ।४६। गौरी और महेन्द्र का आचार्य्य कुन्ड मध्य में होता है। एक हाथ के मान से परिमित भूमिकी पूर्व की ही भाँति पीरकल्पना करनी चाहिए ।५०। यह कुन्ड चारों ओर से चतुरस्र शुभ का आवाहन करने वाला होता है । इसको मन्त्रके वेत्ता जन चौवीस अंगुलों से आढ्य ( एक हाथ ) कहा करते हैं ।५१। कर्त्ता के दाहिने हाथ के मध्यमांगुलिके पर्व वाले मध्यके दीर्घ भाव से अंगुलि का मान कहा गया है ।५२। आठपर्वोंका कॢप्त अंगुलिका माम बताया गया है । सुधी पुरुष चतुरस्र कृत क्षेत्र का पाँच प्रकार से विभाजन करे ।५३। आगे कोण के अर्धार्र्ध प्रमाण से एकांश का न्यास करे । मन्त्र का ज्ञाता पुरुष को उसी भाँति कोण के मान से अन्य का भी भ्रमण करना चाहिए इसके उपरान्त सूत्रों के युग्म को देने से योनि के तुल्य कुन्ड होता है । सतुरस्री कृत-क्षेत्र को दश प्रकार से विभक्त करना चाहिए ।५४-५५। एकमेकं त्यजेदंशमधऊर्ध्वं च तन्त्रवित् । ज्यासूत्रं पातयेदग्रे तन्मानाद्भ्रमयेत्ततः ।५६ अर्द्धचन्द्रनिभं कुण्डरमणीयमिदं भवेत् । चतुर्द्धा भेदिते क्षेत्रे न्यसेदुभयपार्श्वयोः ।५७ एकैकमंशं तन्मानादग्रतो लाञ्छयेत्ततः । सूत्रयुग्मं बुधः (ततः) कुर्य्यात्त्र्यस्रकुण्डमुदाहृतम् ।५८ अष्टादशांशे क्षेत्रे च न्यसेदेकं वहिर्बुधः । भ्रमयेत्तेनमानेन वृत्तं कुण्डमनुत्तमम् ।५६ अष्टधाविभजेत्क्षेत्रं मध्यसूत्रस्यपार्श्वयोः । भागन्यसेदेकमेकं भागेनानेन मध्यतः ।६०

सूत्रों को करे तो यह त्र्यस्र कुण्ड कहा गया है ।५८। बुद्धिमाने पुरुष

तृतीय पटल ] ६१ तन्त्र का ज्ञाता पुरुष ऊपर और नीचे एक एक अंश का त्यागकर देवे । ज्यासूत्र का पालन करे फिर आगे उसके मान से भ्रमण करना चाहिए ।५६। तो यह परम सुन्दर अर्धचन्द्र के तुल्य कुण्ड होता है । चार प्रकार से भेदित क्षेत्रमें दोनों पाश्र्वोंमें व्यास करे ।५७। फिर उसके मानसे एक-एक अंशको आगे लांछित करना चाहिए । बुद्धिमान पुरुषदो सूत्रों को करे तो यह त्र्यस्र कुण्ड कहा गया है ।५८। बुद्धिमाने पुरुष को अष्टादशांश क्षेत्र में वाहिर एक का न्यास कर देना चाहिए । उस -मान से भ्रमित करे तो परम श्रेष्ठ वृत्त कुण्ड होता है ।५६। मध्य में इस भाग से एक-एक भाग का न्यास करे ।६०। क यत्पाश्र्वयुगे (द्वयो) मत्स्यचतुष्क तन्त्रवित्तमः । सूत्रषट्कं ततो दद्यात्षडस्रं कुण्डमुत्तमम् ।६१ चतुरस्रीकृतं क्षेत्रं विभज्याष्टादशांशतः । एकं भागं वहिर्न्यस्य भ्रामयेत्तेन वर्तुलम् ।६२ वृत्तानि कर्णिकादीनां बहिस्त्रीणि प्रकल्पयेत् ! पद्मकुण्डमिति प्रोक्तं विलोचनमनोहरम् ।