शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 67, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीय पटल ] [ ६३ है। सुधी पुरुष एक हाथ वाले कुण्ड को क्रम से वर्धित कर देवे ।७०। अन्यों का अर्धांगुल वश से वृयक् दश हाथों के अन्त तक करे। दो हाथ के कुन्डमें छै और चार अंगुल वाली उनको जानना चाहिये ।७१। चार हाथ परिमाण वाले कुन्डो में आठ और चार अंगुलों के परिमाण वाली हुआ करती है। छै हाथों वाले कुन्ड में वे दश-आठ और छै अंगुलों वाली हुआ करती है ।७२। वसुहस्तमिते कुण्डे भानुपङ्क्त्यष्टकांगुलाः ।७३ दशहस्तमिते कुण्डे मनुभानुदशांगुलाः । विस्तारोत्सेधतो ज्ञेया मेखला सर्वतो बुधैः । ७४ होतुरग्रे योनिरासामुपर्यश्वत्थपत्रवत् । मुष्ट्यरत्न्येकहस्तानां कुण्डानौ योनिरोरिता ।७५ षट्चतुर्ह्यङ्गुलायामविस्तारोन्नतिशालिनी । एकांगुल त योन्यग्रे कुयोदीषदधोमुखम् ।७६ एककांगुलतो योनि कुण्डेष्वन्येषु वर्द्धयेत् । यवद्वयक्रमेणैव योन्यग्रमापे वर्द्धयेत् ।७७ आठ हाथ में परिमित कुन्ड में भानु पंक्ति आठअंगुल वाली मेखला होती है। और दश हाथ परिमित कुन्ड के होने पर मेखला मनु-भानु दश अंगुल वाली होनी चाहिये । बुधों के द्वारा मेखला सब प्रकार-से विस्तार और उत्सेध अर्थात् ऊँचाई से जाननी चाहिए ।७३-७४। होता के आगे इनकी योनि होती है जो पीपल के पत्र के ही समान हुआ करती है। मुष्टि-अरत्नी एक हाथ वाले कुन्डों की योनि कही गयी है ।७५। छै और चार अंगुलों के आयास विस्तार से उन्नति शालिनी होती है-योनि को अधो मुख अन्य एक अंगुल करे ।७६। अन्य कुन्डों में एक अंगुल से योनि को बढ़ा देना चाहिये । अन्योंमें दो यवों के मान से ही योनि के अग्रभाग को बढ़ावे ।७७। स्थलादारभ्य नालं स्याद्योन्या मध्ये सरन्ध्रकम् । नार्पयेत्कुण्डकोणेषु योनिं तां तन्त्रवित्तमः ।७८