शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६२ ] ' ! श्री शारदा तिलक भाग को बाहिर न्यस्त करके भ्रामण करे तो वर्त्तुल होता है ।६२। कर्णिका आदि के तीन वृत्तों को बाहिर कल्पना करनी चाहिए । यह नेत्रों को मनोहर दिखाई देने वाला पद्म कुण्ड कहा गया है ।६३। पूर्व में कहें हुए क्षेत्र को चौबीस भाग से विभक्त करना चाहिए । एक भाग का बाहिर न्यास करके चतुरस्र की कल्पना करे ।६४। अन्दर स्थित चतुरस्र का कोणाद्यर्ध प्रमाण से बाहिर में स्थित चतुरस्र के कोणों से परिलाञ्छित करना चाहिए। ६५। न्यायानुसार दिशाकी ओर आठ सूत्रों का पालन करे । इसको तन्त्र के ज्ञाता विद्वानों के द्वारा अष्टास्र कुण्ड कहा गया है ।६६। जितना कुण्डों का विस्तार होवे उतना ही खनन कहा गया है । और कुण्डों का जिस प्रकार का रूप होता है मेखलाओं का भी उसी तरह का हुआ है।६७। कुण्डानां खलास्तिस्रो मुष्टिमात्रे तु ताः क्रमात् । उत्सेधायामतो ज्ञेया ह्येकार्द्धाङ्गुलिसमिताः ।६८ अरत्निमात्रे कुण्डे स्युस्तास्त्रिद्व्येकांगुलात्मिकाः । एकहस्तमिते कुन्डे वेदाग्निनयनांगुलाः ।६६ मेखलानां भवेद्दन्तः परितो नेमिरंगुलात् । एकहस्तस्य कुण्डस्य वर्द्धयेत्तां क्रमात्सुधीः ।७० दशहस्तान्तमन्येषामर्द्धांगुलशात्पृथक् । कुण्डे द्विहस्ते ता ज्ञेया रसवेदगुणांगुलाः । ७१ चतुर्हस्तेषु कुण्डेषु वसुतर्कयुगांगुलाः । कुण्डे रसकरे ताः स्युर्दशाष्टटर्वंगुलान्विताः । ७२ कुण्डों की तीन मेखलाएँ होती है और वे क्रम से मुष्टि मात्र हुआ करती है। उत्सेध और आयाम से वे ह्येकार्द्ध अंगुलियोंके संमित हुआ करती है ।१८। जो कुण्ड अरत्नि मात्र ही होता है उनमें वे तीन दो और एक अंगुल मात्र के स्वरूप वाली हुआ करती हैं । एक हाथ परिमाण वाले कुन्ड में चार-तीन और दो अंगुल के परिमाण से युक्त होती है ।६६। मेखलाओंके अन्दर सभी ओर अंगुलके मानसे नेमि होती