६३ पूर्वोक्तं विभजेत्क्षेत्रं चतुर्विंशतिभागतः । एकं भागं वहिर्न्यस्य चतुरस्रं प्रकल्पयेत् ।६४ अंतःस्थचतुरस्रस्य कोणार्द्धादर्द्धप्र णतः । वाह्यस्थतुरस्रस्य कोणांभ्यां परिलांछयेत् ।६५ दिशं प्रति यथान्यायमष्टौ सूत्राणि पातयेत् । अष्टास्रं कुण्डमेतद्धिद तन्त्रविद्भिरुदाहृतम् ।६६ यावांत्कुण्डस्य विस्तारः (१) खननं तावदीरितम् । कुण्डानां यादृश रूपं मेखलानां च तादृशम् ।६७ तन्त्र के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ पुरुष द्वारा दोनों पाश्र्वों में चार मत्स्यों को बनाना चाहिए । फिर छै सूत्रों का करे तो उत्तम षडस्र कुण्ड हो जाता है ।६१। चतुरस्रों कृत क्षेत्रको अठारह अंशसे विभाजन करके एक

६२ ] ' ! श्री शारदा तिलक भाग को बाहिर न्यस्त करके भ्रामण करे तो वर्त्तुल होता है ।६२। कर्णिका आदि के तीन वृत्तों को बाहिर कल्पना करनी चाहिए । यह नेत्रों को मनोहर दिखाई देने वाला पद्म कुण्ड कहा गया है ।६३। पूर्व में कहें हुए क्षेत्र को चौबीस भाग से विभक्त करना चाहिए । एक भाग का बाहिर न्यास करके चतुरस्र की कल्पना करे ।६४। अन्दर स्थित चतुरस्र का कोणाद्यर्ध प्रमाण से बाहिर में स्थित चतुरस्र के कोणों से परिलाञ्छित करना चाहिए। ६५। न्यायानुसार दिशाकी ओर आठ सूत्रों का पालन करे । इसको तन्त्र के ज्ञाता विद्वानों के द्वारा अष्टास्र कुण्ड कहा गया है ।६६। जितना कुण्डों का विस्तार होवे उतना ही खनन कहा गया है । और कुण्डों का जिस प्रकार का रूप होता है मेखलाओं का भी उसी तरह का हुआ है।६७। कुण्डानां खलास्तिस्रो मुष्टिमात्रे तु ताः क्रमात् । उत्सेधायामतो ज्ञेया ह्येकार्द्धाङ्गुलिसमिताः ।६८ अरत्निमात्रे कुण्डे स्युस्तास्त्रिद्व्येकांगुलात्मिकाः । एकहस्तमिते कुन्डे वेदाग्निनयनांगुलाः ।६६ मेखलानां भवेद्दन्तः परितो नेमिरंगुलात् । एकहस्तस्य कुण्डस्य वर्द्धयेत्तां क्रमात्सुधीः ।७० दशहस्तान्तमन्येषामर्द्धांगुलशात्पृथक् । कुण्डे द्विहस्ते ता ज्ञेया रसवेदगुणांगुलाः । ७१ चतुर्हस्तेषु कुण्डेषु वसुतर्कयुगांगुलाः । कुण्डे रसकरे ताः स्युर्दशाष्टटर्वंगुलान्विताः । ७२ कुण्डों की तीन मेखलाएँ होती है और वे क्रम से मुष्टि मात्र हुआ करती है। उत्सेध और आयाम से वे ह्येकार्द्ध अंगुलियोंके संमित हुआ करती है ।१८। जो कुण्ड अरत्नि मात्र ही होता है उनमें वे तीन दो और एक अंगुल मात्र के स्वरूप वाली हुआ करती हैं । एक हाथ परिमाण वाले कुन्ड में चार-तीन और दो अंगुल के परिमाण से युक्त होती है ।६६। मेखलाओंके अन्दर सभी ओर अंगुलके मानसे नेमि होती

