भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 54, कुल 511 में से

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५० ] [ श्री शारदा तिलक चाहिए जिसने काम-वासना का त्याग कर दिया होवे ।१४२-१४३। १४५। हितैषी प्राणिनां नित्यमास्तिकस्त्यक्तनास्तिकः । स्वधर्म्मनिरतो भक्त्या पितृमातृहितोद्यतः ।१४६ वाङ्मनः कायवसुभिर्गुरुशुश्रूषणे रतः । त्यक्ताभिमानो गुरुषु जातिविद्याधनादिभि ।१४७ गुर्वाज्ञापालनार्थं हि प्राणव्ययरतोद्यतः । विहत्य च स्वकार्याणि गुरुकार्यरतः सदा ।१४८ दासवान्निवसेद्यस्तु गुरौ भक्त्या सदा शिशुः । कुर्वन्नाज्ञां दिवारात्रौ गुरुभक्ति परायणः ।१४६ आज्ञाकारी गुरोः शिष्योमनोवाक्कायकर्मभिः । यो भवेत्स तदा ग्राह्यो नेतरः शुभकाङ्क्षया ।१५० शिष्य समस्त प्राणियों के हित के चाहने वाला, नित्य ही हित चिन्तक, आस्तिक अर्थात् वेदों और ईश्वर में परम आस्था रखने वाला, जिसने नास्तिकों का सम्पर्क दूर कर दिया होवे अपने धर्म्ममें निरत - भक्ति की भावना से अपने माता-पिता के हित सम्पादन करने में समुद्यत होवे । वाणी मन और शरीर के द्वारा तथा धन से अपने गुरुदेव की सेवा करने में रति रखने वाला होवे । जाति-विद्या और धन आदि के द्वारा अपने गुरुदेवों के विषय में अभिमान के परित्याग कर देने वाला होवे ।१४६-१४७। शिष्य ऐसा ही होना चाहिए जो अपने गुरुदेव की आज्ञा का पालन करने के लिए अपने प्राणोंका व्यय कर देने में भी उद्यत रहे । अपने कार्यों का विहनन करकेभीसदा गुरुदेवके कार्यों के करने से रति रखने वाला हो ।१४८। जो गुरु के समीप से एक दास की ही भाँति निवास करे और भक्ति भाव से सदा एक शिशु की ही तरह रहे । दिन रात गुरु की आज्ञा को करते हुए गुरुदेव की भक्ति ही में परायण रहे ।१४८-१४६। मन-वाणी और शरीर के द्वारा शिष्य को गुरु की आज्ञा का पालन करने वाला ही होना चाहिए । ऐसा जो भी

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