भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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६४ ] [ श्रीशारदा तिलक कुण्डानां कल्पयेदन्तर्नाभिमम्बुजसन्निभाम् । तत्तत्कुण्डानुरूपं वा मानमस्य निगद्यते ।७६ मुष्ट्यरत्न्येकहस्तानां नाभिरुत्सेधतारतः । द्वित्रिवेडाङ्गुलोपेताः कुण्डेष्वन्येषु वर्द्धयेत् ।८० यवद्वयक्रमेणैव नाभि पृथगुदारधीः । योनिकुन्डे योनिमब्जकुन्डे नाभि विवर्जयेत् ।८१ नाभिक्षेत्रं त्रिधा भित्वा मध्यो कुर्वीत कर्णिकाम् । वहिरंशयेनाष्टौ पत्राणि परिकल्पयेत् ।८२ योनि के मध्य में रन्ध्र के सहित स्थलसे आरम्भ करके नाल होना चाहिए । तन्त्र शास्त्र का ज्ञाता विद्वान् उस योनि को कुण्ड के कोणोंमें अर्पित न करे ।७८। कुण्डों के आदर अम्बुज के सदृश नाभि की कल्पना करनी चाहिए । इस नाभि का परित्याग उस कुण्ड के ही अनुरूप कहा जाया करता है ।७९। मुष्टि-रत्नी और एक हाथ वाले कुण्डों की नाभि उत्सेधतार से होती है जो दो-तीन और चार अंगुलोंसे उपेत हैं । अन्य कुण्डों में बढ़ा देवे ।८०। उदार बुद्धि वाले को चाहिए कि दो यवों के क्रम से ही नाभि को पृथक् बनाये । जो योनि कुण्डहों और जो अब्ज कुण्ड होवे वहाँ पर योनि और नाभि को वर्जित कर देना चाहिए ।८१। नाभि के क्षेत्र को तीन भागों में भेदन करके मध्य में कर्णिका करे । वाहिर दो अंश से आठ पत्रों की कल्पना करे ।८२। मुष्टिमात्रमितं कुण्डं शतार्द्ध संप्रचक्षते । शतहोमेऽरत्निमात्रं हस्तमात्रं सहस्रके ।८३ द्विहस्तमयुते लक्षे चतुर्हस्तमुदीरितम् । दशलक्षे तु षड्ढस्तं कोटयमष्टकरं स्मृतम् ।८४ एकहस्तमितं कुण्डमेकलक्षे विधीयते । लक्षाणां दशकं यावत्तावद्धस्तेन वर्धयेत् ।८५ दशहस्तमितं कुण्डं कोटिहोमे (१) ऽपिशस्यते । सर्वसिद्धिंकर कुण्डं चतुरस्रमुदाहृतम् ।८६