तृतीय पटल ] [ ६३ है। सुधी पुरुष एक हाथ वाले कुण्ड को क्रम से वर्धित कर देवे ।७०। अन्यों का अर्धांगुल वश से वृयक् दश हाथों के अन्त तक करे। दो हाथ के कुन्डमें छै और चार अंगुल वाली उनको जानना चाहिये ।७१। चार हाथ परिमाण वाले कुन्डो में आठ और चार अंगुलों के परिमाण वाली हुआ करती है। छै हाथों वाले कुन्ड में वे दश-आठ और छै अंगुलों वाली हुआ करती है ।७२। वसुहस्तमिते कुण्डे भानुपङ्क्त्यष्टकांगुलाः ।७३ दशहस्तमिते कुण्डे मनुभानुदशांगुलाः । विस्तारोत्सेधतो ज्ञेया मेखला सर्वतो बुधैः । ७४ होतुरग्रे योनिरासामुपर्यश्वत्थपत्रवत् । मुष्ट्यरत्न्येकहस्तानां कुण्डानौ योनिरोरिता ।७५ षट्चतुर्ह्यङ्गुलायामविस्तारोन्नतिशालिनी । एकांगुल त योन्यग्रे कुयोदीषदधोमुखम् ।७६ एककांगुलतो योनि कुण्डेष्वन्येषु वर्द्धयेत् । यवद्वयक्रमेणैव योन्यग्रमापे वर्द्धयेत् ।७७ आठ हाथ में परिमित कुन्ड में भानु पंक्ति आठअंगुल वाली मेखला होती है। और दश हाथ परिमित कुन्ड के होने पर मेखला मनु-भानु दश अंगुल वाली होनी चाहिये । बुधों के द्वारा मेखला सब प्रकार-से विस्तार और उत्सेध अर्थात् ऊँचाई से जाननी चाहिए ।७३-७४। होता के आगे इनकी योनि होती है जो पीपल के पत्र के ही समान हुआ करती है। मुष्टि-अरत्नी एक हाथ वाले कुन्डों की योनि कही गयी है ।७५। छै और चार अंगुलों के आयास विस्तार से उन्नति शालिनी होती है-योनि को अधो मुख अन्य एक अंगुल करे ।७६। अन्य कुन्डों में एक अंगुल से योनि को बढ़ा देना चाहिये । अन्योंमें दो यवों के मान से ही योनि के अग्रभाग को बढ़ावे ।७७। स्थलादारभ्य नालं स्याद्योन्या मध्ये सरन्ध्रकम् । नार्पयेत्कुण्डकोणेषु योनिं तां तन्त्रवित्तमः ।७८

६४ ] [ श्रीशारदा तिलक कुण्डानां कल्पयेदन्तर्नाभिमम्बुजसन्निभाम् । तत्तत्कुण्डानुरूपं वा मानमस्य निगद्यते ।७६ मुष्ट्यरत्न्येकहस्तानां नाभिरुत्सेधतारतः । द्वित्रिवेडाङ्गुलोपेताः कुण्डेष्वन्येषु वर्द्धयेत् ।८० यवद्वयक्रमेणैव नाभि पृथगुदारधीः । योनिकुन्डे योनिमब्जकुन्डे नाभि विवर्जयेत् ।८१ नाभिक्षेत्रं त्रिधा भित्वा मध्यो कुर्वीत कर्णिकाम् । वहिरंशयेनाष्टौ पत्राणि परिकल्पयेत् ।८२ योनि के मध्य में रन्ध्र के सहित स्थलसे आरम्भ करके नाल होना चाहिए । तन्त्र शास्त्र का ज्ञाता विद्वान् उस योनि को कुण्ड के कोणोंमें अर्पित न करे ।७८। कुण्डों के आदर अम्बुज के सदृश नाभि की कल्पना करनी चाहिए । इस नाभि का परित्याग उस कुण्ड के ही अनुरूप कहा जाया करता है ।७९। मुष्टि-रत्नी और एक हाथ वाले कुण्डों की नाभि उत्सेधतार से होती है जो दो-तीन और चार अंगुलोंसे उपेत हैं । अन्य कुण्डों में बढ़ा देवे ।८०। उदार बुद्धि वाले को चाहिए कि दो यवों के क्रम से ही नाभि को पृथक् बनाये । जो योनि कुण्डहों और जो अब्ज कुण्ड होवे वहाँ पर योनि और नाभि को वर्जित कर देना चाहिए ।८१। नाभि के क्षेत्र को तीन भागों में भेदन करके मध्य में कर्णिका करे । वाहिर दो अंश से आठ पत्रों की कल्पना करे ।८२। मुष्टिमात्रमितं कुण्डं शतार्द्ध संप्रचक्षते । शतहोमेऽरत्निमात्रं हस्तमात्रं सहस्रके ।८३ द्विहस्तमयुते लक्षे चतुर्हस्तमुदीरितम् । दशलक्षे तु षड्ढस्तं कोटयमष्टकरं स्मृतम् ।८४ एकहस्तमितं कुण्डमेकलक्षे विधीयते । लक्षाणां दशकं यावत्तावद्धस्तेन वर्धयेत् ।८५ दशहस्तमितं कुण्डं कोटिहोमे (१) ऽपिशस्यते । सर्वसिद्धिंकर कुण्डं चतुरस्रमुदाहृतम् ।८६

तृतीय पटल ] [ ६५ पुत्रप्रदं योनिकुण्डमर्द्धेन्द्राभं शुभप्रदम् । शत्रुक्षयकरं त्र्यस्रं वर्त्तुलं शान्तिकर्मणि ।८७ एक मुष्टि मात्र परिमाण वाला कुण्ड अर्धशत का प्रसिद्ध है । जो शतहोम है । वहाँ पर कुण्डअरत्निमात्र होना चाहिये ओर सहस्र आहु- तियों के लिये एक हाथ परिमाणं का कुण्ड होता है ।८३। दश हजार आहुतियों के लिये दो हाथ का कुण्डऔर एक लाख में चार हाथों के प्रमाण वाला कुण्ड होना चाहिये । दश लाख आहुतियाँ जहाँ पर होवें वहाँ पर छै हाथ का और एक करोड़ आहुतियों के लिये आठ हाथ का कुण्ड होना चाहिये ।८४। हाथ परिमाण का कुण्ड एक लाख के लिये किया जाता है । जहाँ तक दश लाख है वहाँ पर उतने ही हाथ बढ़ा देना चाहिये ।८५। दश हाथ परिमाण वाला कुण्ड एक करोड़ के होम में भी अशस्त माना जाया करता है । सब प्रकार की सिद्धियों के करने वाला कुण्डचतुरस्र ( चौकोर ) ही उदाहृत किया गया है ।८६। योनि-कुण्डपुत्र का प्रदान करने वाला होता है ओर अर्धचन्द्र की आभा वाला कुण्ड शुभप्रद होता है । त्र्यस्र शत्रुओं के क्षय का करने वाला है ओर जो कुण्ड वर्त्तुल होता उसको शान्ति कर्म में प्रयुक्त करना चाहिये ।७८। छेदमारणयोः कुण्डं षडस्रं पद्मसंन्निभम् । वृष्टिदं रोगशमनं कुण्डमष्टास्रमीरितम् । ८८ विप्राणां चतुरस्रं स्याद्राज्ञां वर्त्तुलमिष्यते । वैश्यानामर्द्धचन्द्राभं शूद्राणां त्र्यस्तमीरितम् ।८६ चतुरस्रं तु सर्वेषां केचिदिच्छन्ति (२) देशिकाः । कुण्ड (१) रूपं तु जानीयात्वा रमं प्रकृतेर्वपुः ।६० प्राच्यां शिरः समाख्यातं बाहू दक्षिणसौम्ययोः । उदरं कुण्डमित्युक्तं योनिः (२) पश्चिमतर्भवेत् ।६१ नित्यं नैमित्तकं होमं (३) स्थण्डिले वा समाचरेत् । हस्तमात्रेण तत्कुर्याद्वालुकाभिः सुशोभनम् ।६२